क्या है ब्रह्मजाल सूत्र? बुद्ध ने बताया दुखों से मुक्ति का वास्तविक मार्ग – The Long Buddha Shortened

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The Long Buddha Shortened: बुद्ध की सभी शिक्षाओं में से ये शिक्षा की व्यक्ति जब तक मोह माया और अच्छे बुरे के बंधनजाल से नहीं निकलता तब तक वो बुद्धत्व को प्राप्त नहीं कर सकता है, मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता है, सबसे अहम शिक्षा मानी जाती है। बुद्ध ने अपने तप के जरिये भी इसी सत्य को जाना कि केवल मोह ही सभी दुखों का कारण है, मोह छूट जायेगा तो आप अपनी अच्छाई, बुराई सबके विरल हो जायेंगे। आपको कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि आपके बारे में कोई क्या विचार रखता है। कुछ ऐसा ही बताया है बुद्ध ने अपने ग्रंथ ब्रह्मजाल सूत्र में..जो कि दीघा निकाय, जिसे आप बुद्ध के लंबे प्रवचनो का एक संग्रहण कह सकते है… जिन्हें सर्वोच्च जाल अथवा विचारों का सर्वव्यापी फैला हुआ जाल भी माना जाता है। अपने इस वीडियो में हम इसी सर्वोच्च जाल कहलाने वाले ग्रंथ के बारे में जानेंगे, जो वास्तविकता और काल्पनिक चीजों के बारे में बड़ी जानकारी देते है।

जानें क्या है ब्रह्मजाल सूत्र

क्या है ब्रह्मजाल सूत्र- बुद्ध के प्रवचन कई ग्रंथो में संकलित है, जिनमें कुछ प्रवचन छोटे तो कुछ बड़े है, बड़े प्रवचनो को दीघा निकाय कहा जाता है, जो कि ब्रहमसूत्र जाल में संकलित है और ये ग्रंथ बुध के दीघ निकाय का पहला ग्रंथ भी है। इस ग्रंथ में बुद्ध ने स्वयं और पूरे ब्राह्माण्ड के बारे में 62 तरह के उन काल्पनिक विचारों के बारे में बताया है, जिसके जरिए आप बौद्ध उपासक गलत दृष्टिकोण को समझ सकें और सही गलत का अवलोकण करके गलत का खंडन कर सकें। इसके अलावा 18 शास्वतवाद और आंशिक शास्वतवाद विचारों के बारे में है, जिसमें आत्मा और दुनिया को स्थाई माना गया है।

इनके अलावा विनाशवाद, वर्तमान के भौतिक सुख और उससे मुक्ति का रास्ता बताने वाले सिद्धांत, परिमितता औऱ अनंतता के बारे में भी बताया गया है। इन प्रवचनों में बताया गया कि बुद्ध कैसे अपने शिष्यों को सर्वोच्च जाल बिछाकर संसार की सभी दर्शनों और काल्पनिक अवधारणों को आसानी से पकड़ लेते है..वो मार्गदर्शन करते है कि यदि आपने अपने उन विचारो का त्याग नहीं किया जो आपको जीवण मरण के चक्र में, मोह में बांधे रखेगा, तब तक आपकी मुक्ति संभव नहीं है। अगर व्यक्ति को परम शांति, स्वतंत्रता और खुद में शून्यता का अनुभव करना है तो साधक को अपने वैचारिक अवधारणों को बदले, आसक्ति को छोड़ कर ही, उससे ऊपर उठ कर ही मुक्ति का रास्ता पाने की मार्ग प्रशस्त करके ही पाया जा सकता है।

