Badrinath-Buddhist Connection: बौद्ध धर्म एक ऐसा धर्म है जिसके विस्तार की कई कहानी सुनने को मिलती है। अब तक ऐसे कई अवशेष मिले है जो ये साबित भी करते है कि आज जो हिंदू मंदिर या फिर इस्लामिक मस्जिद है वो कभी बौद्ध बिहार और मठ हुआ करते थे। चाहे आप अयोध्या में बाबरी मस्जिद के टूटने के बाद वहां हुई खुदाई में मिले बौद्ध अवशेष हो या फिर 2020 में मिले सोमनाथ मंदिर के नीचे बौद्ध गुफाएं।
ज्यादातर हिंदू मंदिरों में बौद्ध संस्कृति की झलक नजर आती है, लेकिन एक ऐसा मंदिर भी है जो हिंदुओं का प्रमुख धाम है लेकिन वहां न केवल मंदिर की संरचना बल्कि मूर्ति तक बौद्ध धर्म से प्रेरित लगती है, यहां तक कि मुख्य मूर्ति को तो कुछ लोग बुद्ध की प्रतिमा होने का दावा करते है। जी हां हम बात कर रहे हैं।
बद्रीनाथ मंदिर की कहानी
हिंदुओं के चार प्रमुख धामों में से एक धाम बद्रीनाथ धाम की। बद्रीनाथ धाम जिसे आज के स्वरूप में स्थापित करने का श्रेय आदि गुरु शंकराचार्य को जाता है, लेकिन मंदिर की संरचना और उसकी मूर्ति की बनावट को देखकर दावा किया जाता है कि वो हिन्दू धाम होने से पहले बौद्ध मठ था। अपने इस वीडियो में हम जानने की कोशिश करेंगे कि इस दावे के कितनी सच्चाई है और क्या सच में बद्रीनाथ धाम कभी बौद्ध विहार था। बद्रीनाथ मंदिर जो कि उत्तराखंड के चमोली जिले में अलकनंदा नदी के किनारे स्थित है|
हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ये हिंदू धर्म के चार प्रमुख धामों, जगन्नाथपुरी , द्वारका, रामेश्वरम और बद्रीनाथ में से एक है। ये मंदिर त्रिदेवों में से एक पालनकर्ता भगवान विष्णु को समर्पित है। इस मंदिर को आठवीं सदी में आदि गुरु शंकराचार्य ने स्थापित किया था। जो कि मंदिर समुद्र तल से 3133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है वहीं वैष्णव के 108 दिव्य देसम में प्रमुख है।
बद्रीनाथ मंदिर के बौद्ध मठ होने का दावा
बद्रीनाथ मंदिर की आठवीं सदी में स्थापना के कई प्रमाण मिलते है, लेकिन सवाल ये उठता है कि आठवीं सदी से पहले वहां क्या रहा होगा। इस पर लगातार शोध किया गया। जब आप मंदिर के बाहरी और आंतरिक बनावट को देखा जाये तो ये बौद्ध वास्तुकला पगौडा शैली के अनुसार बनी हुई है। जो कि नेपाल और तिब्बत के बौद्ध मठों की बनावट में पाई जाती है।
जिससे ये पता चला है कि पगोडा शैली बौद्ध विहारों की विशिष्ठ शैली है। वहीं तिब्बती स्त्रोतो की माने तो बद्रीनाथ मंदिर जिस अलकनंदा नदी के किनारे बसा है, दरअसल अलकनंदा घाटी बौद्ध परिदृश्य के रूप में देखा जाता है, जो कि बौद्द धर्म के लिए बेहद पवित्र और प्रमुख माना गया है।
बद्रीनाथ की 3.3ft की शालीग्राम की शिला
वहीं मंदिर में मौजूद भगवान बद्रीनाथ की 3.3ft की शालीग्राम की शिला प्रतिमा है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे स्थापित आठवी सदी में खुद आदि गुरु शंकराचार्य ने किया था, जो कि उन्हें अलकनंदा नदीं में स्नान के दौरान मिली थी, लेकिन जब आप इस मूर्ति को देखेंगे तो ये मूर्ति ध्यान मुद्रा में कमल के आसन पर बैठी हुई है, जो कि बिल्कुल बुद्ध या फिर बोधिसत्व की मुद्रा में बैठे हुए है।
वहीं जानकारों की माने तो 1962 से पहले तक बद्रीनाथ में मिलने वाला प्रसाद असल में तिब्बत के बहुचर्चित थोलिंग मठ भेजा जाता था, और वहां से बौद्ध धर्म का प्रमुख प्रतीक चवर जिसे हाथ पंखा भी कहा जाता है, वो बद्रीनाथ भेजा जाता था, जिससे ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि थोलिंग मठ का बद्रीनाथ से कुछ तो कनेक्शन रहा होगा।
राजा कनकपाल का शासन
वहीं इसके दुबारा से हिंदू मंदिर होने के पीछे कई किस्से मशहूर है। कहा जाता है कि आदि गुरु शंकराचार्य ने जब अपनी यात्रायें शुरु की तो वो अलकनंदा घाटी में भी पहुंचे थे, उस वक्त यहां पर परमार शासक राजा कनकपाल का शासन था, जो कि कट्टर हिंदू राजा था, शंकराचार्य ने अलकनंदा नदी में स्नान के दौरान जो शालीग्राम की मूर्ती पाई थी,
उसे उन्होंने विष्णु जी की मूर्ति बताई और राजा से बौद्ध मठ को हटा कर हिंदू मंदिर स्थापित करने के लिए प्रेरित किया। हालांकि मंदिर के वास्तुकला और उसके सफेद रंग में कोई बदलाव नहीं किया गया, केवल शालीग्राम की मूर्ति को भव्य समारोह के साथ स्थापित कर दिया गया।
बुद्ध की ध्यानमुद्रा की मूर्ति
हालांकि तमाम दावो के बाद भी आज तक ये साबित नहीं किया जा सका है कि मंदिर आठवी सदी में बना है, क्योंकि मंदिर की बनावट आठवी सदी से भी काफी पहले की है। ऐसे में इसके बौद्ध मठ होने के दावों में कुछ तो सच्चाई है। वहीं बौद्ध जानकारो का कहना है कि मंदिर के अंदर स्थापित मूर्ति असल में बुद्ध की ध्यानमुद्रा की मूर्ति है, जिसे शालीग्राम कह कर स्थापित किया गया है। लेकिन ये बौधिसत्व ही है।
हालांकि शंक्रराचार्य ने बद्रीनाथ मंदिर में विष्णु जी को स्थापित किया है, और उन्होंने ही यहां हिंदू धर्म को बढ़ावा दिया है, ये प्रमाणिक है। ऐसे में तमाम सबूत मौजूद है कि वहां बौद्ध मठ हुआ करते थे, भले ही आज इसे नकारा जाता है। बद्रीनाथ मंदिर को लेकर आपकी क्या क्या राय है, क्या आपको भी लगता है कि बद्रीनाथ मंदिर आठवी सदी से पहले बौद्ध विहार रहा होगा.. हमें अपनी राय कमेंट करके जरूर बतायें।



