Manusmriti: बाबा साहब जातिवाद, जातिगत भेदभाव के कितने कट्टर विरोधी थे, इसका बात प्रमाण उन्होंने 25 दिसंबर 1927 को हिंदू धर्म में जीवन यापन करने के लिए बताये गए नियमों वाली ग्रंथ को सार्वजनिक रूप से जला कर बता दिया था। बाबा साहब ने मनुस्मृति पढ़ी और उन्होंने कहा कि मनुस्मृति न केवल दलितों और शूद्रों के खिलाफ है बल्कि उसके अनुसार महिलाएं तो उन शूद्रो से भी ज्यादा नीचे है, मनुस्मृति के अनुसार महिलाएं केवल भोग के लिए और वंश को आगे बढ़ाने मात्र के लिए ही है, न तो उन्हें आवाज उठाने का अधिकार होना चाहिए और न ही खुली हवा में सांस लेने का।
बाबा साहब ने ये ग्रंथ जला कर कोई गलती नहीं की थी.. क्योंकि ये मनुस्मृति ही है जिसके कारण आज भी महिलाओं के विकास और उनके आगे बढ़ने पर समाज मं कुछ लोगो को परेशानी होती है। अपने इस लेख में हम जानेंगे कि आखिर क्यों बाबा साहब ने माना कि महिलाओं के लिए मनुस्मृति दलितों से भी ज्यादा क्रूर और खतरनाक है। अपने इस वीडियो में जानेंगे कि आखिर ऐसा कौन का गहरा और घिनौना सत्य है महिलाओं के लिए मनुस्मृति में..जिसे आज की आधुनिक महिलायें स्वीकार करने से इंकार करती है।
मनुस्मृति महिला के वरदान या अभिशाप
जब आप 1949 में संसद में पेश होने वाले हिंदू कोड बिल के बारे में पढ़ेगे तो पायेंगे कि जब बाबा साहब हिंदू कोड बिल लाये थे, जब अपने भाषण में उन्होंने कहा था कि मनुस्मृति में महिलाओं को संपत्ति का अधिकार मिला है, यहां उन्होंने मनुस्मृति का तारीफ की थी, ऐसे में सवाल ये है कि फिर क्यों थे वो इसके खिलाफ। दरअसल मनुस्मृति के पांचवें अध्याय के 148वें श्लोक में ये वर्णन किया गया है कि कन्या को स्वत्रंत सोच के बजाय हमेशा पहले अपने पिता के संरक्षण में, फिर शादी के बाद पति के संरक्षक में, और पति की मौत के बाद अपने बेटे के संरक्षण में रहना चाहिए।
मनुस्मृति का पांचवा अध्याय महिलाओं के कर्तव्यों
यानि की स्त्री सदैव किसी न किसी पुरुष के दया पर निर्भर रहना चाहिए, किसी भी स्थिति में एक महिला खुद के लिए निर्भर होकर नहीं सोच सकती। मनुस्मृति का पांचवा अध्याय महिलाओं के कर्तव्यों, शुद्धता और अशुद्धता आदि के बारे में ही है। जिसे असल मायने में हिंदुओं का मानक धर्मग्रंथ बनाने के लिए, और उसमें लिखी बातों को लोगो के दिलों दिमाग में बसाने की चाल ब्राह्मणों ने चली थी। जिन्होंने ये सोच फैलाई कि महिला का कल्याण तभी हो सकता है।
जब एक पुरुष का कल्याण हो जाए, महिला पुरुषों की सेवा के लिए है, और महिला पुरुषों की सेवा करेगी, उसके ही स्वर्ग मिलेगा। शूद्रो की तरह महिलाओं को भी शिक्षा के अधिकारों से वंचित कर दिया..कारण दोनो ही स्थिति में एक ही था… अगर शूद्र और महिलाएं शिक्षित होती तो वो रूढ़ीवादी परंपरा की बेड़ियों को तोड़ कर अपने अधिकारों से लिए लड़ने लगती.. जो पुरुष प्रधान समाज के कहां बर्दाश्त होता।
ग्रंथ में महिला को सेविका भी बताया
वहीं मनुस्मृति का 15वां नियम कहता है कि महिलाओं का पुरुषों के प्रति चाहत, महिलाओं का जल्दी बदलने वाला मन और स्वाभाविक हृदयहीनता की वजह से अपने पति के प्रति धोखेबाज हो सकती हैं. ऐसे में उन्हें बहुत संभालकर या फिर बहुत निगरानी में रखना चाहिए…मतलब की इस ग्रंथ में महिला को सेविका भी बताया गया है साथ ही उन्हें धोखेबाज भी कहा जा रहा है.. इसलिए उनके पर काट कर आजादी छीन लेनी चाहिए। महिलायें पुरुषों को बहका सकती है..इसलिए चरित्रवान पुरुष उत्तेजित होकर बहकने के बजाय महिलाओं के आसपास संभल कर रहते है, इतना ही नहीं जो महिलायें जीवन देती है।
उन्हे राजस्वला स्थिति में अपवित्र कह कर उनकी तरफ न देखने का ज्ञान दिया गया। जिस स्त्री का भाई न हो, जिसके पिता के नाम का पता न हो, जो जाति में छोटी हो, ऐसी स्त्री से कभी विवाह नहीं करना चाहिए। यानि की महिला की पहचान केवल उससे जुड़े पुरुष से ही हो सकती है। हालांकि इसी मनुस्मति में महिला को केवल एक ही स्थान पर सम्मानीय कहा गया है।
मनुस्मृति में महिलाओं का सम्मान है?
मनुस्मृति के अध्याय 3 के श्लोक संख्या 56 में असल में महिलाओं के आपके जीवन में होने की महत्ता का बखान मिलता है। जिसके अनुसार ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।।’..संस्कृत में लिखे इस श्लोक का मतलब है जिस घर में महिलाओं को उंचा स्थान मिलता है, किसी भी काम में उनकी अनुमति और सहमति ली जाती है, उस घर में सदैव लक्ष्मी का वास होगा। पत्नी अर्धांगिनी है, जो उसका सम्मान करेगा वहीं सफल होगा। पत्नी को सदैव पति की परछाई बन कर रहना चाहिए। पत्नी के दायित्वो को पूरा करना ही उनका परम धर्म है।
महिलाओं को सम्मानित होने का भ्रम
यानि की मनुस्मृति के अनुसार महिला तब तक ही पूजनीय है जब तक वो पुरुषों की बनाये नियमों पर चले, अगर वो इन नियमो की खिलाफत करती है तो वो महिला समाज में सम्मानित नहीं हो सकती है। जबकि बाबा साहब मानते थे कि अगर महिलाओं को मौका मिले तो वो पुरुषों से भी ज्यादा बेहतर कर सकती है… जरूरत थी तो उन्हें वो सम्मान, वो ताकत देने की.. जिसे देने से मनुस्मृति को मानने वाले बचते रहे थे। मनुस्मृति में भले ही महिलाओं को सम्मानित होने का दर्जा दिया गया है, लेकिन उसके भी दायरे तय कर दिये गए थे… ताकि महिलाओं को सम्मानित होने का भ्रम बनाया रखा जा सकें और उनका शोषण होता रहे। हम आज के समाज के लोगो की राय जानना चाहते है, कि क्या वाकई में महिलाएं ऐसी स्थिति में सम्मानित महसूस कर सकती है।



