क्या कहती है BNS की धारा 236, जानें इससे जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बातें

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BNS Section 236 in Hindi: भारतीय दंड संहिता (BNS) की धारा 236 झूठे साक्ष्य (False Evidence) और लोक न्याय के विरुद्ध अपराधों से संबंधित है। तो चलिए आपको इस लेख में बताते हैं कि ऐसा करने पर कितने साल की सजा का प्रावधान है और बीएनएस (Bhaarateey dand sanhita) में इसके के बारे में क्या कहा गया है।

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धारा 236 क्या कहती है? BNS Section 236 in Hindi

जैसा कि आप जानते हैं कि अलग-अलग धाराओं में अलग-अलग अधिनियम और दंड हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बीएनएस की धारा 236 क्या कहती है, अगर नहीं तो आइए जानते हैं। भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 236 उन झूठे बयानों पर केंद्रित है जो किसी घोषणा में दिए जाते हैं और जिन्हें साक्ष्य के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए कानून द्वारा अनिवार्य या अधिकृत किया गया है।

उदाहरण के लिए, यदि रवि नामक कोई युवक सरकारी नौकरी के लिए आवेदन में गलत योग्यता का दावा करता है या किसी अन्य कानूनी दस्तावेज में जानबूझकर गलत जानकारी देता है, लेकिन जब उन दस्तावेजों का सत्यापन किया जाता है तो सच्चाई सामने आ जाती है, तो इसे अपराध माना जाता है और यह इस धारा के अंतर्गत आ सकता है, क्योंकि इन दस्तावेजों को सबूत के तौर पर स्वीकार किया जा सकता है।

बीएनएस धारा 236 की महतवपूर्ण बातें 

  • धारा 236 के अंतर्गत अपराध तब होता है जब कोई व्यक्ति ऐसी घोषणा करता है या उस पर हस्ताक्षर करता है जिसे न्यायालय, लोक सेवक या कोई अन्य व्यक्ति विधि द्वारा साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने के लिए बाध्य या अधिकृत करता है।
  • यह प्रावधान केवल उन बयानों पर लागू होता है जिन्हें कानूनी रूप से साक्ष्य के रूप में मान्यता प्राप्त है।
  • ऐसी घोषणा में, कोई व्यक्ति जानबूझकर झूठा बयान देता है जिसके बारे में वह जानता या मानता है कि वह झूठा है या उसे सच होने का विश्वास नहीं है।
  • यह धारा न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की अखंडता और विश्वसनीयता को बनाए रखने में मदद करती है। 

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बीएनएस धारा 236 की और सजा

इसके अलवा आपको बता दें कि BNS  की धारा (Section) 236 के तहत दोषी पाए जाने पर सजा का प्रावधान है कि, दोषी व्यक्ति को उसी तरह दंडित किया जाएगा जैसे कि उसने मिथ्या साक्ष्य दिया हो या गढ़ा (fabricated) हो। इस धारा के अंतर्गत दोषी पाए गए व्यक्ति को झूठी गवाही देने के समान ही दंड दिया जाता है। इसमें अपराध की गंभीरता के आधार पर कारावास, जुर्माना या दोनों शामिल हो सकते हैं।

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