Caste in Indian Media: एक किताब, जिसमें दर्ज है मीडिया में दलित-बहुजनों के प्रति हिकारत के दास्तान

Caste in Indian Media
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Caste in Indian Media: दलितों की स्थिति, बहुजनों को साथ होने वाले भेदभाव पर पहले भी अनगिनत किताबें छपी है, खुद भारत रत्न और दलितों के भगवान कहलाने वाले बाबा साहब डॉ भीम राव अंबेडकर ने भी WHO WERE THE SHUDRAS और annihilation of caste जैसी मशहूर किताबें लिखी है, जिसमें जातिवाद और जातिवाद के पनपने से लेकर कैसे उसे खत्म किया जा सकता है उसपर किताब लिखी थी। कई नामी ऑथर हुए जिन्होंने जातिवाद, भेदभाव और सामाजिक विचारधारा को लेकर काफी कुछ कहा है, लेकिन इन संगीन और संवेदनशील मुद्दो पर मीडिया  की राय और बहुजनों के प्रति किस तरह का व्यावहार होता है, उस पर चर्चा कम की जाती है।

लेकिन 2026 में एक ऐसी किताब छपी है, जिसमें मिडिया का नजरिया बहुजन समाज को लेकर कैसा है, उसका पर्दाफाश किया गया है। इस किताब का नाम है बिहार की चौथी दुनिया.. जिसे मशहूर लेखक अली अलवर ने लिखी है, जो असल में चौथे वर्ण यानि की शूद्रों और भारत के चौथे स्तंभ मीडिया को केंद्रित करते हुए लिखी गई है। इस लेख में इस किताब का एक छोटा का विष्लेशन करेंगे, और साथ ही जानेंगे कि भारत की मीडिया का चौथे वर्ण को लेकर क्या अवधारनायें है।

क्या है इस किताब में

बिहार की चौथी दुनिया किताब 2026 में ही प्रकाशित हुई है, जिसे नोएडा के सेतु प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। किताब के लेखक है अली अनवर। किताब के छपने के बाद से ही ये काफी पसंद किया जा रहा है। ये किताब असल मायने में देश के चौथें स्तंभ मीडिया की भूमिका और उस चौथे स्तंभ की ताकत असल में बहुजनो के लिए कितना कार्यरत है उस पर डिटेल में चर्चा की गई है। अली अनवर ने उन पत्रकारों में से एक है जिन्होंने ‘जनशक्ति’ से लेकर ‘जनसत्ता’ तक काम किया था, हालांकि 1990 में पसमांदा आंदोलन से जुड़ने के बाद उन्होंने पत्रकारिता को छोड़ कर पसमांदा मुसलमानो के लिए आवाज उठाना शुरु कर दिया।

बिहार में पसमांदा आंदोलन

पसमांदा मुसलमान असल में इस्लाम धर्म के वो मुसलमान है, जो कि दलित होते है, या फिर दलित जो धर्म परिवर्तन करके इस्लाम में आये है। ये भले ही इस्लाम अपना लें लेकिन ये हमेशा दलित ही रहते है, इन्हें पसमांदा मुसलमान कहा जाता है। अला अनवर ने बिहार में पसमांदा आंदोलन से जुड़ने के बाद दलित मुसलमानों की स्थिति पर भी  ‘मसावत की जंग’ (2001) और ‘सम्पूर्ण दलित आन्दोलन : पसमांदा तसव्वुर’ (2023) जैसी प्रसिद्ध किताबें लिखी।

अली अनवर मानते है कि जब उन्होंने बिहार में ग्राउंड रिपोर्टिंग शुरु की, तो ये समझ पाये कि समानता की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए केवल हिंदू बनाम मुस्लिम का फर्क दिखा कर नहीं जीता जा सकता है, क्योंकि धार्मिक आधार पर नहीं बल्कि जातिगत आधार पर भी भेदभाव झेला जा रहा है, जिसके कारण उन्हें पसमांदा आंदोलन जैसे मुद्दे से जुड़ने की प्रेरणा मिली।

