Buddha as Vishnu Avatar: अहिंसा का संदेश, क्यों भगवान विष्णु ने बुद्ध के रूप में जन्म लिया?

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Buddha as Vishnu Avatar: बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध के बारे में केवल बौद्ध धर्म में ही नहीं बल्कि हिंदू धर्म में भी उनके स्वरूप को लेकर काफी चर्चा होती है, एक तरफ बौद्ध धर्म के लोगो का मानना है कि बुद्ध एक सामान्य मानव थे जिन्होंने अपने तप के बल पर बुद्धत्व को प्राप्त किया था, और बुद्ध कहलाये, जिन्होंने मानवों को मृत्यु लोक में रह कर वो उपाय बताये जिससे व्यक्ति जीवन मरण के चक्र से आजादी पाये और वो अपने दुखो से निकल कर मोक्ष के रास्ते पर चले… वहीं हिंदू धर्म में अलग ही मान्यता है कि बुद्ध असल में त्रिदेवो में से एक श्री हरि विष्णु के अवतार है।

जिन्होंने संसार में दुखो को कम करने के लिए अवतार लिया था, दोनो धर्मो की सोच में इतनी भ्रांति होने के कारण अक्सर दोनो का टकराव हो ही जाता है, ऐसे में सवाल ये उठता है कि बुद्ध असल में थे कौन… क्या वो एक सामान्य मानव थे, या फिर सच में वो विष्णु के ही एक अवतारो में एक है। अपने इस वीडियो में इस सच को डिटेल में जानने की कोशिश करेंगे.. और इस विवाद को भी समझेंगे कि क्या वाकई में इस विवाद का कोई आधार है।

श्री हरि विष्णु और उनके अवतारों की कहानी

हिंदू धर्म की मान्यतओ के अनुसार श्री विष्णु त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु और महादेव में से एक है, विष्णु जी जगत के पालनहार है। वो इस दुनिया को चला रहे है, उन्होंने संसार के कल्याण और राक्षसो के विनाश के लिए संसार में कई बार जन्म लिया या फि अवतरित हुए है। जिसमें चारो युगो में अलग अलग समय पर संसार में आने की बात कही गई है, जैसे कि मत्स्य, कूर्म और वराह अवतार उन्होंने सतयुग में लिया था, वहीं त्रेता युग में उन्होंने  नरसिंह, वामन, परशुराम और राम के रूप में संसार में आगमन किया था।

जिसके बाद द्वापर युग में उन्होंने कृष्ण और वेंकटेश्वर के रूप में जन्म लिया, वहीं कलयुग में बुद्ध अवतार और फिर कलयुग के अंत में अंतिम कल्कि अवतार लेंगे। अब सवाल ये उठता है कि क्या विष्णु जी के नौवा अवतार बुद्द ही बोद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध है.. आइये जानते है कि क्या है इसके पीछे की सच्चाई।

जानें कौन है बुद्ध?

भागवत पुराण और अग्नि पुराण के अनुसार श्री हरि विष्णु ने असुरों के अंत के लिए उन्हें धर्म का और वेदों का गलत इस्तेमाल करने से रोकने के लिए बुद्ध का अवतार लिया था। कथा के अनुसार भगवान बुद्धदेव का जन्म गया के समीप कीकट में हुआ था, भगवान बुद्धदेव के पिता का नाम अजन बताया गया है। यह प्रसंग पुराण वर्णित बुद्धावतार का ही है, जो विष्णु के नौवे अवतार कहलाते है। कहा जाता है कि समय के साथ दैत्यों ने ये समझ लिया था कि एक लंबी और स्थिर शासन व्यवस्था के लिए पूजा पाठ- यज्ञ और वेदविहित आचरण होना आवश्यक है, तभी देवताओं को उन्हें हराने का मौका नहीं मिल सकेगा।

विष्णु ने संसार के हित के लिए बुद्ध का अवतार लिया

हालांकि दैत्यों की प्रवृति फिर भी नहीं बदली थी, लेकिन वेदो का इस्तेमाल करके उन्होंने यज्ञ आदि किया, जिससे देवताओं की शक्ति कमजोर होने लगी और दैत्य मजबूत होते गए। अपनी शक्ति को बचाने के लिए तब देवताओं ने विष्णु जी से इसका उपाय निकालने का आग्रह किया था। और तभी भगवान विष्णु ने संसार के हित के लिए बुद्ध का अवतार लिया जो कि हाथों में मार्जनी रखते थे और वे रास्ते को बुहारते हुए चलते थे। उनकी शांत छवि जब दैत्यों ने देखी तो वो उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकें…प्रभाव के कारण बुद्ध ने दैत्यों को उपदेश दिया कि यज्ञ करना असल में दैत्यों के लिए पापकर्म है, क्योंकि यज्ञ की अग्नि से कितने ही प्राणी भस्म हो जाते हैं, जिसे जीव हिंसा करने के पाप में सम्मिलित किया जाता है। यज्ञ और धर्मकांड के कारण पशुओ की बलि दी जाती थी।

