संविधान निर्माता और अनुच्छेद 370, आखिर क्यों बाबा साहब ने खुद इस मसौदे को तैयार करने से किया था इनकार?

Ambedkar and Constitution, Article 370
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Article 370:  5 अगस्त 2019, ये तारीख भारत के संवैधानिक इतिहास में एक सुनहरें दिन की तरह दर्ज की गई..जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जम्मू कश्मीर को मिलने वाले विशेष राज्य के दर्जे वाले आर्टिकल 370 ए को संविधान से ही रद्द करने का ऐलान किया था। ये इकलौता नियम ही जम्मू कश्मीर को भारत से अलग करता था, और पीएम मोदी ने अखंड भारत की अवधारना को पूरा करते हुए आर्टिकल 370 (Article 370) को रद्द करते उसे भारतीय संविधान की नजर में बाकि के राज्यों के सामान ही बना दिया।

अब सवाल ये उठता है कि आखिर जब बाबा साहब संविधान बना रहे थे तब वो एकजुट और एकसमान भारत की कल्पना करते थे, ऐसे में 370 को क्यों जोड़ा गया..और क्या आर्टिकल 370 को बाबा साहब सच में जोड़ा भी था..नहीं बाबा साहब किसी भी हाल में अपने सपने को टूटते हुए नहीं देखना चाहतो थे, लेकिन मजबूरी में उन्हें ऐसा करना पड़ा.. अपने इस वीडियो में जानेंगे कि जम्मू कश्मीर के लिए विशेष राज्य का दर्जा देने की बात पर बाबा साहब का क्या रिएक्शन था, और क्यों वो अपने ही सिद्धांतो के खिलाफ जाने के लिए मजबूर हो गये थे।

370 आर्टिकल को लेकर बाबा साहब क्या सोचते थे

जब 562 रियासतो को अखंड भारत बनाया जा रहा था, तब जम्मू कश्मीर के राजा हरि सिंह ने भारत में विलय करने से इंकार कर दिया था, वो पाकिस्तान का हिस्सा भी नहीं बनना चाहते थे, लेकिन पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया और मजबूरी में राजा हरि सिंह को भारत से हाथ मिलाना पड़ा, लेकिन यहां उन्होंने कुछ शर्ते रखी.. और यहीं शर्तों का मसौदा था आर्टिकल 370 लेकिन इस मसौदे को तैयार करने के पीछे की कहानी बेहद पेचिदा है। दरअसल 26 अक्टूबर 1947 के दिन भारत में विलय के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू (Prime Minister Pandit Jawaharlal Nehru) के साथ संधि पर हस्ताक्षर किये, जिसमें कहीं भी ये नही था कि जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिया जायेगा।

उस वक्त कानून मंत्री थे बाबा साहब अंबेडकर (Baba Saheb Ambedkar), जो भारत का संविधान तैयार कर रहे थे, हालांकि नेहरू इस बात पर राजी हो गए थे कि राज्य की अपना स्वायतता को बरकरार रखा जायेगा। उस दौरान राजा हरि सिंह ने 5 मार्च, 1948 को शेख अब्दुल्ला को जम्मू कश्मीर का अंतरिम प्रधानमंत्री बना दिया था, और सारा खेल अबदुल्ला का ही शुरु किया हुआ है। शेख अबदुल्ला (Sheikh Abdullah) ने पंडित नेहरू के सामने राज्य के लिए विशेष दर्जा दिए जाने का प्रावधान संविधान में जोड़ने की अपील की, नेहरू बिना झिझक मान गए और उन्होंने बाबा साहब के पास भेज दिया।

क्या कहा था बाबा साहब ने

जब शेख अबदुल्ला ने अपनी शर्त के बारे में बाबा साहब को बताया तो बाबा साहब ने दो टूक जवाब दिया कि शेख अदुल्ला चाहते है कि भारत कश्मीर की सीमाओ की रक्षा करें, उन्हें आर्थिक तौर पर मदद करें, उसके विकास में मदद करें, उन्हें भूखमरी से बचाने के लिए अनाज दें, उनकी सड़के बनवाये, लेकिन ये सब करने के बाद भी भारत का अधिकार कश्मीर पर सीमित होगा.. बाबा साहब ने कहा कि अगर केंद्र जम्मू कश्मीर के लिए इतना कुछ करेंगा तो फिर उसे भी तो बाकि के राज्यों के बराबर ही दर्जा मिलना चाहिए.. वो किसी भी हाल में जम्मू कश्मीर के विशेष राज्य का दर्जा देने वाला मसौदा तैयार नहीं करेंगे। सच तो ये है कि ये मसौदा भारत के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात होगा,और बाबा साहब ने ये मसौदा तैयार ही नहीं किया।

कैसे बना आर्टिकल 370

जब पंडित नेहरू को बाबा साहब के इंकार का पता चला तो उन्होंने इसका काम महाराजा हरि सिंह के पूर्व दीवान और संविधान सभा के एक और सदस्य गोपालस्वामी आयंगर को इसका काम दिया गया, और उन्होंने मसौदा तैयार भी किया। लेकिन इसी बीच आयंगर और शेख अबदुल्ला के बीच काफी तीखी बहस हुई, क्योंकि आयंगर किसी भी हाल में जैसा शेख अब्दुल्ला चाहते थे, वैसा मसौदा तैयार करने के लिए राजी नहीं थे।

वो अबदुल्ला की बातों से तंग आकर एक बार संविधान सभा से त्यागपत्र देने के लिए तैयार हो गए थे। हालांकि आयंगर ने मसौदा तैयार तो किया था कि लेकिन उन्होंने अपनी मर्जी के इसकी उपधारा-1 के दूसरे बिंदू में बदलाव कर दिया, जिसके अनुसार अनुच्‍छेद-370 को  जम्मू -कश्मीर राज्य के संदर्भ में अस्थाई विधान बना दिया गया था। और ये ऐसे ही पास भी कर दिया गया। जो आज के समय में बीजेपी सरकार के लिए मील का पत्थर साबित हुई और इसके दम पर ही आर्टिकल 370 को रद्द कर दिया गया। यानि की बाबा साहब अंबेडकर ने कभी भी आर्टिकल 370 का समर्थन किया ही नहीं और न ही उसे तैयार किया था। जो बताता है कि बाबा साहब अपने उसूलो के कितने मजबूत थे।     

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