278 BNS in Hindi: भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 278 यह इंडियन पैनल कोड (IPC) की पुरानी धारा 270 का एक बदला हुआ वर्जन है। यह धारा मुख्य रूप से पब्लिक हेल्थ और सुरक्षा से संबंधित है। तो चलिए आपको इस लेख में बताते हैं कि ऐसा करने पर कितने साल की सजा का प्रावधान है और बीएनएस (BNS) में इसके के बारे में क्या कहा गया है।
Also Read: BNS Section 274: खाने-पीने की चीज़ों में मिलावट पर कितने साल की सजा?
धारा 278 क्या कहती है? BNS Section 278 in Hindi
जैसा कि आप जानते हैं कि अलग-अलग धाराओं में अलग-अलग अधिनियम और दंड हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बीएनएस (BNS) की धारा 278 क्या कहती है, अगर नहीं तो आइए जानते हैं। भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 278… इस सेक्शन के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति यह जानते हुए कोई काम करता है कि उससे मौत हो सकती है, या किसी दवा को दूसरी दवा बताकर बेचने या बांटने के अपराध में शामिल होता है, और जानता है कि इस काम से किसी जानलेवा बीमारी का इन्फेक्शन फैल सकता है, और वह जानबूझकर या गलत इरादे से ऐसा करता है, तो उस व्यक्ति को अपराधी माना जाएगा। उसे इस काम के लये कड़ी से कड़ी सजा भी हो सकती हैं।
BNS 278 Important Points
- यह सुनिश्चित करने के लिए है कि मरीज़ों को सही दवा मिले और दवा बिक्री में धोखाधड़ी से पब्लिक हेल्थ की रक्षा हो।
- यह अपराध जमानती और गैर-संज्ञेय है, जिसका मतलब है कि पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तार नहीं कर सकती, जमानत मिल सकती है, और मामले की सुनवाई कोई भी मजिस्ट्रेट कर सकता है।
बीएनएस धारा 278 का उदहारण
- For Example: अगर रवि नाम का कोई दुकानदार सिप्रोफ्लोक्सासिन को एमोक्सिसिलिन बताकर बेचता है, तो वह इस धारा के तहत दोषी माना जाएगा। क्योंकि उसके ऐसे करने से किसी व्यक्ति की जान भी जा सकती हैं, या उसके किसी तरह का इन्फेक्शन भी हो सकता हैं।
Also Read: BNS Section 273: क्वारंटाइन नियमों के उल्लंघन पर जाने क्या सज़ा और प्रावधान
बीएनएस धारा 278 की और सजा
इसके अतिरिक्त, बीएनएस (BNS) की धारा 278 के तहत, यदि किसी व्यक्ति को दोषी (Guilty) ठहराया जाता है, तो उसके लिए सजा निर्धारित की गई है। यह तब लागू होता है जब कोई व्यक्ति लापरवाही से ऐसा कुछ करता है जिससे बीमारी फैलने की संभावना हो। इस सेक्शन के तहत, अपराधी को 6 महीने तक की जेल, पाँच हजार रुपये जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। इसके अलवा आपको बता दें, यह एक गैर-संज्ञेय (non-cognizable) अपराध है, इसलिए पुलिस को जाँच के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति चाहिए होती है।



