Death of Hidma: आतंक का दूसरा नाम हिड़मा का अंत इतना गुमनामी भरा क्यों?

Death of Hidma, Who is Hidma
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Death of Hidma: हाल ही में 18 नवंबर को एक खबर सामने आई जिसने एक तरफ देश के सुरक्षा कर्मियों के लिए सालों की तपस्या का फल था, अनगिनत जवानों की शहादत को सम्मान मिला था तो वहीं मीडिया के लिए ही नहीं बल्कि आम लोगों के लिए भी बेहद ही शॉकिंग खबर थी। कुख्यात नक्सली माडवी हिड़मा अपनी पत्नी राजे उर्फ राजक्का समेत मात्र 6 नक्सलियों के साथ एक मामूली मुठभेड़ में मारा गया। 44 साल का हिड़मा, जिसका खौफ छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश के जंगलों में ऐसा था कि वहां जाने के लिए रात तो सोचिए दिन का उजाला भी बेहद भयावह लगता था। जिसे लेकर अक्सर ये बातें होती थी कि क्या ये वाकई में कोई शख्स है या फिर कोई क्रूर पद।

लेकिन इसकी मौत ने सबको हैरान कर दिया। आइए जानते है कि कौन था ये हिड़मा। जो जंगलों में खौफ का दूसरा नाम बन गया था। जिसे मारने के लिए सुरक्षा जवानों ने सालों की तैयारी की थी, लेकिन उसकी मौत एक सर्प्राइज पैकेज बन गई। लेकिन उससे पहले ये जानना जरूरी है कि आखिर कैसे हिड़मा एक कुख्यात हत्यारा बन गया,जिस नक्सलवाद का वो मुखिया और मास्टरमाइंट था.. वो नक्सलवाद कैसे फला फूला..कैसे एक छोटे से गांव से शुरु हुआ एक छोटा सा आंदोलन आज देश की सेना, सरकार और आम जनता के लिए भी आतंक का दूसरा चेहरा बन गया था।

नक्सलवाद की कहानी

ये समय था 1967 का..पश्चिम बंगाल का एक छोटा सा गांव था नक्सलबाड़ी.. इसी गांव में एक शख्स रहता था जो कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का एक प्रमुख नेता था चारू मजूमदार। चारू माजूमदार, जो कि चीन के कम्यूनिस्ट नेता माओत्से तुंग का बहुत बड़ा सपोर्टर और फैन हुआ करता था। चारू माजूमदार का मानना था कि भारतीय श्रमिकों एवं किसानों की  जो भी दुर्दशा है वो असल में सरकारी भ्रष्ट तंत्र के कारण है। सरकारी नीतिया उच्च और कूलीन वर्ग को आगे बढ़ावा देने के लिए गरीब, पिछड़े किसानों के साथ दमनकारी नीतियां अपना रही है, और इस दमन के खिलाफ लड़ने के लिए माजूमदार ने किसानों के हाथों से हल छोड़ कर उनके हाथों में हथियार थमाने की प्लानिंग की लेकिन तब केवल लड़ाई सरकारी तंत्र से थी, और उग्रवाद नहीं था।

कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ मार्क्ससिज्म

हालांकि 1967 में मजूमदार ने ही कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों की एक अखिल भारतीय समन्वय समिति बनाई। और 1968 में कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ मार्क्ससिज्म एंड लेन‌िनिज्म (CPML) का गठन किया गया जिनके मुखिया दीपेन्द्र भट्टाचार्य थे। माजूमदार और कानू सान्याल ने खुद को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग कर लिया, जो लोग विद्रोही हुए वो नक्सलबाड़ी से ही शुरु हुआ था, इस कारण इन्हें नक्सलवादी कहा गया। लेकिन ये लड़ाई तब जंगल संथाल ने भूमि अधिग्रहण को लेकर सरकार के खिलाफ थी।

हालांकि 1971 में मजूमदार की कारावास में हुई मौत के बाद सत्यनारायण सिंह ने आंतरिक विद्रोह किया जो कि हिंसक तरीका अपनाने लगे अपनी बात मनवाने के लिए. जंगली इलाको में हथिहार थाम कर हत्याये करने लगे। धीरे धीरे नक्सलबाद बंगाल से निकल कर छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, झारखंड में भी फैल गया। आज नक्सलवाद देश में एक नासूर की तरह हो चुका है, जिसका इलाज अब व्यापक रूप से शूरू हुआ है। और केंद्र सरकार का एक ही टारगेट है कि मार्च 2026 तक देश को नक्सलवाद से मुक्त करके के दम लेंगे..और इसी की साफ सफाई का सबूत है हिड़मा और उसके साथियां का खात्मा.. जानते है कि कैसे हुआ हिड़मा का खात्मा।

कौन था हिड़मा?

