क्या कहती है BNS की धारा 188, जानें इससे जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बातें

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BNS Section 188 in Hindi: भारतीय दंड संहिता (BNS) की धारा 188 भारत में स्थापित किसी भी टकसाल से, बिना वैध प्राधिकार के, सिक्का ढालने के लिए उपकरण या मशीनरी अवैध रूप से ले जाने से संबंधित है। इस धारा के तहत, ऐसा करने वाले व्यक्ति को सात साल तक की कैद और जुर्माने की सजा हो सकती है। तो चलिए आपको इस लेख में बताते हैं कि ऐसा करने पर कितने साल की सजा का प्रावधान है और बीएनएस (Bhaarateey dand sanhita) में व्यभिचार के बारे में क्या कहा गया है।

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धारा 188 क्या कहती है? BNS Section 188 in Hindi

जैसा कि आप जानते हैं कि अलग-अलग धाराओं में अलग-अलग अधिनियम और दंड हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बीएनएस की धारा 188 क्या कहती है, अगर नहीं तो आइए जानते हैं। बीएनएस (BNS) की धारा 188, के तहत, जो कोई भी व्यक्ति, बिना वैध प्राधिकार के, भारत में विधिपूर्वक स्थापित किसी भी टकसाल से कोई सिक्का बनाने का उपकरण हटाता है, उसे सात साल तक की कैद और जुर्माने से दंडित किया जा सकता है। यह धारा भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 245 के समतुल्य है।
इसके अलावा, कुछ पुराने संदर्भों में IPC की धारा 188 का भी उल्लेख है, जो किसी लोक सेवक द्वारा जारी आदेश की अवज्ञा करना अपराध बनाती है। इस धारा के तहत, किसी व्यक्ति को दंडित किया जा सकता है यदि वह जानबूझकर किसी लोक सेवक द्वारा जारी आदेश की अवज्ञा करता है और इस प्रकार किसी व्यक्ति को बाधा, परेशानी या चोट पहुँचाता है। इस धारा का प्रयोग अक्सर लॉकडाउन जैसी आपातकालीन स्थितियों में किया जाता है।

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बीएनएस धारा 188 का उदाहरण

बीएनएस धारा 188 का उदाहरण कुछ इस तरह से है कि, मान लीजिये जैसे…महामारी के दौरान लॉकडाउन का उल्लंघन – जब सरकार किसी महामारी को फैलने से रोकने के लिए लॉकडाउन या कर्फ्यू का आदेश देती है और कोई व्यक्ति जानबूझकर घर से बाहर निकलता है या इकट्ठा होता है, तो यह इस धारा के तहत अपराध है।

सार्वजनिक समारोहों पर प्रतिबंध – यदि किसी लोक सेवक द्वारा शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए किसी क्षेत्र में पाँच या अधिक लोगों के इकट्ठा होने पर प्रतिबंध लगाया जाता है और कोई व्यक्ति जानबूझकर इस आदेश का उल्लंघन करता है, तो यह भी धारा 188 के अंतर्गत आता है।

बीएनएस धारा 188 सजा 

इसके अलवा आपको बता दें कि धारा (Section) 188 के तहत दोषी पाए जाने पर सजा का प्रावधान है कि इस अपराध की सज़ा 7 साल तक की कैद, जुर्माना या दोनों है। यह एक संज्ञेय और जमानतीय अपराध है, जिसकी सुनवाई प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट द्वारा की जा सकती है।

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