Satyashodhak Samaj Legacy: 18वी सदी की शुरुआत का समय चल रहा था, 11 अप्रैल 1827 को पूणे में एक माली परिवार में एक लड़के का जन्म हुआ था… पिता गोविंदराव चुंकि फूलो को काम करते थे, इसलिए उपनाम के तौर पर उन्हें गोविंदराव फूले कहा गया.. बेटे के जन्म से बहुत खूश थे पिता और नाम दिया ज्योतिबा गोविंदराव फूले। लेकिन 1 साल की उम्र मे ही मां को खो दिया…पिता चाहते थे कि बच्चा पढ़े लिखे और अंगेजो की बराबरी करे, उन्होंने कोशिश की पढ़ाने की लेकिन जातिवादी मानसिकता के जूझ रहे समाज ने ज्योतिबा फूले को पढ़ने नहीं दिया, शुरु शिक्षा किसी तरह से हासिल की ही थी कि स्कूल छोड़ना पड़ा।
बड़ी मुश्किल से 21 साल की उम्र में आकर उन्होंने सातवी कक्षा की पढ़ाई पूरी की थी, जो कि इंग्लिश मीडियम में की गई थी। 14 साल की उम्र में 1840 में सावित्री बाई फूले से विवाह भी हो गया.. ज्योतिबाराव धीरे धीरे पढ़ रहे थे, लेकिन उन्होंने देखा कि उनकी पत्नी सावित्री बाई को बेसिक शिक्षा भी नहीं मिली..बस फिर क्या था, अपनी पढ़ाई के साथ साथ उन्होंने अपनी पत्नी को भी पढ़ाना शुरु किया… पढ़ाई… जिसे उन्होंने खुद को समाज में बराबरी के लिए शुरु की थी, लेकिन उन्हें ये नहीं पता था कि उनकी शिक्षा आगे चल कर एक बड़े आंदोलन को जन्म देने वाली है। जो समाज में बड़ा बदलाव करने वाली है.. जिसने दलितो और पिछड़ो को ही नहीं समाज के हर तबके की महिलाओं को सिर उठा कर जीने की राह दिखाई थी…और स्थापित किया था सत्य शोधक समाज संगठन।
ज्योतिबा राव फूले, जिन्होंने शिक्षा के दम पर ये जाना कि ब्राह्मणों ने जो दलितो और पिछड़ों के लिए नियम बनाये वो कोई भगवान की बोली या उनके आदेश है नहीं…बल्कि ईश्वर की दृष्टि में तो कोई जातपात, ऊंच नीच, नर नारी का भेदभाव है ही नही.. उनकी नजरों में सब एक समान है, सब उनकी संतान है.. बस फिर क्या था उन्होंने तय कर लिया कि वो समाज में न केवल दलितों और पिछड़ो को बराबर लेकर आयेंगे बल्कि महिलाओं को भी बराबरी का सम्मान दिला कर रहेंगे. जिसकी शुरुआत उन्होंने 1948 में पहला महिला विद्यालय खोलकर किया..और इस विद्यालय में उन्होंने अपनी पत्नी सावित्री बाई को बतौर शिक्षा के तौर पर कार्य करने का मौका दिया था…यानि की उन्होंने न केवल एक दलित महिला को शिक्षित किया बल्कि उसे समाज में पुरुषों के बराबरी नौकरी करने का भी मौका दिया.. ये बहुत बड़ी क्रांति थी, लेकिन कहते है कि बड़े बदलाव इतनी आसानी से स्वीकार नहीं किया जाते है,
सावित्रीबाई और ज्योतिबा राव फूले को भी तमाम कठिनाइयों का सामना करना पड़ा.. ज्योतिबा फूले जानते थे कि वो अकेले चलेंगे तो लड़ाई लंबी नहीं चलेगी, इसलिए उन्होंने एक ऐसे संगठन को बनाने का फैसला किया जो दलितों पिछड़ो के साथ महिलाओं के अधिकारों के लिए भी लड़े। इसके लिए फूले ने 24 सितंबर 1873 को सत्य शोधक समाज संगठन का गठन किया। संगठन के तहत पीड़ित दलितो और महिलाओं को इसमें शामिल किया गया और उनके न्याय के लिए आवाज उठाई गई। फूले ने ऐलान कर दिया कि वो मूर्ती पूजा और पूजा के लिए ब्राह्मणों की जरूरत को खारिज करते है, उनकी नजरो में ब्राह्मण दलितो के लिए पूजा करते है, उनके दान लेते है लेकिन उनके हाथों का पानी नहीं पी सकते है। इसलिए उन्हें ऐसे ब्राहमणों की जरूरत ही नहीं है जो उनके धन से चलते है लेकिन फिर भी जातिगत भेदभाव करते है।
उन्होंने बाल विवाह पर रोक लगाने और विधवाओं के फिर से शादी कराने की वकालत की थी। इतना ही नहीं ज्योतिबा फूले ने ये ऐलान किया था कि उनके समाज में होने वाली शादियों, और इस तरह के किसी भी संस्कार समारोह में ब्राह्मणों की उपस्थिति को निषेध कर दिया था। सत्यशोधक संगठन दलितों, पिछड़ो और महिलाओं को बराबरी का हक दिलाने की दिशा में हमेशा काम करता रहा। ज्योतिबा फूले ने समाज में महिलाओं की शिक्षा, उनके रोजगार और सामाजिक बराबरी के लिए लंबी लड़ाई लड़ी, औऱ वो भी अहिंसा के रास्ते पर चल कर, जिस कारण साल 1888 में मुंबई की एक विशाल सभा में समाज सुधारक विट्ठलराव कृष्णाजी वांडेकर ने उन्हें महात्मा’ की उपाधि दी गई थी। इस कारण ही उन्हें महात्मा फूले कहा जाता है। फूले अंग्रेजो की शिक्षा नीति से काफी प्रभावित थे।
और उन्होंने अंग्रेजो की नीति को अपना महिलाओं की शिक्षा पर जोर दिया था, जिससे प्रभावित होकर ब्रिटिश भारत सरकार ने उन्हें 1883 में फूले को “स्त्री शिक्षण के आद्यजनक” नाम दिया गया था। सत्यशोधक समाज संगठन हमेशा समाज सुधारों और बराबरी के लिए काम करता रहा और इस संगठन ने ब्राह्मणवादी सोच को पूरी तरह से नकार दिया था.. जिसके कारण फूले का प्रभाव इतना बढ़ गया कि आज भी महिलाओं की शिक्षा, और उनकी बराबरी को आप फूले के इस संघर्ष से जोड़ कर देख सकते है। ये उनके हौसले और हिम्मत की ही देन रही है, जो आज समाज में महिलाएं और दलित पिछड़े शिक्षित हो पाते है।



