Periyar on Ramayana: केंद्र में जब से बीजेपी की सरकार आई है तब से एक मुद्दा काफी उछला है, श्री राम मंदिर का, श्री राम मंदिर जो की त्रेता युग के श्री राम से जुड़ा है श्री राम रामायण का एक सबसे अहम अंग है लेकिन आज के समय में एक वर्ग ऐसा भी है जो रामायण और राम के अस्तित्व पर ही सवाल उठाता है। रामायण एक तरफ कहा जाता है कि यह धर्म की विजय पर आधारित है तो वही एकमत यह भी है कि रामायण असल में पितृ सत्तात्मक पद्धति को बढ़ावा देता है जबकि रामायण में सबसे ज्यादा शोषण महिलाओं का हुआ।
सच कहे तो रामायण महिलाओं की खिलाफ ही है जिस पर सबसे ज्यादा नकारात्मक बातें समाज सुधारक पेरियार ने की। पेरियार ने ऐसे पांच वजह भी बताएं जिसके कारण वह मानते थे कि रामायण असल में महिला विरोधी ग्रंथ है। तो चलिए इस लेख में हम कुछ ऐसे ही कर्म के बारे में जानेंगे जिसे खुद पेरियार ने बताए थे।
समाज सुधारक पेरियार
इरोड वेंकटप्पा रामासामी….ई.वी रामासामी…दक्षिण भारत का एक ऐसा चेहरा, जिन्होंने आजीवन समाज सुधार की दिशा में काम किया था, जो राजनीति में रह कर लगभग 50 सालो तक लोगो को जागरूक करते रहे.. जिसमें समाज के दबे कुचले लोगो के लिए जिन्होंने सेल्फ-रिस्पेक्ट मूवमेंट और द्रविड़ कज़गम जैसे मुहीम की शुरुआत की थी, जो ये मानते थे कि जाति और पंथ के आधार पर भेदभाव केवल इसलिए किया जाता है ताकि समाज में मासूम और अनजान लोगों को कमजोर किया जा सकें। चंद सवर्ण मिलकर बहुसंख्यक पिछड़ो का शोषण कैसे कर लेते है।
रामायाण और महाभारत दोनो एक काल्पनिक ग्रंथ
भगवान, धर्म और शास्त्रों के नाम के नाम इन चंद लोगो ने छला है.. इन्होंने पूरी की पूरी रामायण पर ही सवाल उठाये थे, और लिखा था सच्ची रामायण, जो बहुत विवादित भी हुई थी। जी हां इरोड वेंकटप्पा रामासामी जो इस नाम से नहीं पहचान पा रहे है तो आपको बता दें कि दुनिया इन्हें महान राजनीतिज्ञ और सोशल एक्टिविस्ट पेरियार के नाम से भी जानती है। पेरियार ने सच्ची रामायण के माध्यम से कुछ ऐसे बिंदुओ को अंकित किया था, जो विवादों का कारण बनी.. पेरियार ने माना कि रामायाण और महाभारत दोनो ही एक काल्पनिक ग्रंथ है, जिसे द्रविड़ो को झुकाने के लिए, उनका शोषण करने के लिए ब्राह्मणों ने तैयार किया था।
पेरियार ने माना कि राम और कृष्ण दोनो साधारण पुरुष थे न की देवता… इसमें न तो कुछ नैतिकता है, और न ही सराहनीय दर्शन है। इसको ब्राह्मणों को ऊंचा दिखाने और महिलाओ को दासी बना कर उनकी शोषण करने के लिए लिखा गया था। जिसमें जबरन ये थोपा गया कि महिलाओं को कैसे रहना चाहिये, पुरुषो को कैसे रहना चाहिए। महिलाओ के अपमान और उन्हें हीन देखना ही सिखाता है ये ग्रंथ।
रामायण में महिलाओं के साथ हुए अत्याचारों
