JNU violence: 12 साल का सन्नाटा टूटा, तो क्यों भड़क उठा सवर्ण आक्रोश?

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JNU violence: जहां एक तरफ सामान्य वर्ग UGC के नए ‘इक्विटी नियमों’ को यह कहकर खारिज करता है कि 5 सदस्यीय कमेटी में उनका जिक्र न होना उनके साथ ‘अन्याय’ है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ, JNU के कावेरी हॉस्टल में 12 साल बाद एक दलित उम्मीदवार के सामने आते ही जिस तरह की हिंसा और तोड़फोड़ हुई, वह इस तथाकथित ‘अन्याय’ के तर्क की पोल खोल देती है। अगर कमेटी में प्रतिनिधित्व न होना गलत है, तो एक दलित छात्र को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर रखने की यह मनुवादी मानसिकता किस आधार पर सही हो सकती है? यह घटना साबित करती है कि संस्थानों में जातिगत भेदभाव खत्म होने का दावा महज एक छलावा है।

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जानें क्या है पूरा मामला?

मामला राजधानी दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) का है। यहां के कावेरी छात्रावास में 12 साल के लंबे समय के बाद जब एक दलित छात्र ने अध्यक्ष पद के लिए अपनी उम्मीदवारी पेश की, तो कैंपस का माहौल गरमा गया। आरोप है कि इस प्रतिनिधित्व से बौखलाए मनुवादी मानसिकता के कुछ छात्रों ने चुनाव प्रक्रिया में न केवल बाधा डाली, बल्कि जमकर हंगामा और तोड़फोड़ भी की।

जेएनयू में दलित उम्मीदवार

एक ओर देश में दलितों और बहुजन छात्रों को न्याय और बराबरी दिलाने की लड़ाई लड़ी जा रही है, उनके खिलाफ होने वाले जातिगत अपराधों को रोकने के लिए यूजीसी के नए नियमों को फिर से लागू करने को मांग को लेकर आंदोलन हो रहा है, लेकिन बावजूद इसके जेएनयू में दलित उम्मीदवार तक गवारा नहीं है। जो ये दवा करते है कि शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत भेदभाव नहीं होता, ये घटना उन लोगों के मुंह पर करारा तमाचा है। दरअसल जेएनयू में कावेरी छात्रावास में अध्यक्ष पद के लिए चुनाव होने है, लेकिन यूनिवर्सिटी में निष्पक्ष तरीके से जेवीएम का चुनाव किया जाना था।

एक बार फिर से धांधली कर चुना अध्यक्ष

जेवीएम इलेक्शन कमीशन का चुनाव करता है लेकिन जब सो कोल्ड जातिवाद फैलाने वाले के मन मुताबिक प्रतिनिधि नहीं चुने जाते तो ये लोग इसे रद्द कराने के लिए तोड़ फोड़ मचाते है, और वॉर्डन भी जबरन उन लोगों के साथ मिलकर अपने प्रतिनिधि चुन लेते है। जिसका अब दलित और पिछड़े छात्रों ने विरोध किया है। उन्होंने इसे दलित छात्रों के साथ अन्याय और भेदभाव भरा रवैया बताते हुए मांग की है कि पिछली बार भी ऐसी ही धांधली करके अध्यक्ष चुना गया था जो पूरे साल छात्रावास से बाहर रहा था, वहीं इस बार भी यहीं नीति अपनाई जा रही है।

दलित छात्रों ने अपील की है कि चुनाव निष्पक्ष होना चाहिए, ताकि जो वाकई में अध्यक्ष पद का अधिकारी है उसे ही ये पद मिले। वैसे आपको बता दें कि जातिगत भेदभाव इस वक्त सबसे ज्यादा शैक्षणिक संस्थानों में ही देखने को मिल रहा है, ऐसे में क्या सुप्रीम कोर्ट इन मुद्दों पर कोई टिप्पणी भी देगी या सरकार के इशारों पर चलने का इरादा है।

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