जिससे इंसानी हिंसा तो नहीं होती थी लेकिन पशु हिंसा जरूर होती थी भगवान बुद्ध के उपदेश से दैत्य प्रभावित हो गए और उन्होंने यज्ञ और वैदिक आचरण का त्याग कर दिया। इसके कारण उनकी शक्ति फिर से कम हो गई। जिससे देवताओं को फिर से अपना राजपाट हासिल करने का मौका मिला। उन्होंने देत्यों का सर्वनाश कर दिया। यानि की बुद्ध अवतार लेने के दो कारण थे, पहला पशु हिंसा को रोकना और दूसरा असुरों के अंत के लिए उन्हें वेदों के दुरुपयोग को रोकना।

गौतम बुद्ध की कहानी

अब बात करते है कि क्या गौतम बुद्ध और भगवान बुद्ध एक ही थे, तो आपको बता दें कि नहीं… दरअसल पौराणिक ग्रंथों के अनुसार भगवान बुद्ध विष्णु के नौवे अवतार थे, लेकिन जब हम गौतम बुद्ध की बात करते है तो वो विष्णु अवतार से अलग है। इसके कई प्रमाण भी है, जिसमें गौतम बुद्ध एक क्षत्रिय वंश में जन्मे राजकुमार सिद्दार्थ है, जो कि कपिलवस्तु के लुम्बिनी में शाक्य राजा शुद्धोधन के बेटे थे। जिन्होंने बचपन में ही अपनी मां को खो दिया, वो करूणा की भावना को सर्वोपरि मानते थे, लेकिन जब उन्होंने व्यक्ति को दुखी देखा तो ये जानने के लिए तप किया कि व्यक्ति को दुख क्यों होता है। अपने परिवार का त्याग किया और घर छोड़ दिया।

बौद्ध धर्म के प्रसार प्रचार

उन्हें बिहार के गया में ही बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान मिला। उन्होंने ‘धम्म चक्र प्रवर्तन के जरिए चार आर्य सत्य, अष्टांगिक मार्ग और पंचशील के सिद्धांतों पर उपदेश दिए, जो बौद्ध धर्म के प्रसार प्रचार का बड़ा कारक है। उन्होंने व्यक्ति को हिंसा और पापकर्म छोड़ कर सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया था, उन्होंने मन की शांति और मोक्ष का रास्ता प्रदर्शित किया था।

लेकिन अब सवाल ये है कि दोनो को कभी कभी एक क्यों माना जाता है.. दरअसल इसके पीछे का मत कहीं न कहीं वैष्णव परंपरा को मानने वाले ब्राह्मणों का फैलाया भ्रम जाल हो सकता है। गौतम बुदेध को विष्णु के अवतार के तौर पर ब्राह्मणों द्वारा स्वीकारणा कहीं न कहीं एक रणनीतिक कारण हो सकता है कि बौद्ध धर्म के लोग खुद को हिंदू धर्म से ही जोड़ कर देखने लगे और बौद्ध धर्म छेड़ कर हिंदू धर्म को माने।

हिंदू धर्म के वौदिक कर्मकांड से बिल्कुल अलग

गौतम बुद्ध ने कभी भी स्वयं को भगवान नहीं कहा, वो खुद को मानव मानते थे, जिन्होंने अपनी साधना के बल पर बुद्धत्व को प्राप्त किया है और हर वो शख्स जो उनकी तरह साधना करेगा, वो बुद्धत्व को प्राप्त कर सकता है। गौतम बुद्द का रास्ता हिंदू धर्म के वौदिक कर्मकांड से बिल्कुल अलग था। वहीं गया जिले में ही ज्ञान प्राप्त करने के कारण हो सकता है कि दोनो को जोड़ कर देखा जाता हो। इन सभी कारणों को देखते हुए हम ये कह सकते है कि भगवान बुद्ध और बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध अलग अलग थे, न की एक ही। आपकी इस पर क्या राय है हमें कमेंट करके जरूर बतायें।

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