पेरियार ने रामायण में महिलाओं के साथ हुए अत्याचारों को लेकर बहुत बड़ी बात कहीं है। पेरियार मानते थे कि पूरी रामायण पितृसत्तामकता को बढ़ावा देती है। राम की बहन शांता को राजकुमारी होते हुए भी इसलिए ऋषि पत्नी बनना पड़ा ताकि उनके पिता का वंश आगे बढ़ सकें। राजा दशरथ ने तीन शादियां की.. एक भाई होते हुए भी रावण ने शूर्पनखा के पति की हत्या कर दी..इतना ही नहीं शूर्पनखा ने तो केवल शादी कारने की इच्छा जाहिर की थी, उसके नाक काम काटना के महिलाओं अपमान की पराकाष्ठा थी। सीता का जबरन अपहरण किया गया।
सीता के चरित्र को आत्मनिर्भरता का रूप
कसूरवार कौन था… इंद्र द्वारा अहिल्या का अपमान.. लेकिन पत्थर भी अहिल्या बनाई जाती है, बिना उसका पक्ष जाने… कसूरवार कौन था..महिलाओं को केवल उपभोग की वस्तु मात्र माना गया, उनका चरित्र पुरुषों की सोच पर आधारित माना, जिसमें सीता जिन्हें लोग देवी का रूप मानते है, एक राजकुमारी होते हुए भी सीता के चरित्र को आत्मनिर्भरता का रूप मानने के बजाय राम की संपत्ति के रूप में देखा गया। पेरियार ने तर्क दिया कि रामायण में महिलाओं को पुरुषों के अधीन माना गया, क्योंकि एक धोबी की पत्नी रातभर बाहर रहती है तो धोबी उसकी तुलना सीधा सीता से कर देता है और पुरुष प्रधान समाज के खोखले अहंकार को संतुष्ट करने के लिए गर्भवति सीता का परित्याग कर दिया गया।
महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा दमनकारी सोच
वो भी तब जब सीता को अग्निपरिक्षा से होकर गुजरना पड़ा था। फिर ये बात कहां से आ जाती है कि सीता ने समाज के महिलाओं को धर्म पर तलने की राह सिखाई.. ये कैसा धर्म था जो महिलाओं को खुलेआम अपमानित करने, उनके परित्याग को धर्मसंगत बताता है। सीता की अग्निपरिक्षा ही महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा दमनकारी सोच थी, जिसमें महिलाओं के पवित्र होने के दायरे तय कर दिये थे, जबकि सीता जैसी राजकुमारी, जो आयोध्या की महारानी थी, उनकी बातों पर कोई विश्वास नहीं कर पाया, और एक धोबी की बात पर विश्वास किया गया। क्यों क्योंकि सीता नारी थी और धोबी पुरुष। रामायण असल में महिलाओ पर सतीत्व को फॉलो करने का दवाब डालता है, जबकि महिला का सतीत्व भी पुरूष ही तय करते है, तो क्या महिलाओ की स्वतंत्रता पर प्रहार नहीं था।
पेरियार ने माना कि रामायाण हो या महाभारत..सभी ग्रंथो में जातिगत भेदभाव के साथ साथ लिंग के आधार पर भी काफी भेदभाव किया गया है। अगर ये ग्रंथ सच्चे है तो महिलाओ की स्थिति सही मायने में रामायण और महाभारत काल में बेहद दयनीय रही होगी। पेरियार ने हमेशा माना कि दव्रिड़ो की छवि को खराब करने के लिए आर्यो ने ऐसी भ्रांति फैलाई.. आर्यो ने आर्यो को सतपुरुष महापुरुष बताया, और द्रविड़ो को राक्षस, बंदर, भालू से तुलना की… और इसी कारण उन्होंने सच्ची रामायण के जरिये द्रविड़ों को जागरूक करने और आर्यो की पितृसत्तात्मक सोच पर गहरी चोट पहुंचाने का प्रयास किया था।


