293 BNS in Hindi: भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 293 भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 293 खास तौर पर ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए बनाई गई है, जहाँ कोई व्यक्ति प्रशासन या सरकारी अधिकारी के आदेशों की अनदेखी करने के बावजूद सार्वजनिक परेशानी पैदा करता रहता है। तो चलिए आपको इस लेख में बताते हैं कि ऐसा करने पर कितने साल की सजा का प्रावधान है और बीएनएस (BNS) में इसके के बारे में क्या कहा गया है।
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धारा 293 क्या कहती है? BNS Section 293 in Hindi
जैसा कि आप जानते हैं कि अलग-अलग धाराओं में अलग-अलग अधिनियम और दंड हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बीएनएस (BNS) की धारा 293 क्या कहती है, अगर नहीं तो आइए जानते हैं। भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 293… धारा 293 के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति सरकारी अधिकारी के रोकने के आदेश के बाद भी सार्वजनिक परेशानी वाली गतिविधि को दोहराता है या जारी रखता है, और इससे आस-पास के लोगों को नुकसान होता है या उनकी जान खतरे में पड़ती है, तो उस व्यक्ति को कानून तोड़ने का दोषी माना जाएगा।
BNS 293 Important Points
- सार्वजनिक परेशानी (जैसे बहुत ज़्यादा शोर, सार्वजनिक रास्ते में रुकावट डालना, या कचरा फैलाना) के मामलों में, पुलिस या मजिस्ट्रेट आमतौर पर पहली बार में चेतावनी देते हैं या काम रोकने का आदेश देते हैं।
- धारा 293 का मकसद उन लोगों को सज़ा देना है जो कानून की अनदेखी करते हैं और वैध आदेश के बावजूद समाज के लिए परेशानी पैदा करते रहते हैं।
बीएनएस धारा 293 का उदहारण
For Example: मान लीजिये अगर किसी इन्सान को सड़क किनारे खाने की दुकान को फुटपाथ पर कब्ज़ा करने से रोकने का ऑर्डर मिलता है, और फिर भी वह ऐसा करना जारी रखती है, तो उसके खिलाफ कानून की यह धारा लगाई जा सकती है।
इसके अलावा, आपने देखा होगा कि कुछ लोग सड़क किनारे अस्थायी शेल्टर बनाकर रहने लगते हैं। सरकार कई बार उन्हें हटाने के आदेश देती है, लेकिन इन आदेशों के बाद भी वे अक्सर वहीं रहते हैं, जिसके कारण उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाती है।
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बीएनएस धारा 293 की और सजा
इसके अतिरिक्त, बीएनएस (BNS) की धारा 293 के तहत, यदि किसी व्यक्ति को दोषी (Guilty) ठहराया जाता है, तो उसके लिए सजा निर्धारित की गई है। यह तब लागू होता है जब कोई व्यक्ति लापरवाही से ऐसा कुछ करता है जिससे बीमारी फैलने, या चोट लगाने की संभावना हो। इस सेक्शन के तहत अपराधी को 6 महीने की जेल और को 5000 हजार रुपये जुर्माना लगाया जाता हैं। इसके अलवा आपको बता दें, यह एक गैर-संज्ञेय (non-cognizable) अपराध है, इसलिए पुलिस को जाँच के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति चाहिए होती है।



