First Dalit Chief Minister of Bihar: बिहार के एक ऐसे मुख्यमंत्री जो अपनी ईमानदारी के लिए याद किए जाते हैं। आज भी लोग अपने बच्चों से कहते हैं, “अगर सच में कुछ हासिल करना है, तो भोला पासवान जैसा बनो।” जो तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री रहे। एक ऐसे नेता जिनकी छवि आज के राजनेताओं से बिल्कुल अलग थी। उनकी सादगी ऐसी थी कि वो बड़ी-बड़ी सरकारी बैठकें भी पेड़ के नीचे ही करते थे। एक ऐसे मुख्यमंत्री जो झोपड़ी में सोते थे। लेकिन उन्होंने अपने कर्तव्यों से कभी समझौता नहीं किया। ये कोई और नहीं बल्कि बिहार के पहले दलित मुख्यमंत्री भोला पासवान थे। तो चलिए इस लेख में आपको उनके बारे में विस्तार से बताते हैं।
तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री
भोला पासवान शास्त्री बिहार (Bihar) के पहले दलित मुख्यमंत्री (Dalit chief minister) थे। उन्होंने तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया, लेकिन प्रत्येक कार्यकाल छोटा था। दरअसल, भोला पासवान (Bhola Paswan Shastri) का जन्म 21 सितंबर 1914, बैरगाछी गाँव (Bairgachhi village) में एक बेहद गरीब परिवार में हुआ था। कड़ी मेहनत और लगन से उन्होंने बनारस/काशी विद्यापीठ से संस्कृत का अध्ययन किया और शास्त्री की उपाधि प्राप्त की। संस्कृत, जिसे उच्च जातियों की भाषा माना जाता है, में उनकी शिक्षा ने उन्हें “शास्त्री” की उपाधि दिलाई। वे बौद्धिक रूप से प्रतिभाशाली थे और महात्मा गांधी से प्रभावित होकर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया और जेल भी गए।
- पहला कार्यकाल – 22 मार्च, 1968 से 29 जून, 1968 (लगभग 3 महीने)।
- दूसरा कार्यकाल – 22 जून, 1969 से 4 जुलाई, 1969 (केवल 13 दिन)।
- तीसरा कार्यकाल – 2 जून, 1971 से 9 जनवरी, 1972 (लगभग 7 महीने)।
इंदिरा गांधी ने उन्हें राज्यसभा सांसद नियुक्त किया
उनका छोटा कार्यकाल उस समय बिहार में चल रही अस्थिर गठबंधन राजनीति और राजनीतिक उथल-पुथल के कारण था। वही उन्होंने राज्य और केंद्र, दोनों ही राजनीति में अपनी सेवाएँ दीं। इंदिरा गांधी ने उन्हें राज्यसभा सांसद नियुक्त किया और केंद्र में शहरी विकास एवं आवास मंत्री का कार्यभार सौंपा। अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों (24 फ़रवरी, 1978 से 23 मार्च, 1978 तक) में, उन्होंने राज्यसभा में विपक्ष के नेता के रूप में भी कार्य किया। 1978 में, उन्हें अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग (अनुच्छेद 338 के अंतर्गत) का प्रथम अध्यक्ष नियुक्त किया गया।
भोला पासवान की सादगी और ईमानदारी
भोला पासवान शास्त्री अपनी सादगी, ईमानदारी और पारदर्शी शासन के लिए प्रसिद्ध थे।कहा जाता है कि मंत्री और मुख्यमंत्री रहते हुए भी, वे अक्सर एक पेड़ के नीचे कंबल ओढ़कर आराम से काम करते थे। उन्होंने कभी निजी संपत्ति अर्जित नहीं की उन्होंने अपना बचपन और बाद के वर्ष गरीबी में बिताए।
इतना ही नहीं उनकी ईमानदारी इतनी प्रगाढ़ थी कि जब उनका निधन हुआ, तो कहा जाता है कि उनके परिवार के पास उनके अंतिम संस्कार (श्राद्ध कर्म) के लिए भी पर्याप्त धन नहीं था, जिसकी व्यवस्था पूर्णिया के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट ने की थी।