अपनी नई किताब बिहार की चौथी दुनिया में उन्होंने काफी बारिकी से कुछ ऐसे मुद्दो को उठाया है जो ये बताते है कि पत्रकारिता में भी निश्पक्षता नहीं है। उन्होंने करीब 20 ऐसे पत्रकारों की जीवनी को शामिल किया है जिन्हें जाति आधारित प्रताड़ना कार्यक्षेत्र में झेलनी पड़ी है। इसमें सवर्ण समाज से आने वाले मालिकों, मैनेजरों और संपादकों द्वारा किया गया भेदभाव, दलित और आदिवासी पत्रकारों को कभी भी भरोसा ही नहीं दिला सकां कि वो बिना भेदभाव के आदाज पत्रकारिता कर सकते है। उनके दायरे तय थे, औऱ उनके बाहर निकलने की कोशिश मात्र ही उनके करियर को तबाह कर सकती थी।

पत्रकार महिलाओं के साथ जातिगत भेदभाव

हम इस बात को कभी झुठला ही नहीं सकते कि आज भी इस चौथी दुनिया पर सवर्णों का बोलबाला है, और महिलाओ की भुनिका कम और कमजोर है। उन्हें अवसर भी कम मिलते है। हालांकि अली अनवर ने किताब में पसमांदा समाज से ज्यादा दलितो का मुद्दा उठाया है। किताब में पुरुष पत्रकारों को ज्यादा जगह दी गई है, अनवर कहते है कि कई नामी पत्रकार महिलाओं को न केवल जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा बल्कि उन्हें शारीरिक उत्पीड़न से भी गुजरना पड़ा।

आज मीडिया इतना तरक्की कर चुका है लेकिन फिर भी महिलाओ को फील्ड में उतारने के बजाये उन्हें डेस्क पर रखा जाता है, बेहद कम लोगो को फील्ड में आने का मौका मिलता है, वजह साफ है कि चैनल मालिक उन्हें इस काबिल नहीं समझते कि वो विपरीत परस्थितियों में पुरुषों से बेहतर कर सकते है।

शसक्त महिला को कैसे स्वीकार किया

अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाली, आवाज उठाने वाली महिलाओं को तो आज भी समाज का एक बड़ा तबका पसंद नहीं किया जाता है, फिर एक जागरूक और शसक्त महिला को कैसे स्वीकार किया जाये। इसके लिए मशहूर महिला पत्रकार इन्दु भारती का जिक्र किया गया है जिन्हें नौकरी से “बिना किसी नोटिस” दिए निकाला गया क्योंकि वह “यूनियन की गतिविधियों में शामिल थीं” और अपने विचार स्वतंत्रता से रखती थी। वहीं एक और आदिवासी समाज से आने वाले पत्रकार हेमंत  के बारे में भी चर्चा की गई है, क्योंकि उन्होंने तब आदिवासी, पिछड़े दबे कुचले लोगो के लिए लिखना शुरु किया था जब किसी निचली जाती के पत्रकार को अपने विचार लिखने तक की इजाजत नहीं थी।

प्रोमोशन मेरिट के आधार पर नहीं बल्कि कास्ट नेटवर्क के आधार

इस कारण सवर्णों ने उन्हें आदिवासी डोम कहना शुरु कर दिया.. जातिवाद इतना प्रबल रहा कि औसल दर्जे के पत्रकारों को भी मौका मिलता, लेकिन काबिल दलित पत्रकारों की अवहेलना की जाती थी। सवर्णो को गॉडफादर आसानी से मिल जाते है लेकिन दलितों को नहीं.. यहां तक कि प्रोमोशन भी मेरिट के आधार पर नहीं बल्कि कास्ट नेटवर्क के आधार पर मिलता है। गौर करने वाली है कि आप तमाम अखबार और न्यूज चैनल उठा लिजिये कहीं भी मीडिया संस्थानों में मुख्य संपादक की भूमिका में दलित, बहुजन या आदिवासी समाज से नहीं आया है।

मीडिया में भी जातिवाद कूट कूट कर भर हुआ है, चाहे वो इग्लिंश का हो या हिंदी, बिहार के बाहर के संस्थानो की स्थिति भी समान है। ये किताब बताती है कि जानबूझ कर दलितों और पिछड़ो के आदोंलन को नकारात्मक दर्शाया गया ताकि उनकी स्थिति कभी सही न हो, और ऐसा करने वाले भी सवर्ण पत्रकार ही थे, जिन्हें लोग सुनते थे। ये किताब आईना है पत्रकारिता के क्षेत्र में पिछड़ो औक आदावासियों के प्रति उदासिनता का। जिसके कारण दबे कुचले वर्ग के लिए असल में कभी आवाज बुलंद करने की हिम्मत ही न पायें। आपको भी ये किताब एक बार पढ़नी चाहिए।

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