Karnataka Politics: कर्नाटक कांग्रेस में नया पावर गेम, क्या सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच दलित कार्ड बिगाड़ेगा खेल?

Karnataka Politics
Source: Google

Karnataka Politics: राजनीति में कोई भी दल अपने वोट बैंक के समीकरणों से समझौता नहीं करना चाहता। खासकर जब बात उस कांग्रेस की हो, जिसका अस्तित्व आजादी के आंदोलन से जुड़ा है और जो दशकों तक सत्ता के केंद्र में रही है। भले ही कांग्रेस आज अपनी जमीन और मजबूत करने की कोशिश में जुटी हो, लेकिन कर्नाटक में उसके सामने अपने सबसे बड़े वोट बैंक, यानी दलितों की आकांक्षाओं को पूरा करने की कड़ी चुनौती खड़ी है। कांग्रेस की चुनावी राजनीति की रीढ़ माना जाने वाला कर्नाटक राज्य इन दिनों पार्टी की अंदरूनी खींचतान और मुख्यमंत्री पद की दावेदारी को लेकर मचे घमासान के कारण चर्चा के केंद्र में है।

क्या है पूरा मामला

आपको बता दें कि कर्नाटक कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर सियासी पारा एक बार फिर चढ़ गया है। लंबे समय से राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि ढाई-ढाई साल के कथित फॉर्मूले के तहत, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के बाद उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार को कमान सौंपी जा सकती है। लेकिन इस ‘पावर गेम’ के बीच अब ‘दलित मुख्यमंत्री’ की मांग का एक नया पेच फंस गया है।

दलित मुख्यमंत्री की मांग ने बढ़ाई हलचल

कर्नाटक के समाज कल्याण मंत्री एच.सी. महादेवप्पा ने कांग्रेस आलाकमान से राज्य में दलित नेता को मुख्यमंत्री बनाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि इसके लिए सही समय और अनुकूल परिस्थितियां बननी चाहिए और पार्टी नेतृत्व को इस दिशा में गंभीरता से सोचना चाहिए। महादेवप्पा के मुताबिक, कांग्रेस आलाकमान से लेकर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया तक सभी नेताओं को मिलकर एक योग्य दलित नेता को आगे लाना चाहिए, ताकि सामाजिक संतुलन मजबूत हो सके।

“दलित कांग्रेस की रीढ़ रहे हैं”

मंत्री ने दावा किया कि कर्नाटक में दलितों की आबादी काफी बड़ी है और वे हमेशा कांग्रेस के मजबूत वोट बैंक रहे हैं। लेकिन अक्सर यह चर्चा होती है कि वोट दलित देते हैं, जबकि मुख्यमंत्री कोई और बन जाता है और उनके नेता हाशिए पर रह जाते हैं। इसी वजह से उन्होंने कहा कि कम से कम एक बार दलित नेता को मुख्यमंत्री बनने का मौका मिलना चाहिए।

फिलहाल सिद्धारमैया ही रहेंगे मुख्यमंत्री

महादेवप्पा ने साफ किया कि अभी सिद्धारमैया मुख्यमंत्री हैं और वे अपने कार्यकाल तक पद पर बने रहेंगे। हालांकि भविष्य को लेकर उन्होंने संकेत दिया कि आने वाले समय में पार्टी को एकजुट होकर दलित नेता को मुख्यमंत्री बनाने पर विचार करना चाहिए।

हालांकि, अंत में यह बात भी उतनी ही सच है कि मुख्यमंत्री किसी भी जाति या समुदाय का क्यों न हो, यदि वह ईमानदारी और जनहित की भावना से काम करता है, तो जनता के लिए यह मायने नहीं रखती है कि सत्ता किसके हाथ में है। सच तो यह है कि जनता के लिए मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं, बल्कि उसका किया हुआ विकास ही सबसे ज्यादा मायने रखता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *