Uttarakhand: दलित समाज ने तोड़ी दशकों पुरानी परंपरा, ठाकुरों से अलग होकर चुना अपना मुखिया

Jaunsar News, Uttarkhand news
Source: Google

Uttarakhand news: हाल ही में उत्तराखंड (Uttarakhand) के जौनसार-बावर क्षेत्र (Jaunsar-Bawar region) के एक गांव से संबंधित है, जहाँ दलित समाज (Dalit community) ने दशकों पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए अपना अलग मुखिया (स्याणा) चुना है।

Also read: Chandrashekhar Azad Rally: संविधान शपथ रैली में उमड़ा जनसैलाब, चंद्रशेखर आजाद ने किया संबोधित रोहिणी घावरी रही लापता

उत्तराखंड में बदलाव की बयार

आज भी भारत के कई राज्य ऐसे है जहाँ दलितों के साथ भेदभाव होता हैं और पुरानी प्रथा चली आ रहीं है। लेकिन उत्तराखंड के जौनसार से एक खबर सामने आई, जहां दलित समाज ने अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही प्रथा को तोड़ते हुए दलित समाज का मुखिया चुना है। इस प्रथा को तोड़ने में वहां की स्थानिय पुलिस की भी अहम भूमिका रही। दरअसल ये खबर जौनसार-बावर (Jaunsar-Bawar) क्षेत्र बिजनू बिजनाड़ (Bijnu Bijnad) गांव की है।

जहां करीब 35 दलित परिवार रहते है, वही इस परंपरा को तोड़कर अपनी नई परंपरा शुरू करने के लिए इन 35 दलित परिवारों को पुलिस प्रशासन की मदद भी लेनी पड़ी। और बाकि पूरा गांव राजपूतों और ठाकुरों का है, जिसके कारण आजादी से पहले से ही इस गांव में केवल ठाकुरों और राजपूत समाज का ही  ‘स्याणा’ (मुखिया) चुना जाता था।

दलित समाज ने दशकों पुरानी प्रथा खत्म की

लेकिन इस बार 35 दलित परिवारों ने संविधान की ताकत दिखाई और अपना अलग से दलित समाज का  ‘स्याणा’ (मुखिया) चुन लिया, जिसे परंपरा के अनुसार बूढी दिवाली के दिन लकड़ी के हाथी पर भी घुमाया गया। यानि की अब इस गांव में दो दो  ‘स्याणा’ यानि की मुखिया होंगे। हांलांकि दलितों के लिए ये संघर्ष आसान नहीं थी,, क्योंकि ठाकुरो ने अपने समाज से ही एक मुखिया चुन लिया था। वही गाँव के लोग बताते हैं कि ये प्रथा काफी समय से चली आ रही हैं।

Also read: SHO की भूमिका पर सवाल: लव मैरिज के विरोध में खड़ी हुई पुलिस, वाल्मीकि लड़के से शादी करने पर हंगामा

डीएम और पुलिस की मौजूदगी में हुआ चुनाव

लेकिन इस परंपरा को शुरू करने से पहले बिजनू बिजनाद गांव के लोगों ने दलित परिवारो ने डीएम (DM) से सुरक्षा मांगी और चकराता के SDM और ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर को सुरक्षा देने के लिए अधिकृत किया गया। साथ ही पुलिस बल की मौजूदगी में आखिरकार दशकों पुरानी परंपराओं की बेड़ियों को तोड़ कर सिर उठाने का, और सम्मान के साथ जीने का रास्ता चुन लिया है। हालांकि अभी भी प्रथा क्षेत्र के 359 गांवों और 100 मजरों में अभी भी चल रही है, जो शायद इस बदलाव के बदलनी शुरु हो जाये।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *