259 BNS in Hindi – भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 259 गिरफ्तार करने के लिए बाध्य लोक सेवक द्वारा जानबूझकर पकड़ने में चूक से संबंधित है। तो चलिए आपको इस लेख में बताते हैं कि ऐसा करने पर कितने साल की सजा का प्रावधान है और बीएनएस (BNS) में इसके के बारे में क्या कहा गया है।
Also Read: BNS section 257: भ्रष्टाचार रोकने और न्यायपालिका में विश्वास बनाए रखने का मजबूत हथियार
धारा 259 क्या कहती है? BNS Section 259 in Hindi
जैसा कि आप जानते हैं कि अलग-अलग धाराओं में अलग-अलग अधिनियम और दंड हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बीएनएस (BNS) की धारा 259 क्या कहती है, अगर नहीं तो आइए जानते हैं। भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 259 का संबंध उन लोक सेवकों से है, जिन्हें कानून के अनुसार किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने या हिरासत में लेने का कार्य सौंपा गया है, लेकिन यदि वे जानबूझकर ऐसा करने में असफल रहते हैं या उस व्यक्ति को भागने में सहायता देते हैं।
अर्थात्, अगर कोई पुलिस अधिकारी या अन्य सरकारी कर्मचारी, जिसकी जिम्मेदारी किसी अपराधी को पकड़ना है, जानबूझकर अपनी ड्यूटी को नहीं निभाता और अपराधी को जाने देता है, तो उसे इस धारा के तहत दोषी ठहराया जाएगा।
BNS 259 Important Points
- यह अपराध केवल तब लागू होता है जब चूक करने वाला व्यक्ति एक लोक सेवक हो और उसे कानूनी रूप से गिरफ्तार किया जाना आवश्यक हो।
- जानबूझकर चूक: चूक का होना अनजाने में नहीं, बल्कि जानबूझकर होना चाहिए।
- अगर किसी लोक सेवक पर यह प्रावधान लागू होता है और वह दोषी पाया जाता है, तो उसे उपर्युक्त अनुसार कारावास और/या जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।
Also Read: BNS section 258: भ्रष्ट अधिकारी की मनमानी पर लगेगी लगाम
बीएनएस धारा 259 की और सजा
इसके अतिरिक्त, बीएनएस (BNS) की धारा 259 के तहत, यदि किसी व्यक्ति को दोषी ठहराया जाता है, तो उसके लिए सजा निर्धारित की गई है। यदि यह सिद्ध होता है कि कोई लोक सेवक जानबूझकर किसी ऐसे व्यक्ति को पकड़ने में चूक करता है, जो आजीवन कारावास से दंडनीय अपराध के लिए जिम्मेदार था, तो उसे जुर्माने के साथ या उसके बिना तीन साल तक की जेल हो सकती है।
इसके अलवा आपको बता दें, भारतीय न्याय संहिता (BNS) में हुए नए बदलाव के बाद आरोपी भ्रष्टचार करते हुए पाया जाता है तो दोषी को कड़ी-से -कड़ी सजा होती है। चाहे फिर कोई भी व्यक्ति क्यों ही न हो। यह एक असंज्ञेय अपराध है (पुलिस बिना वारंट के गिरफ़्तारी नहीं कर सकती)। यह एक ज़मानती अपराध है और प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।



