भारत में डॉ अंबेडकर से जुड़ी 5 बड़ी जगहें, जहां हर दलित को जरुर जाना चाहिए

Top 5 Ambedkar place
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बाबा साहेब अंबेडकर ने इस दुनिया को बहुत कुछ दिया. सम्मान, स्वाभिमान और अपमान के खिलाफ उनकी लड़ाई ने दुनिया भर के पिछड़ों को एक अलग नजरिया दिया और अपने हक के लिए लड़ने की ताकत दी. यही कारण रहा कि आज के समय में भारत के साथ साथ दुनिया बाबा साहेब के आगे नतमस्तक होती है. भारत में बाबा साहेब से जुड़े कई ऐसे भव्य स्थान हैं, जहां हर रोज हजारों की संख्या में लोग पहुंचते हैं. तो चलिए आपको इस लेख डॉ बाबा साहेब से जुड़े उन 5 स्थानों के बारे में बताते हैं. जहां हर दलित को अपनी जिंदगी में कम से कम 1 बार तो जरुर ही जाना चाहिए.

बाबा साहेब जन्म भूमि मध्य प्रदेश का महू

हमारी इस लिस्ट में पहले नंबर पर है मध्य प्रदेश का महू, जहां बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर (Dr. Bhimrao Ambedkar) का जन्म हुआ था. दरअसल, 14 अप्रैल 1891 को महू क(Mhow) के एक सैन्य छावनी में इनका जन्म हुआ था. आज के समय में इस स्थान पर एक भव्य स्मारक बन कर तैयार है और हर रोज हजारों की संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं. इस स्मारक को भीम स्मारक के नाम से भी जाना जाता है.

बाबा साहेब अंबेडकर के 100वें जन्मदिन के अवसर पर मध्य प्रदेश के तत्कालीन सीएम सुंदरलाल पटवा ने भव्य स्मारक बनाने की नींव रखी थी. 14 अप्रैल 2008 को इसे लोकार्पित किया गया था और जनता के लिए खोल दिया गया था. सभी अंबेडकरवादी और नवबौद्धों के लिए यह स्थान बेहद ही महत्वपूर्ण है.

बाबा साहेब का पैतृक गांव

बाबा साहेब अंबेडकर से जुड़ी दूसरी जगह है उनका पैतृक गांव. जी हां, बाबा साहेब का जन्म भले ही मध्य प्रदेश में हुआ लेकिन उनका परिवार मूल रूप से महाराष्ट्र के अंबावड़े गांव का रहने वाला था. रत्नागिरी जिले में स्थित इस गांव को स्फूर्ति भूमि के नाम से जाना जाता है.

महाराष्ट्र सरकार ने इस गांव में विश्व भूषण भारत रत्न डॉ बाबा साहेब अंबेडकर स्मारक बनाया है. बाब साहेब के पैतृक घर को ही स्मारक में बदल दिया गया है. रत्नागिरी की हवाओं में आज भी बाबा साहेब की विरासत जिंदा है और इसी विरासत को समेटने यहां हर रोज काफी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं.

बाबा साहेब की दीक्षा भूमि – Baba Saheb’s initiation place

बाबा साहेब अंबेडकर से जुड़ी तीसरी जगह है दीक्षा भूमि, जहां बाबा साहेब के साथ ही करीब 5 लाख लोगों ने धर्म परिवर्तन करते हुए बौद्ध धर्म अपना लिया था. यह दुनिया के इतिहास में सबसे बड़ा धर्मातरण बना…दरअसल, 1935 में ही बाबा साहेब ने ऐलान कर दिया था कि मैं हिंदू धर्म में पैदा जरुर हुआ हूं लेकिन हिंदू रहते मरुंगा नहीं. इसके बाद 21 सालों तक उन्होंने अन्य सभी धर्मों का अध्ययन किया. यहां तक कि उनके पास इस्लाम और सिख धर्म अपनाने के ऑफर तक आए लेकिन बाबा साहेब को इन धर्मों में भी भेदभाव नजर आया. उसके बाद बाबा साहेब इस नतीजे पर पहुंचें कि बौद्ध धर्म ही इकलौता ऐसा धर्म है, जहां ऊंच नीच नहीं है भेदभाव नहीं है.