साल 2010 में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा के ताड़मेटला में एक नक्सली हमला हुआ। सेना के करीब 76 जवानो का नरसंहार.. जिसने पूरे राज्य ही नहीं पूरे देश को खून के आंसू रोने पर मजबूर कर दिया था, और पहली बार नाम उछला था माडवी हिड़मा का..जिसे संतोष, इंदमुल उर्फ पोडियाम भीमा समेत कई नामों से बुलाया जाता था। सुकमा  और बस्तर के जंगलों में डर और खौफ का दूसरा नाम बन चुका था हिड़मा। छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के दुर्गम पहाड़ियों और घने जंगलो के बीच बसा एक छोटा सा गांव पूवर्ती.. में 1981 में जन्मा था हिड़मा..जो कि एक आदीवासी परिवार से था।

हिड़मा ने करीब 150 से भी ज्यादा जवानों को मारा

लेकिन माओवादी की सोच को फलित करता एक निषेध बाल संघम संगठन  CPI (माओवादी) की सेंट्रल कमेटी  को उसने मात्र 13 साल की उम्र में ही जॉइन किया था। और वो इकलौता सबसे कम उम्र का सदस्य भी था। वो इतना कुख्यात और शातिर था कि जल्द ही वो 1996 में माओवादियों की पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी PGLA) बटालियन-1 का प्रमुख बन गया। साल 2004 से लेकर अब तक हिड़मा ने करीब 150 से भी ज्यादा जवानों को मारा और वो अब तक 27 बड़े नक्सली हमलो का मास्टरमाइंट भी रह चुका था। हिड़मा माओवादी स्पेशल जोनल कमेटी (DKSZ) का सदस्य भी था। नक्सली हेड रावुला श्रीनिवास रमन्ना की मौत के बाद 2019 में हिड़मा नक्सलियों का कमांडर बन गया। उसने गोलिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग विशेषकर फिलीपींस जा ककर ली थी।

हिड़मा कब प्रचलित हुआ

हिड़मा के गुनाहो की सुची इतनी लंबी है कि शायद लिस्ट ही छोटी पड़ जाये, 1996 में नक्सली संगठन से सक्रिय रूप से जुड़ने वाला हिड़मा 2004 के बाद पूरी तरह से सक्रिय हो गया था। जिसमें 2010 में सीआरपीएफ के जवान हिड़मा को पकड़ने के लिए गए थे लेकिन तभी घाट लगा कर 200 से भी ज्यादा नक्सलियो ने जवानो को घेर कर उनकी निर्मम हत्यायें की.. इस नरसंहार ने पहली बार हिड़मा को सेना और सरकार दोनो की आंखो पर चढ़ा दिया था।

झीरम घाटी नरसंहार

इसके बाद 2013 में झीरम घाटी नरसंहार किया गया। जिसमें कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता की हत्या की गई और उनके साथ ही 27 लोगो की भी हत्याएं की गई। जिसके बाद 2017 में बुरकापाल एम्बुश हुआ, जिसमें आराम कर रहे 25 सीआरपीएफ के जवान शहीद हो गए थे।  वही 2021 सुकमा-बीजापुर मुठभेड़, जिसमें हिड़मा ही मास्टरमाइंड था, और इस हमे में 22 सेना के जवान शहीद हो गए थे।

हिडमा की मौत एंटी-नक्सल ऑपरेशन के इतिहास में सबसे अहम कामयाबी में से एक है। तो वहीं छत्तीसगढ़ पुलिस ने इसे हिड़मा के बगावत के “ताबूत में आखिरी कील” बताया है। इसी के साथ हिड़मा की मौत को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साई लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिज़्म के खिलाफ लड़ाई में एक “निर्णायक कामयाबी” कहा है।

