JNU कुलपति ने बढते विवाद के बीच तोड़ी चुप्पी, कहा – “मेरे बयान को गलत तरिके से पेश किया…”

JNU VC Santishree Dhulipudi Pandit
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जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की कुलपति शांतिश्री डी. पंडित की हालिया टिप्पणी को लेकर सोशल मीडिया पर छिड़े विवाद और तीखे विरोध के बीच अब उनका स्पष्टीकरण सामने आया है। उनके बयान के वायरल होने के बाद जहां एक वर्ग में भारी आक्रोश देखा जा रहा था, वहीं इंटरनेट पर समाज दो धड़ों में बंटा नजर आया। इस गहमागहमी के बीच कुलपति ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए सफाई दी है, उन्होंने कहा कि उनके बयान को राजनीतिक उद्देश्य से संदर्भ से हटाकर पेश किया गया है।

बयान को गलत तरीके से दिखाने का आरोप

दरअसल, मीडिया द्वारा मिली जानकारी के अनुसार बताया जा रहा है कि कुलपति शांतिश्री डी. पंडित का कहना है कि उनका पूरा पॉडकास्ट करीब 55 मिनट का था, लेकिन विवाद सिर्फ अंत के एक छोटे हिस्से को लेकर खड़ा किया गया। उनका आरोप है कि चयनात्मक तरीके से क्लिप दिखाकर पूरे बयान का गलत अर्थ निकाला गया और कैंपस में विवाद पैदा किया गया।

पहचान की राजनीति पर थी टिप्पणी

बता दें कि शांतिश्री पंडित ने स्पष्ट किया कि उनका बयान किसी समुदाय के खिलाफ नहीं था, बल्कि पहचान की राजनीति पर एक सामान्य टिप्पणी थी। उन्होंने कहा कि कोई भी समुदाय स्थायी रूप से पीड़ित मानसिकता के साथ प्रगति नहीं कर सकता और यह बात उन्होंने व्यापक सामाजिक संदर्भ में कही थी। उन्होंने यह भी कहा कि वे समानता की समर्थक हैं और जन्म के आधार पर किसी के साथ भेदभाव या दंड का समर्थन नहीं करतीं।

शिक्षकों का मिला समर्थन

कुलपति के मुताबिक बताया जा रहा है कि बड़ी संख्या में शिक्षकों ने उनके बयान का समर्थन किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि JNU शिक्षक संघ और छात्रसंघ चयनात्मक प्रस्तुति के जरिए परिसर में स्वस्थ विचार-विमर्श की परंपरा को प्रभावित कर रहे हैं।

कुलपति शांतिश्री पंडित ने आंबेडकर का दिया हवाला

वहीं अपने स्पष्टीकरण में कुलपति ने भीमराव आंबेडकर का हवाला देते हुए कहा कि वे भी असमान कानून के पक्ष में नहीं होते। साथ ही उन्होंने बताया कि कुछ सामाजिक चिंतकों, जैसे विवेक कुमार, ने भी उनके बयान को सही संदर्भ में समझा है।

कैंपस में विरोध प्रदर्शन जारी

हालांकि, कुलपति के स्पष्टीकरण के बावजूद छात्र संगठनों का आक्रोश थमता नजर नहीं आ रहा है और कैंपस में विरोध प्रदर्शनों का दौर जारी है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर विश्वविद्यालय में पहचान की राजनीति, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवाद की मर्यादा पर नई बहस छेड़ दी है। स्थिति तब और तनावपूर्ण हो गई जब बीती देर रात कैंपस में हुई हिंसा को भी इसी विवादित पृष्ठभूमि से जोड़कर देखा जाने लगा, जिससे जेएनयू का माहौल एक बार फिर गरमा गया है।

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