Ganesha Tibet Buddhist: भगवान गणेश को हमेशा से हिंदू धर्म से ही जोड़ा जाता रहा है. लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि गणपति का कनेक्शन बौद्ध धर्म से भी है और बौद्ध धर्म में काफी पद्धति से इनका आह्वान किया जाता है. बौद्ध धर्म का गढ़ कहा जाने वाला तिब्बत गणपति को पूजता है. यहां के बौद्ध धर्म गुरु, गणपति के अलग अलग स्वरुपों को पूजते हैं और बौद्ध धर्म में उनके हर स्वरुप की अलग पहचान है. बौद्ध धर्म में गणपति को सम्भाला के नाम से पूजा जाता है.
बौद्ध धर्म में गणपति पूजा
दरअसल, बौद्ध धर्म में हिंदू धर्म के लोगों की तरह ही गणेश भगवान को सबसे पहले बाधा हरने वाले देवता के रूप में पूजा जाना शुरु हुआ था, जिन्हें महारक्त गणपति कहा जाता है. तब बौद्ध धर्म में गणपति पूजा असल में तांत्रिक विधाओं को सिद्ध करने के लिए किया गया था. हिंदू धर्म में जैसे गणेश जी के कई रूप हैं, वैसे ही धर्म के रक्षक और बुद्धि के देवता गणेश जी को बौद्ध लोग जम्भाला के रुप में पूजते हैं.
8वीं शताब्दी में न्यिंग्मा संप्रदाय के संस्थापक पद्मसंभव तिब्बत की यात्रा पर गए थे, जहां उन्होंने बौद्ध धर्म का विस्तार किया लेकिन बावजूद इसके उन्होंने बौद्ध धर्म के ग्रंथों में गणपति जी को खास स्थान दिया. न्यिंग्मा संप्रदाय, तिब्बती बौद्ध धर्म के 4 संप्रदायों में सबसे पुराना और दूसरा सबसे बड़ा संप्रदाय है. बौद्ध धर्म के ग्रंथों में पहली बार गणेश जी 11वीं सदी में शामिल किए गए लेकिन वक्त के साथ उनके मायने और स्वरूप, दोनों ही बदलते चले गए.
बौद्ध धर्म में वज्रयान समुदाय – Vajrayana community in Buddhism
कहा जाता है कि बौद्ध धर्मगुरु पद्मसंभव ने जब तांत्रिक साधना के लिए धार्मिक क्रियाएं करने की कोशिश की तो उसमें लगातार विघ्न आने लगे, उसे रोकने के लिए उन्होंने विघ्नहर्ता गणपति को खुश करने का फैसला किया और उन्हें बौद्ध धर्म के धर्मरक्षक के रूप में स्थापित कर दिया. तब से ही गणेश जी को बौद्ध धर्म में भी पूजा जाने लगा.
ध्यान देने वाली बात है कि गणपति की साधना को तांत्रिक बौद्ध परंपरा यानी वज्रयान में काफी अहम माना गया है.
जब बौद्ध धर्म में तंत्र साधना होती है तो उसके रास्ते में आने वाली बाधाओं को विघ्न कहा जाता है और गणपति विघ्नहर्ता कहलाते हैं. इसलिए वज्रयान परंपरा में गणेश जी की साधना तांत्रिक साधना शुरु करने से पहले ही की जाती है ताकि सभी बाधाओं से मुक्ति पाई जा सके. बौद्ध धर्म के वज्रयान समुदाय के लोग गणेश जी के कई रुपों को पूजते हैं.
तीन रूप के गणपति – Three forms of Ganpati
ये महाकाल गणपति, नृत्यरत गणपति और महाबिघ्नेश गणपति, तीनों को ही पूजते हैं. महाकाल गणपति रंग में सफेद होते हैं और उनके हाथों में रत्न या मधुपात्र होता है. बौद्ध धर्म में गणेश जी के इस स्वरूप को धर्म की रक्षा करने वाला और समृद्धि देने वाला माना जाता है. वहीं, अगर बात नृत्यरत गणपति की करें तो ये अलग अलग मुद्राओं में होते हैं, जो उच्च और आंतरिक शक्ति को दिखाता है. वहीं, महाबिघ्नेश गणपति को पाने का रास्ता सबसे कठिन माना जाता है.
तिब्बत में लामावाद – Lamaism in Tibet
आपको बता दें कि तिब्बत में लामावाद चलता है. यहां अलग अलग मठों के बजाय तांत्रिक देवमंडल यानी मंडला महत्वपूर्ण माना जाता है और बौद्ध धर्म में गणपति इन्हीं मंडला का हिस्सा हैं. लामा साधक गणेश जी का आह्वान करते हैं ताकि उनके अनुष्ठानों को समृद्धि मिले और उनसे विघ्न हटे…बौद्ध धर्म में, खासकर वज्रयान परंपरा में गणेश जी का महत्व सबसे अधिक है.
आज गणपति केवल हिन्दू धर्म तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि बौद्ध लोगों के लिए भी गणपति बेहद पूजनीय हैं. केवल भारत या तिब्बत में ही नहीं बल्कि एशिया के अलग अलग देशो में गणपति को अलग अलग नामों और स्वरूप से जाना और पूजा जाता है. लेकिन यह क्लीयर है कि गणेश जी को हर रुप में पूजा ही जाता है. बौद्ध धर्म के गढ़ में बौद्धों द्वारा गणेश जी की पूजा करना, अपने आप में काफी आश्चर्य से भरने वाली बात है.



