Angulimala Cave: इतिहास के पन्नों में कैद, बौद्ध धर्म की महत्वपूर्ण धरोहर अंगुलिमाल गुफा

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Angulimala Cave Captures: बचपन में दूसरी या फिर तीसरी कक्षा में किताबों में एक खूंखार डाकू अंगुलिमाल और गौतम बुद्ध की कथा तो अपने पढ़ी या सुनी ही होगी। अंगुलिमाल जो कि इतना खूंखार था कि जब भी वो किसी को मारता तो उसकी एक छोटी उंगली काट कर अपनी माला में लगा देता। उसके गले में मौजूद उंगलियों की माला के कारण उसे लोगों ने अंगुलिमाल कहना शुरू कर दिया था, जैसे ही शाम ढलती, लोग अपने अपने घरों में दुबक जाते थे, एक बार गौतम बुद्ध वहां पर आये थे और जब गौतम बुद्ध को अंगुलीमाल के आतंक का पता चला तो वो खुद उसे खोजने चले गए।

गौतम बुद्ध ने अंगुलिमाल का सामना बिना घबरायें, बिना डरे किया जिसके कारण अंगुलीमाल की आंखे खुली बुद्ध ने अंगुलीमाल को ज्ञान दिया कि जब जीवन देने का अधिकार उसके पास नहीं है तो वो किसी को मृत्यु कैसे दे सकता है और अंगुलामाल हिंसा छोड़कर बौद्ध भिक्षु बन गया। बुद्ध के कई प्रिय शिष्यों में से एक थे अंगुलिमाल..जो कि आगे चल कर एक प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु बन गए आज उनकी ही कहानी कहती है उत्तर प्रदेश की धरती पर मौजूद अंगुलिमाल गुफा। वो गुफा जो बौद्ध धर्म का मजबूत प्रतीक है।

अंगुलिमाल गुफा का इतिहास – History of Angulimala Cave

दरअसल अंगुलिमाल माल गुफा उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती में स्थित है। श्रावस्ती बौद्द धर्म के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण नगरी है। श्रावस्ती में बुद्ध ने अपना सबसे ज्यादा समय बिताया था, यहीं पर बुद्ध ने दोहरा चमत्कार किया था। और इसी नगरी में स्थित है वो गुफा है जिसमें डाकू अंगुलिमाल रहा करता था। बुद्ध के काल में महेट क्षेत्र में जेतवन के बहुत बड़े भाग में जंगली इलाका जालिनी हुआ करता था।

जहां अंगुलिमाल रहा करता था। उंगलियों की माला पहनने के कारण उसका नाम अंगुलिमाल पड़ा था, लेकिन जब उसने बौद्ध धर्म अपनाया तो उसने अहिंसा के मार्ग पर चलना प्रारंभ कर दिया और उसे नया नाम मिला अहिंसका। जो अहिंसा के रास्ते पर चलता हो। बौद्ध धर्म अपनाने के बाद उन्हें बौद्ध मठ में स्वीकार भी किया गया और उन्होंने अपने परिनिर्वाण तक बौद्ध भिक्षु बन कर बौद्ध धर्म के विचारों का प्रसार प्रचार किया।

अंगुलिमाल स्तूप का इतिहास – History of Angulimala Stupa

बौद्ध धर्म में अंगुलिमाल का प्रभाव इतना ज्यादा था कि उनके नाम से जेतवन से लगभग 700 मीटर की दूरी पर एक स्तूप बनवाया गया , जिसे ‘अंगुलिमाल स्तूप’ या ‘पक्की कुटी’ के नाम से जाना जाता है। जानकारों की माने तो अंगुलिमाल स्तूप का निर्माण खुद अंगुलिमाल ने कराया था। जिसे बनवाने के पीछे का कारण उनकी बुद्ध के प्रति श्रद्दा दर्शाना था। मौजूदा समय में भी बौद्ध धर्म के भिक्षुओं के लिए अंगुलिमा स्तूप एक प्रमुख बौद्ध तीर्थ स्थल है। पूरे साल यह बौद्ध भिक्षुओं का तांता लगा रहा था। वहीं ये गुफा आम को लोगों के लिए भी देखने की परमिशन है।

बौद्ध स्मारक के रूप में संरक्षित

हालांकि मौजूदा समय में इस गुफा की उतनी देखभाल पहले नहीं हुई थी जिसके कारण इसकी स्थिति बिगड़ गई लेकिन अब इसे बौद्ध स्मारक के रूप में संरक्षित कर दिया है। अंगुलिमाल और गौतम बुद्ध के बीच के इस सम्बन्ध को छोटे बच्चों की किताबों तक में पढ़ाया जाता है। क्योंकि सभी जानते है कि केवल बुद्ध ही ऐसे व्यक्ति थे जो अंगुलिमाल जैसे हिंसक आदमी को बिना हिंसा किए धर्म के मार्ग पर ला सकते है, तो फिर बौद्ध धर्म वाकई में कितना महान होगा.. हालांकि विडंबना ये है कि स्कूलों में बौद्ध धर्म के विचारों के बारे में न के बराबर ही पढ़ाया जाता है। अंगुलीमाल और बुद्ध के अटूट रिश्तों की कहानी की तरह अगर बुद्ध के जीवन का एक हिस्सा भी पढ़ाया जाता।

बौद्द धर्म और बुद्ध की शिक्षा के बारे में

अगर वाकई में बौद्द धर्म और बुद्ध की शिक्षा के बारे में पढ़ाया जाता तो शायद जातिगत भेदभाव कब का खत्म हो गया होता। क्योंकि बौद्ध धर्म समानता, अहिंसा और एकसमरूपता के आधार पर चलता है। जो बांटना नहीं बल्कि एकजुट करना सिखाता है। जो व्यक्ति को सही मायने में मुक्ति के मार्ग पर ले जाता है, जो जीवन मरण और मोह के दुखों से दूर ले जाता है। आपको क्या लगता है क्या बौद्ध धर्म के बारे में स्कूलों में भी बच्चों को पढ़ाया जाना चाहिए… शायद तब ही जातिगत भेदभाव की मानसिकता खत्म हो सकेंगी। आपकी इस पर क्या राय है हमें कमेंट करके जरूर बताएं।

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