Poona Pact History: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और बाबा साहब अंबेडकर के बीच के रिश्ता हमेशा तनाव भरा था। बाबा साहब ने हमेशा महात्मा गांधी को दोहरी छवि वाला शख्स कहा था, तो वहीं दलितों को लेकर बाबा साहब जिस तरह का बदलाव चाहते थे, उसे लेकर महात्मा गांधी कभी खुश नहीं थे, जिसका एक सबसे बड़ा उदाहरण देखने को मिला था पूना पैक्ट में..जब महात्मा गांधी के कारण बाबा साहब को न केवल हार का सामना करना पड़ा था, बल्कि दलितो को कभी अलग पहचान नहीं मिल सकी.. हालांकि इसी पूना पैक्ट के बदौलत आज दलित शिक्षित भी है।
पूना पैक्ट का एक बड़ा बदलाव दलितों की जीवन दिशा को बदलने में काफी अहम था। अपने इस लेख में हम जानेगें कि पूना पैक्ट के दौरान बाबा साहब ने आखिर कौन सा बदलाव किया जिससे दलितो औप बहुजनों को पढ़ने का अधिकार मिला..और कौन सी एक लाइन को बाबा साहब ने जरूरी न समझ कर हटवाने की बात की थी।
दलित मंदिर की लड़ाई का बिगुल बजाते
1927 में जब बाबा साहब ने महार आंदोलन किया था तब केवल सार्वजनिक तलाब से पानी पीने की ही लड़ाई नहीं थी, बल्कि इस लड़ाई में दलितो ने अपनी लिए मंदिर में प्रवेश करने की भी लड़ाई लड़ना शुरु कर दिया था, लेकिन उससे पहले की दलित मंदिर की लड़ाई का बिगुल बजाते, सवर्णों ने उन पर हमला कर दिया था और दलितों की हिम्मत टूट गई थी और वो लड़ाई शांत अधूरी रह गई थी..
लेकिन महार आंदोलन ब्रिटिश सरकार के नजरों में आ गई और वो बाबा साहब के अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग मानने के लिए राजी हो गए थे लेकिन इस जगह बाबा साहब का सपना तोड़ दिया महात्मा गांधी ने, जिन्होंने अगल निर्वाचन क्षेत्र की मांग के खिलाफ आमरन अनशन शुरु कर दिया.. और तब नींव रखी गई पूना पैक्ट की।
जातिगत और समाजिक भेदभाव बढ़ेगा
दरअसल ब्रिटिश तत्कालीन प्रधानमंत्री जेम्स रामस्य मक्डोनल्ड ने लोथियन रिपोर्ट 1932 आधार पर अछूतों को दो वोटो का अधिकार दे दिया था, जिसमें अछूत एक वोट अपने लिए अछूत प्रतिनीधि चुनने के लिए करते और दूसरे वोट से अन्य जाति के प्रतिनिधि का चुनाव कर सकेंगे। इससे अलग निर्वाचित क्षेत्र में उम्मीदवार भी अछूत वर्ग का तथा मतदाता भी केवल अछूत वर्ग के ही होता, लेकिन महात्मा गांधी ने ये दलील दी कि उससे जातिगत और समाजिक भेदभाव बढ़ेगा, इसलिए ये नहीं होना चाहिए।
ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा
20 सितंबर 1932 को गांधी जी ने इस नियम के खिलाफ अनशन शुरु कर दिया, जिससे बाद ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा और 24 सितंबर 1932 को राजेंद्र प्रसाद व मदन मोहन मालवीय और बाबा साहब के उपस्थिति में एक लिखित दस्तावेज तैयार किया गया, जिसे पूना पैक्ट कहा गया। कहा जाता है कि इसमें कुछ नियमों को हटाते हुए बाबा साहब की आंखो में आंसू थे। जिसके तहत दो वोटो का अधिकार और अलग निर्वाचन देने पर अहमति को स्वीकार किया गया तो वहीं इसमें इस बात पर स्वीकृति बनी कि अब से दलित पिछडों को सामाजिक व्याय के लिए मंदिरों में प्रवेश करने दिया जायेगा, लेकिन सदियों की इस लड़ाई पर बाबा साहब ने खुद विराम लगा दिया और उन्होंने ये क्लॉज ही बदलवा दिया..
क्या डाला नया क्लोज
पूना पैक्ट से बाबा साहब पहले ही काफी टूट चुके थे, लेकिन दलितों के उत्थान को लिए उनकी सोच और लडाई तब भी जारी थी, उन्होंने तय कर लिया था कि पूना पैक्ट ने भले ही उनका सपना तोड़ा हो, लेकिन वो यरवडा जेल से खाली हाथ तो नहीं जायेंगे। उन्होंने मंदिर में प्रवेश करने के क्लॉज को मानने से इंकार कर दिया था, बाबा साहब खुद काफी पढ़े लिखे थे और वो दलितो के लिए शिक्षा को महत्व देते थे, वो जानते थे कि सामाजिक बराबरी मंदिर जाने से नहीं बल्कि शिक्षा के दम पर ही हासिल की जा सकती है, और उन्होंने पूना पैक्ट में मंदिर में प्रवेश की अनुमति का क्लॉज हटा कर ये डलवाया कि केंद्रिय बजट का एक हिस्सा दलितों और अछूतों की शिक्षा पर खर्च किया जायेगा, ताकि वो बिना किसी रोक टोक और भेदभाव के शिक्षा हासिल कर सकें।
आजीवन जातिगत भेदभाव के खिलाफ लड़ाई लड़ी
बाबा साहब आज अगल दलितों, पिछ़ड़ो के बीच भगवान की तरह पूजे जाते है तो उसके पीछे उनके लिए बाबा साहब का समर्पण शामिल है, उन्होंने आजीवन जातिगत भेदभाव के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। उन्होंने दलितों पिछड़ों को उंचा उठाने के लिए कई कानून बनायें, उन्होंने एक ऐसा संविधान बनाया जो पिछड़ों को आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत करने वाला था।
पूना पैक्ट ने भले ही बाबा साहब को तकलीफ पहुंचाई हो, वो गांधी जी के जिद के आगे झुक गए हो लेकिन उन्होंने उस हार में भी दलितों के लिए जीत खोज ली थी। ऐसे थे बाबा साहब और उनकी दलितों के प्रति ईमानदारी.. आपको बाबा साहब का ये किरदार कैसा लगा.. हारते हुए भी अपने लोगो के बारे में भला सोचने का काम केवल वो ही लोग कर सकते है जिन्होंने अपना सारा जीवन दलितों का जीवन सुधारने में लगा दिया था। बाबा साहब के इस किरदार से आप कितना प्रभावित है।


