OBC, SC और ST आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, क्या बदल जाएगा आपके बच्चों का भविष्य?

SC-ST Prevention, SC-ST ACT
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OBC SC ST आरक्षण: पिछले कुछ सालों से लगातार देश के कई राज्यों में जातिगत जनगणना कराने की मांग तेज हो रही है। एक वर्ग चाहता है कि जातिगत जनगणना हो तो वहीं एक वर्ग इसे जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देने वाला कदम बताता है..और जातिगत जणगणना के खिलाफ है… लेकिन क्या सही मायने में ये भेदभाव को बढ़ावा देगा..या जनगणना न कराने के पीछे बहुत बड़ी साजिश है. ये साजिश है एससी एसटी और ओबीसी कैटेगरी वालों के खिलाफ..क्योंकि जातिगत जनगणना उस बड़े षड्यंत्र से पर्दा उठा देगी…जिसकी आड़ में एससी एसटी और ओबीसी कैटेगरी वालों की सरकारी नौकरी पर सरकार की गाज गिरती है।

इस पूरे खेल को समझने के लिए सुप्रीम कोर्ट के उन दो फैसलों के बारे में जानेंगे…जिसने ये साबित कर दिया है कि इस वक्त समय की सबसे बड़ी मांग जातिगत जणगणना ही है, और अगर ये गणना होती है तो फिर कौन सा सच सामने आयेगा। जानेंगे कि आखिर कैसे एससी एसटी और ओबीसी कैटेगरी वालों को आरक्षण देने और उनके आरक्षण पर उन्हें निशाना बनाने वालो के मुंह पर तमाचा पड़ सकता है।

क्या है आरक्षण की कहानी

दरअसल भारत में जब संविधान बनाया गया तो पिछड़े तबके के लोगो को आर्थिक रूप से और सामाजिक रूब से मजबूती देने के लिए आरक्षण का प्रावधान बनाया गया, जिसके अनुसार  अनुसूचित जाति यानि कि SC वर्ग को लगभग 15%, अनुसूचित जनजाति यानि कि ST को लगभग 7.5%, अन्य पिछड़ा वर्ग जिसे OBC कहा जाता है उन्हें 27% आरक्षण दिया गया था। इन आरक्षण के बीच (SC/ST/OBC) के भीतर महिलाओं के लिए भी 33.33% तक का आरक्षण दिया गया है, जिसे ‘आरक्षण के अंदर आरक्षण’ कहा जाता है।

वहीं हाल ही में संविधान के 103वें संशोधन के बाद आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग जिन्हें EWS कैटेगरी का कहा जाता है उन्हें 10 प्रतिशत आरक्षण दिया जाता है। इसमें ये जो EWS कैटेगरी है वो ACCTUALLY में जेनेरल कैटेगरी के लोगो के लिए ही बनाया गया है। यानि की कुल मिलाकर 49.5% इन कैटेगरी के लिए आरक्षित किया है, और उसके अलावा बाकि सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित है।    

क्या है कोर्ट का फैसला

दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने अभी हाल ही में सरकारी नौकरियों के पदों पर मेरिट के आधार पर जातिगत लाभ लेने और न लेने को लेकर दो फैसलों पर चर्चा करते हुए फैसला सुनाया है, जिसके बाद एक तरफ SC/ST/OBC वर्ग को फायदा भी होगा तो वहीं इसके नुकसान भी हो सकते है। दरअसल  19 दिसंबर को राजस्‍थान हाई कोर्ट ने एक फैसला सुनाते हुए कहा था कि सरकारी नौकरी में ऑपन कैटेगरी का मतलब साफ है कि उसमें हर जाति वर्ग के लोग आवेदन कर सकते है,  जाति, वर्ग या लिंग के आधार पर किसी को बाहर करने का कोई मतलब नहीं है, यहां चुनाव केवल मैरिट के आधार पर ही हो सकता है।

