BNS Section 233 in Hindi: भारतीय दंड संहिता (BNS) की धारा 233 ‘झूठे आरो, झूठे सबूत के उपयोग’ से जुड़ी है। तो चलिए आपको इस लेख में बताते हैं कि ऐसा करने पर कितने साल की सजा का प्रावधान है और बीएनएस (Bhaarateey dand sanhita) में इसके के बारे में क्या कहा गया है।
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धारा 233 क्या कहती है? BNS Section 233 in Hindi
जैसा कि आप जानते हैं कि अलग-अलग धाराओं में अलग-अलग अधिनियम और दंड हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बीएनएस की धारा 233 क्या कहती है, अगर नहीं तो आइए जानते हैं। भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 233 यह धारा उन लोगों को सजा देती है जो जानबूझकर किसी कानूनी प्रक्रिया में गलत या बनावटी साक्ष्यों को असली साक्ष्य के रूप में पेश करने या ऐसा करने का प्रयास करते हैं।
जिस व्यक्ति ने जानबूझकर किसी ऐसे साक्ष्य को सच्चा या वास्तविक बताकर पेश किया, जिसके बारे में वह यह जनता है कि यह झूठा या मनगढ़ंत है, वह भ्रष्ट तरीके से काम कर रहा यह इस्तेमाल कर हैं। उदहारण के लिए….यदि कोई व्यक्ति एक झूठा दस्तावेज़ दिखाता है, जिसमें यह दावा किया गया हो कि वह किसी संपत्ति का मालिक है, जबकि उसे पता है कि यह दस्तावेज़ फर्ज़ी है, तो उसे इस धारा के अंतर्गत दोषी माना जाएगा।
बीएनएस धारा 233 की महतवपूर्ण बातें
- अपराध करने के लिए इरादा (intent) और भ्रष्टाचार (corruptly) होना आवश्यक है।
यह अपराध असंज्ञेय है, जिसका अर्थ है कि पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तारी नहीं कर सकती।
यह अपराध जमानती या गैर-जमानती हो सकता है, जो इस बात पर निर्भर करता है कि ‘मिथ्या साक्ष्य देना’ किस श्रेणी में आता है।
यह उस न्यायालय के अंतर्गत आता है, जो मिथ्या साक्ष्य देने या गढ़ने के मामलों की सुनवाई करता है।
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बीएनएस धारा 232 की और सजा
इसके अलवा आपको बता दें कि BNS की धारा (Section) 233 के तहत दोषी पाए जाने पर सजा का प्रावधान है कि, दोषी व्यक्ति को उसी तरह दंडित किया जाएगा जैसे कि उसने मिथ्या साक्ष्य दिया हो या गढ़ा (fabricated) हो। इसका अर्थ है कि इसका दण्ड BNS की धारा 233 (मिथ्या साक्ष्य देना) के तहत निर्धारित दण्ड के समान होगा।