दुनिया का सबसे बड़ा खोखला स्तूप

यही कारण रहा कि उन्होंने 14 अक्टूबर 1956 को अपनी पत्नी सविता अंबेडकर के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया था. केवल दलितों के लिए ही नहीं बल्कि बौद्ध धर्म को मानने वालो के लिए भी ये स्थान बेहद महत्वपूर्ण है. मौजूदा समय में यहां एक स्तूप है जिसे 1978 में बनवाया गया था. यह स्तूप एशिया के साथ साथ दुनिया का सबसे बड़ा खोखला स्तूप है. 2 मंजिला इस स्तूप के एक मंजिल पर करीब 5 हजार लोग एक साथ आ सकते हैं. हर रोज यहां भी काफी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं.

डॉ अंबेडकर का महापरिनिर्वाण – Dr. Ambedkar’s Mahaparinirvana

बाबा साहेब अंबेडकर से जुड़ी चौथी जगह है महापरिनिर्वाण भूमि. दरअसल, डॉ अंबेडकर का महापरिनिर्वाण दिल्ली के 26 अलीपुर रोड स्थित बंगले में हुआ था. 14 अप्रैल 2016 को पीएम मोदी ने 26, अलीपुर रोड पर डॉ अंबेडकर राष्ट्रीय स्मारक का उद्घाटन किया, जहां बाबा साहेब ने 6 दिसंबर 1956 को महानिर्वाण प्राप्त किया था. इस स्थान पर भव्य डॉ अम्बेडकर राष्ट्रीय स्मारक बनाया गया है, जो देखने में भी काफी बेहतरीन है.

इस स्मारक को संविधान की खुली किताब के रूप में बनाया गया है. स्मारक का समग्र वातावरण आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक बौद्ध वास्तुकला का एक आदर्श मिश्रण है. यहां एक विशाल अशोक स्तंभ है और प्रार्थना भवन भी बनाया गया है. इसे बनाने में करीब 200 करोड़ का खर्च आया था. यहां हर रोज सैकड़ों लोग पहुंचते हैं और बाबा साहेब के विचारों से प्रेरणा लेते हैं.

चैत्य भूमि 2 मंजिला स्मारक

हमारी इस लिस्ट का पांचवा और अंतिम स्थान है चैत्य भूमि. यहीं पर 7 दिसंबर 1956 को डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर का अंतिम संस्कार किया गया था. पहले इस स्थान को दादर चौपाटी के रूप में जाना जाता था. इसी स्थान पर एक 2 मंजिला स्मारक बनाया गया है, जिसमें बाबा साहेब की तस्वीर के साथ साथ भगवान बुद्ध की प्रतिमा लगी हुई है. इस स्थान पर बाबा साहेब का अस्थि कलश भी रखा गया है. अक्सर यहां लोग पहुंचते हैं और उसका दर्शन करते हैं. आपको बता दें कि इस स्मारक का उद्घाटन 5 दिसंबर, 1971 को डॉ. अंबेडकर की बहू मीराबाई यशवंतराव अंबेडकर (Mirabai Yashwantrao Ambedkar) ने किया था. हर साल 6 दिसंबर को लाखों अनुयायी डॉ. अंबेडकर को श्रद्धांजलि देने के लिए चैत्य भूमि जाते हैं.

इनके अलावा भारत में बाबा साहेब से जुड़े और भी कई स्थान हैं, जहां अक्सर लोग पहुंचते हैं. बाबा साहेब की विरासत को करीब से जानना और समझने के लिए आपको इन जगहों पर एक बार जरुर जाना चाहिए…तो आप बाबा साहेब से जुड़ी इन जगहों की यात्रा कब करने वाले हैं?

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