बसपा की बहन जी और आज़ाद समाज पार्टी के रावण में सीधी टक्कर, पश्चिमी यूपी का ताज किसके सिर?

Chandrshekhar azad and Mayawati,
Source: Google

Mayawati vs Chandrashekhar: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव भले ही अभी काफी समय दूर हों, लेकिन राज्य की राजनीतिक गतिविधियां, विशेषकर पश्चिमी यूपी में, पहले से ही तेज हो चुकी हैं। दलित राजनीति की दो महत्वपूर्ण शख्सियत—बहुजन समाज पार्टी (BSP) की नेता मायावती और आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) के अध्यक्ष चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’—इस क्षेत्र को अपनी ताकत का नया केंद्र बनाने में जुटे हुए हैं, जिससे वे अपनी राजनीतिक स्थिति को मजबूत कर सकें।

दलितों और पिछड़ों को एकजुट करने पर चंद्रशेखर का ज़ोर

बीते दिन संविधान दिवस (Constitution Day) पर चंद्रशेखर आज़ाद (Chandrashekhar Azad) ने मुज़फ़्फ़रनगर (Muzaffarnagar) के GIC ग्राउंड में एक बड़ी रैली की, जहाँ सहारनपुर, मेरठ और मुरादाबाद डिवीज़न के कार्यकर्ता इकट्ठा हुए। आज़ाद ने लोगों से संविधान की शपथ लेने की अपील की और ऐलान किया कि आने वाले दिनों में उनकी पार्टी “संविधान के अधिकार बचाओ और भाईचारा बनाओ” सुधारों के तहत पूरे उत्तर प्रदेश में 50 लाख लोगों को शपथ दिलाएगी।

मुजफ्फरनगर में यह रैली सिर्फ भीड़ इकट्ठा करने की कोशिश नहीं थी, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश को यह साफ पॉलिटिकल मैसेज देने की भी कोशिश थी कि चंद्रशेखर अब राज्य की पॉलिटिक्स में सिर्फ एक चेहरा नहीं, बल्कि एक ताकत के तौर पर उभरना चाहते हैं।

दलित युवा वोट बैंक को लेकर मायावती और चंद्रशेखर में खींचतान तेज

मायावती पिछले कुछ समय से काफी एक्टिव दिख रही हैं। कांशीराम के परिनिर्वाण दिवस पर लखनऊ में बड़ी रैली करने के बाद अब वे नोएडा से पश्चिम यूपी का गणित दुरुस्त करना चाहती हैं। लेकिन इससे पहले ही चंद्रशेखर आजाद ने पश्चिम यूपी में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए मैदान में उतरकर मायावती के मजबूत क्षेत्रों पर सेंध लगाने की रणनीति बना ली है।

चंद्रशेखर और मायावती दोनों जाटव समाज से आते हैं और दोनों की राजनीतिक जड़ें पश्चिम यूपी में ही हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि मायावती की पकड़ अब पहले जैसी मजबूत नहीं रही, खासकर मुस्लिम वोट उनके हाथों से लगातार खिसकते जा रहे हैं। 2024 के चुनाव ने तो साफ कर दिया कि बसपा का दलित-मुस्लिम समीकरण अब उतना असरदार नहीं रह गया।

दलित-मुस्लिम गठजोड़ पर सबकी निगाहें

नगीना लोकसभा सीट से चंद्रशेखर की जीत इस बात का संकेत है कि दलित-मुस्लिम वोट का फॉर्मूला अभी भी जमीन पर असर दिखाता है। मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, मेरठ, मुरादाबाद, बिजनौर, आगरा, फिरोजाबाद और गाजियाबाद जैसे जिलों में दलित और मुस्लिम मतदाता मिलकर किसी भी चुनाव को पलट सकते हैं।

कांशीराम का फॉर्मूला भी यही था दलित, मुस्लिम और अति पिछड़ी जातियों का साथ। आज इस समीकरण को नए अंदाज में आजमाने की कोशिश चंद्रशेखर कर रहे हैं। दलित युवाओं में उनकी पकड़ पहले ही मजबूत है, अब वे मुस्लिम मतदाताओं को भी अपने साथ जोड़ना चाहते हैं।

सियासत का बड़ा सवाल

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि पश्चिम यूपी के इस बदलते राजनीतिक परिदृश्य में कौन आगे निकलता है मायावती, जो वर्षों से दलित राजनीति की सबसे बड़ा चेहरा रही हैं, या चंद्रशेखर, जो तेजी से नई पीढ़ी के आइकॉन बनकर उभर रहे हैं? मुजफ्फरनगर की रैली ने साफ कर दिया है कि मिशन–2027 की लड़ाई गर्म हो चुकी है और पश्चिम यूपी इस मुकाबले का सबसे बड़ा मैदान बनने जा रहा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *