पूरी दुनिया में किसी भी देश में जहां बौद्ध धर्म को मानने वाले है, चाहे वो महायान, थेरवाद या फिर हीनयान किसी भी समुदाय से आते हो लेकिन उनके लिए भगवान बुद्ध के बताए मार्ग, उनकी ज्ञान, और उनके बताए नियमों को मानना ही सबसे ऊपर है। जो ज्ञान बुद्ध ने दिया उन्हें धीरे धीरे संग्रहित किया गया ताकि वो आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाया जा सकें हालांकि उनके ज्ञान, और संग्रहित की गई सभी ग्रंथ बुद्ध की भाषा पाली के लिखे गए लेकिन फिर भी उनका महत्व हर एक बौद्ध अनुयायी के लिए बहुत है। इन्हीं में से एक ग्रन्थ है त्रिपिटक, जिसे गौतम बुद्ध की वाणी भी कहा जाता है। त्रिपिटक, जिसमें बौद्ध ने तीन प्रमुख ज्ञान का संग्रह है, एक महाग्रंथ, जो अलग अलग तीन हिस्सों में बंटा हुआ है।। लेकिन बौद्ध धर्म के लिए सबसे अहम और प्राचीनतम ग्रंथों में से एक है।
त्रिपिटक में तीन अलग अलग भाग
त्रिपिटक असल में दो अलग अलग शब्दों से मिलकर बना है। त्रि यानी कि तीन और पिटक यानी कि पिटारी, जिन्हें आसान में बांस की बनी टोकरी कहा जाता है जिसके ऊपर बांस के आही ढक्कन लगा होता है। त्रिपिटक ग्रन्थ इसी पिटारी में रखा जाता था इसीलिए इसे त्रिपिटक कहा जाने लगा। त्रिपिटक ग्रन्थ में असम में तीन भाग हैं और तीनों बुद्ध के जीवन से जुड़े अहम हिस्से को दर्शाते है। ये तीन पिटक है विनय पिटक, सुत्त पिटक, और अभिधम्म पिटक। ये तीनो पिटक इस वक्त श्रीलंका में रखे गए है। आइए जानते है इन तीनों पिटक के बारे में विस्तार से।
जिसमें पहला भाग है – विनय पिटक
दरअसल गौतम बुद्ध ने हर उस बौद्ध के लिए कुछ नियम निर्धारित किये जो पहली बार बोद्ध भिक्षु बन रहे है। ये सारे नियम बुद्ध की भाषा पाली में लिखे गए है। विनय पिटक में बताया कि जो व्यक्ति बौद्ध भिक्षु बनने वाला है उसका आचरण कैसा होना चाहिए। इस आचरन के नियम को प्रतिमोक्ष ‘ या पालि मोक्ख के नाम से जाना जाता है। गौतम बुद्ध ने विनय पिटक को लेकर कहा था कि विनय पिटक उनकी ही कही हुई वाणी का शाब्दिक रूप है, जब वो नहीं होंगे तब विनय पिटक की भिक्षुओ के सही आचरन और व्यक्ति के बारे में ज्ञान देगी। विनय पिटक के भी तीन भाग है- सुत्तविभंग- जिसमें गलती करने पर कैसे प्रायश्चित करना है उसके 227 नियम बताये गए है। इसके दो भाग है- (1) भिक्षु-विभंग (2) भिक्षुणी-विभंग।
महावग्ग और चूल्लवग्ग
वहीं दूसरा भाग है खन्धक- खन्धक भी दो भागो में बंटा हुआ है- महावग्ग और चूल्लवग्ग। महावग्ग में प्रवज्या, उपोसथ, पशविस, प्रवारण के नियम है तो वहीं चूल्लवग्ग में इसमें भिक्षुओं के जीवन में पारम्परिक व्यवहार एंव संघाराम से जुड़े नियमों और भिक्षुनियों के विषेश आचार को संग्रहित किया गया है।
तीसरा भाग है महावग्ग– ये 10 भागो में बंटा ग्रंथ है, जिसमें गौतम बुद्ध के बचपन से लेकर ज्ञान प्राप्त करने और बुदध की प्रथम सारनाथ की यात्रा के बारे में बताया गया है।
इसके बाद आता है सुत्त पिटक- सुत्त पिटक में भगवान बुद्ध द्वारा अपने यात्रा दे दौरान अलग-अलग समय पर अलग-अलग लोगों को दिये गए उपदेशों के साथ उनके परम शिष्य महास्थविर, सारिपुत्र, मोग्गलायन और आनन्द के दिए गए उपदेशों को भी प्रमुख स्थान दिया गया। सुत्त पिटक को ‘वोहार’ (व्यवहार) ‘देसना’ भी कहा जाता है। जिन्हें सुत्त पिटक की जानकारी है वो सुत्तधर कहलाते है। बौद्ध काल में तब देश की राजनैतिक, भौगोलिक, धार्मिक और सामाजिक स्थिति कैसी थी उनके बारे में भी विस्तार से बताया गया है। सुत्त पिटक कई निकायों में बंटा हुआ है जिसमें दिद्ध निकाय, मज्झिम-निकाय, अंगुत्तर-निकाय- मौजूद है। और इनके भी अलग अलग भाग मौजूद है।
इसते बाद नंबर आता है अभिधम्म-पिटक का, ये तीसरा और महत्वपूर्ण पिटक है, जिसमें भगवान बुद्ध द्वारा दी गई धम्म की शिक्षा मौजूद है। बुद्ध की सभी शिक्षाओं और यात्राओ का जोड़ कर इसमें संग्रहित किया गया है, जो बुद्ध के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण ज्ञान माना जाता है। ये ज्ञान 7 अलग अलग ग्रंथो में बंटे हुए है। त्रिपिटक असल में भगवान बुद्ध की दी हुई शिक्षा नही बल्कि उनके पूरे जीवन का सार है। जिसने त्रिपिटर को समझ लिया उसने बुद्ध को भी समझ लिया।



