Creamy layer: अनुसूचित जातियों (एससी) पर क्रीमी लेयर  की अवधारना क्या है, जिसपर पूर्व सीजेआई गवईं ने दिया बड़ा बदलाव

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Creamy layer:  अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस बी आर गंवई ने आरक्षण में क्रीमी लेयर को एससीएसटी वर्ग के लिए भी लागू करने की बात की है जिसके कारण काफी विवाद हो गया। नतीजा बीआर गंवई को अपने ही समाज से आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। इतना ही नहीं क्रीमी लेयर के सिद्धांत को अनुसूचित जाति जनजाति के लिए लागू करने को लेकर उन पर निशाना साधा जा रहा है कि उन्होंने खुद तो आरक्षण का लाभ ले लिया और अब बाकियों के लिए ज्ञान दे रहे है। अब सवाल ये उठता है कि आखिर क्या है ये क्रीमी लेयर और क्यों इसे एससी एसटी वर्ग के लिए भी लागू करने की मांग की जा रही है।

क्रीमी लेयर की अवधारणा आई कहां से है?

दरअसल ये मुद्दा पहली बार उठा था 1992 में, जब इंदिरा साहनी का मामला उठा था। इस मामले में पहली बार ओबीसी वर्ग को लेकर फैसला किया था कि जो ओबीसी वर्ग आर्थिक और सामाजिक रूप से इतना सम्पन्न हो चुका है, इतना आगे बढ़ चुका है कि उन्हें अब आरक्षण के लाभ की कोई जरूरत ही नहीं है, उन्हें क्रीमी लेयर की अवधारणा के तहत आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। 13 अगस्त, 1990 को तत्कालीन पीएम वीपी सिंह की सरकार की तरफ से फैसला किया गया था कि सामाजिक और शैक्षिक रूप से (ओबीसी) के लिए सिविल पदों और सेवाओं में 27% आरक्षण की अधिसूचना जारी की थी।

नौ-न्यायाधीशों की पीठ ने फैसला सुनाया

लेकिन इंदिरा साहनी ने इस फैसले को चुनौती दी थी, जिसके बाद 16 नवंबर, 1992 को जस्टिस बीपी जीवन रेड्डी की अध्यक्षता वाली नौ-न्यायाधीशों की पीठ ने फैसला सुनाया था कि ओबीसी वर्ग में जो लोग क्रीमी लेयर की अवधारणा में फिट बैठते है उन्हें इसका लाभ नहीं दिया जाएगा,  बाकी वंचित के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण तय रहेगा। हालांकि ये अवधारणा तब भी केवल ओबीसी वर्ग में ही लागू की गई थी। वहीं इस मुद्दे पर अगस्त साल 2024 में केंद्र सरकार ने अपना रुख साफ करते हुए कहा था कि वो एससीएसटी वर्ग के लिए इस अवधारणा को लागू नहीं करेंगे क्योंकि संविधान में कहीं भी ऐसी किसी अवधारणा के बारे में जिक्र नहीं है।

कैसे होती है पहचान

  • ओबीसी वर्ग के लिए क्रीमी लेयर वाले को पहचानने के लिए कुछ नियम बनाए गए जिसमें
  • ओबीसी वर्ग से आने वाले व्यक्ति का  संवैधानिक अथवा कानूनी पद क्या है ये देखा जायेगा,
  • केंद्रीय और राज्य सरकारों के ग्रुप ‘A’ और ग्रुप ‘B’ के अधिकारी, पीएसयू,  सांविधिक निकायों व विश्वविद्यालयों के कर्मचारी जो आर्थिक रूप से मजबूत होते है।
  • सशस्त्र बलों में कर्नल व इनसे ऊपर रैंक के अध‍िकारी और अर्धसैनिक बलों में इनके बराबर के पदों वाले अधिकारी जिनकी आय काफी अच्छी होती है।
  • डॉक्टर, वकील, प्रबंधन सलाहकार, इंजीनियर जैसे पेशेवर, जो अच्छी खासी आय पाते है।
  • कृषि भूमि या परती जमीन और या भवन के मालिक और इनकम टैक्स, या हाउस टैक्स भरने वाले लोग। इनमें से किसी भी अवधारणा को पूरा करने वाले को ओबीसी आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।

क्या बोले जस्टिस गंवई

जस्टिस गंवई ने अब इस मुद्दे को फिर से हवा दे दी है। उन्होंने ओबीसी वर्ग की ही तरह एससीएसटी वर्ग के लिए क्रीमी लेयर की अवधारणा तय करने का सुझाव दिया है। उन्होंने कहा कि आरक्षण को बाबा साहब ने एक साइकिल की तरह दिया था ताकि अनुसूचित जाति जनजाति के लोग उस पर बैठ कर आगे बढ़  सकें लेकिन जो आगे बढ़ गए है उन्हें साइकिल से उतार देना चाहिए और वो साइकिल उनको मिलनी चाहिए जिसे उनकी वाकई में जरूरत है। न कि आर्थिक और सामाजिक रूप में विकसित हो चुके, आर्थिक संपन्न हो चुके लोगों को भी इसका लाभ मिलते रहना चाहिए, इससे गरीब और कमजोर तबके के हाथों में कभी भी ताकत नहीं आएगी।

जातिगत आरक्षण का लाभ

ओबीसी वर्ग के लिए ये नियम लागू कर दिया गया है तो फिर एससीएसटी वर्ग के लिए क्यों नहीं। जबकि जिन बच्चों के माता पिता सरकारी नौकरियों का लाभ ले रहे है और जिनकी वार्षिक आय 8 लाख रुपए से ज्यादा है तो उनके बच्चों को क्रीमी लेयर के तहत ही रखा जाना चाहिए। आर्थिक रूप से मजबूत होने के बाद भी केवल अनुसूचित जाति जनजाति से होने के कारण उन्हें जातिगत आरक्षण का लाभ मिलता है, जिसमें अक्सर रिश्वत की लेन देन भी होती है, और पहले से सम्पन्न लोगों के बच्चों को ही वो पद दे दिए जाते है, और जो वाकई में वंचित है वो इस लाभ से वंचित ही रह जाते है।

हालांकि आरक्षण को लेकर लगातार बहस चलती रहती है, लेकिन जस्टिस गंवई की बात को लेकर एससीएसटी वर्ग दो अलग अलग धड़ों में बंट गया है जिसमें से एक धड़ा इसे सही बता रहा है तो एक धड़ा इसके खिलाफ है। वैसे हम आपसे पूछना चाहते है कि क्या आपको भी लगता है कि एससीएसटी वर्ग के लिए भी क्रीमी लेयर की अवधारणा लागू होनी चाहिए ताकि गरीब और कमजोर लोगों को भी उचित लाभ मिल सकें।

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