SC/ST/OBC कैटेगरी का लाभ – Benefits for SC/ST/OBC categories

सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को सही करार देते हुए कहा कि जब कैटेगरी ऑपन है और आवेदन करने वाले ने अगर SC/ST/OBC होने का फायदा पहले कभी नहीं उठाया और मैरिट के आधार पर वो उत्तीर्ण हुआ है तो उसे जेनेरल कैटेगरी का ही पद दिया जायेगा। वहीं अगर आवेदक ने पहले नौकरी के लिए SC/ST/OBC कैटेगरी का लाभ लिया है तो फिर अब उसे मैरिट के आधार पर नहीं बल्कि उसकी जाति के कैटगरी के आधार पर ही चयनित किया जायेगा।

जैसा कि  कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा है, जब 2013 में आयोजित  भारतीय वन सेवा के अनारक्षित कैडर में एससी श्रैणी के उम्मीदवार के आवेदन पर सुनवाई करने से इंकार करते हुए कहा था कि जिसने पहले जातिगत आरक्षण का लाभ लिया है, उसे ऑपन कैटेगरी का फायदा नहीं होगा। चाहे वो लाभ कभी भी लिया गया हो।

क्यों नहीं करने देते जातिगत आरक्षण

अब सवाल ये उठता है कि जातिगत आरक्षण होता है तो उससे क्या होगा। दरअसल अगर जातिगत आरक्षण होता है तो आपको पता चलेगा कि एससी कैटेगरी की जनसंख्या क्या 15 प्रतिशत ही है, एसटी केवल 7.5 प्रतिशत ही है या फिर ओबीसी कैटेगरी केवल 27 प्रतिशत ही है, और जो 10 प्रतिशत EWS वालों को मिलता है, क्यों वाकई में 10 प्रतिशत है भी। करीब 50 प्रतिशत आरक्षण जेनेरल कैटेगरी वालों को है, और 10 प्रतिशत जेनेरल में ही EWS वालों को है, यानि की सही मायने में देखा जाये तो जेनेरल वालो को करीब 50 प्रतिशत आरक्षण मिला है।

वहीं सरकारी नौकरियों में एससी एसटी कैटेगरी के आरक्षण की बात होती है, लेकिन जब रिजल्ट आता है तो ज्यादातर पास ही नहीं होते…और खाली रहने की सूरत में फिर से ऑपन कटऑफ करके भर्ती की जाती है, और ऐसे में जो जातिगत प्रमाणपत्र देकर नौकरी लेना चाहते थे, वो तो अब आवेदन भी नहीं कर सकते है, यानि कि न नौकरी हाथ लगी और न ही दुबारा आवेदन करने लायक छोड़ा।

दलित वर्गों को आरक्षण देने के नाम पर अक्सर प्रताड़ित

अगर हम पूरे का विश्लेषण करते है तो पायेंगे, कि जिन पिछड़ो और दलित वर्गों को आरक्षण देने के नाम पर अक्सर प्रताड़ित किया जाता है उन्हें सही मायने में कुछ खास हासिल ही नहीं होने दिया जाता है। जिसका सबसे बड़ा उदाहरण आप यूपी और एमपी में ही देख सकते है..ज्यादातर उंचे पदों पर जेनेरल कैटेगरी वाले है… जो खुद ये तय करते है कि नौकरी किसे और कैसे देनी है.. फिर भला एससी एसटी या ओबीसी वर्ग को इसका लाभ कैसे मिला।

आरक्षण को बहुत बड़ा हथियार बनाया तो गया है लेकिन वो दलितों और पिछड़ो को लाभ पहुंचाने के लिए नहीं बल्कि उनको प्रताड़ित करने के लिए। सरकारी नौकरियों में होने वाले घोटालों के पीछे कहीं न कहीं जातिगत जनगणना का न होना भी हो सकता है। जिससे जातिगत आधार पर बंटवारा हो सकें… मैरिट के आधार पर नौकरी मिलना सही है, लेकिन एससी एसटी वर्ग के लिए जो दायरे तय किये गए है वो कहीं न कहीं उनके लिए नुकसानदेह है।

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