हिड़मा के खिलाफ सेना का ऑपरेशन

छत्तीसगढ़ में हिड़मा को पकड़ने के लिए सेना और एक साथ आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ की सरकार मिलकर ऑपरेशन चला रही थी। हिड़मा जो कि कभी भी नक्सली बनने के बाद अपने घर नहीं आया था, लेकिन बीते कुछ सालो से सेना के नक्सलियों के खात्में के ऑपरेशन के कारण नक्सली हिड़मा अपने ठिकाने बदल रहा था, इसलिए सेना ने हिड़मा के गांव और उसके पड़ोसी गांव में कैंप लगाये है। सरकार लगातार 2024 से नक्सली इलाको में फोर्स कैंप लगा रही है। जिसमें सुकमा के मुलेर,टेकलगुडेम, परिया, पूवर्ती, सलातोंग, लखापाल पुलनपाड़ के साथ साथ दंतेवाड़ा के नेरली घाटी, कांकेर के पानीडोबरी,  नारायणपुर के कस्तूरमेटा,  इरकभट्टी,  मसपुर,  मोहंदी,  बीजापुर के गुंडम, पुतकेल, छुटवही इलाकें जहां नक्सली ज्यादा सक्रिय थे।

वहां अब कैंप खुलने से नक्सली लगातार कमजोर पड़ रह रहे है। और हिड़मा फिर से नक्सलियों को मजबूत करने और एकजुट करने के लिए अपने ठिकानों को एक जगह से दूसरी जगह पर बदल रहा था। लेकिन पिछले कुछ महीनों से करेगुट्टा पहाड़ियों और उससे सटे छत्तीसगढ़-तेलंगाना इंटरस्टेट बॉर्डर पर हिड़मा की ज्यादा गतिविधियों के होने की खुफिया जानकारी सेना को लग रही थी, और सेना तभी से हिड़मा के साथ साथ उसके आतंक को खत्म करने की तैयारी में लगी थी। ऐसा माना जा रहा है कि हिड़मा इस इलाके में किसी बड़े हमले की तैयारी कर रहा था। सेना के साथ हुई इस मुठभेड़ में मारे गए 6 लोगों में हिड़मा के साथ साथ उसकी दूसरी पत्नी मडगाम राजे, एससजेडीसीएम सदस्य, देवे, हिड़मा का रक्षक, कमलू और मल्ला पीपीसीएम सदस्य और लकम डीसीएम के सदस्य थे।

हिड़मा की मौत की कहानी

हिड़मा केवल एक नाम नहीं था, वो एक ऐसी शख्सियत बन गया था, जिसके नाम से ही खौफ जन्म लेता था। ऐसे में जरूरी था कि उसके आतंक को खत्म किया जाये। और इसमें नाम सामने आया माओवादी नेता देवजी का… सूत्रो की माने तो देवजी ने ही हिड़मा के मुखबिरी की थी और उसके आंध्र प्रदेश के एएसआर जिले के रामपचोदवरम उप-मंडल के मारेदुमिल्ली के पास छिपे होने की जानकारी सुरक्षा कर्मचारियों तक पहुंचाई थी। जिसके बाद सुबह 6 बजे से 7 बजे के बीच सेना के जवानो और हिड़मा के बीच मुठभेड़ हुई और जवानो ने हिड़मा, उसकी पत्नी समेत 6 नक्सलियों को मार गिराया।

इन लोगो के पास से इनके पास से 2 एके-47, 1 रिवॉल्वर, 1 पिस्तौल बरामद की गई थी। हिड़मा की मौत के बाद दोनों के शवों को हिड़मा के गांव में ही एक साथ अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान हिड़मा के लिए पूरा गांव इकट्ठा था.. जो बता रहा था कि भले ही पूरे भारत के लिए हिड़मा एक कुख्यात अपराधी थी, एक हत्यारा था लेकिन उसके गांव में उसका सम्मान एक मसीहा से कम नहीं था। हिड़मा की मौत ने आतंक और अपराध का एक पूरा युग खत्म कर दिया है। ऐसा लगता है कि केंद्र-राज्य की मिली-जुली स्ट्रैटेजी से, मार्च 2026 तक भारत पूरी तरह से नक्सल-मुक्त हो जाएगा। जैसा कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार ने मिलकर तय किया है।

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