कौन है सुप्पिया

बुद्ध के इस ज्ञान को एक कहानी के जरिये समझा जा सकता है., ब्रह्मजाल सूत्र में बताया गया कि बुद्ध अपने करीब 500 भिक्षुओ के साथ प्रवचन करते हुए एक स्थान से दूसरे स्थान पर विचरण कर रहे थे, लेकिन उसी रास्ते से उनके पीछे एक शिक्षक सुयप्पा भी चल रहा था, जो कि असल में बुद्ध के खिलाफ रहता था, और उनका कड़ा आलोचक था, मगर सुप्पिया का एक शिष्य था ब्रह्मदत्त, जो बुद्ध का एक परम उपासक था। एक तरफ शिक्षक बुद्ध की बुराई कर रहे थे तो शिष्य उनकी तारीफ करते हुए चर्चा करते हुए बस चल रहे थे, उन्हें ये आभास नहीं था कि सामने 500 भिक्षुओं के साथ बुद्ध भी चल रहे है। शिष्यों को शिक्षक की बात पसंद नहीं आई, लेकिन बुद्ध ने नकारात्मक औऱ सकारात्मक दोनो बातें सुनी और बिना कुछ बोले आगे चल दिये, लेकिन रात के समय जब उन्होंने शिष्यों के साथ पड़ाव डाला तो शिष्यों ने इस मामले में चर्चा की।

जानें बुद्ध क्या कहते है?

वो इस बात से नाराज थे कि बुद्ध को जाने बिना ही कोई इस तरह की अवधारणा कैसे रखा सकता है। लेकिन तब बुद्ध ने उन्हें शांत कराया और कहा कि बुद्ध को या उनके शिष्यों को ऐसे लोगों से तो कभी नाराज ही नहीं होना चाहिए जो उनकी बुराई करते है, क्योंकि उससे किसी भी आंतरिक विकास नहीं रूकेगा। बल्कि ये सोचना चाहिए का जो आलोचना कर रहा है उसमें आखिर गलत क्या है, वहीं प्रशंसना के साथ भी ऐसे ही विचार रखियें। प्रशंसा में भी देखिये कि प्रशंसा में क्या सही है। बुद्ध कहते है कि जो मूर्ख है, संसारिक की विलासिता में लिप्त है, वहीं झूठ , व्याभिचार, हिंसा, संपत्ति जैसे मामलों में हस्तक्षेप करने औऱ उसके बारे तारीफ करके दिखाने की कोशिश करके है कि आपने जो किया वो सही किया है, वहीं उसके उलट  मूर्ख, सांसारिक लोग ही ऐसे मुद्दो पर किसी को दोषी ठहराते है जो बेकार की बातों में आकर किसी का गलत कर देते है।

संसार के 2 विचार कौनसे है?

मगर सच तो ये है कि जो परम ज्ञानी है वो उन बातों को देखेगा जिसे  देखना कठिन है और जो सामान्य विचार से  हटकर है। जो वाकई में तारीफ के योग्य है। ये ज्ञान निरंतर अभ्यास से प्राप्त किया जा सकता है.. अंत के समय तक संसारिक विचारों से  अनासक्त रहना ही सच्ची शांति और स्वतंत्रता का ज्ञान कराती है। संसार के शुरुआत से ही दो तरह के विचार चलते है पहला आत्मा और संसार शाश्वत हैं, दूसरा

अनंततावादी और परिमिततावादी। हालांकि ये दोनो वैचारिक मतभेद लोगो के एक ही पक्ष से चिपके रहने के लिए प्रेरित करती है, इसलिए दूसरे तरफ के विचारों को स्वीकार करना आसान नहीं है.. ये एक ऐसा जाल है जिसमें दो विचार पूरी तरह से फंस गए है, जो कि बेहद जटिल है। इससे सुरक्षा और शांति नहीं बल्कि असुरक्षा ही मिलेगी। इन दोनो के विचार अगर कोई वाकई में परमज्ञानी है तो ही वो इन जालों को समझ सकते है और उससे निकल कर विजय प्राप्त कर सकते है। अन्यथा संसार इसी दो विचारों के अधीन है, जो उसकी मुक्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है।

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