साल 1946 का चल रहा था, अंग्रेजों का जाना लगभग तय हो गया था, और देश गुलामी के डूबते सूरज को देखते हुए आजादी के उगते सूरज को देखने के लिए टकटकी लगाए हुए था, और देश की राजनीति के कुछ धुरंधर देश के लिए कुछ मूलभूत कायदे कानून बनाने की तैयारी में थे, तो वहीं आजादी की लड़ाई के साथ साथ जातिगत भेदभाव के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले बाबा साहब आंबेडकर भी पूरी तरह से सक्रिय थे, हालांकि कांग्रेसी विचारों से उनकी कभी नहीं बनी और नतीजा जब वो बॉम्बे से चुनाव में खड़े हुए तो कांग्रेस के विरोध के कारण चुनाव बुरी तरह से हार गए, वो जानते थे कि दलितों की आवाज उठानी है तो दलितों के लिए लड़ने वालों के साथ खड़ा होना पड़ेगा, और उन्होंने तब दमन थामा था बंगाल के अनुसूचित जाति संघ और मुस्लिम लीग का।
वो विधानसभा चुनाव जीते और (Scheduled Caste Federation) के सदस्यों और मुस्लिम लीग के समर्थन से संविधान सभा के सदस्य बने थे। बंगाल के नेता न होते तो शायद बाबा साहब को कभी संविधान सभा में जगह ही नहीं मिल पाती, बाबा साहब के लिए बंगाल और बंगाल के लिए बाबा साहब बेहद खास थे, लेकिन हैरानी की बात है कि आज इसी पश्चिम बंगाल में भारत रत्न बाबा साहब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर के नाम पर कोई भी भव्य स्मारक नहीं बनाया गया. एक भी नहीं। लेकिन ऐसा क्यों है, और क्यों बंगाल में बाबा साहब की अनदेखी की जा रही है।
बंगाल से बाबा साहब का रिश्ता
बंगाल से बाबा साहब का रिश्ता दरअसल राजनीति गठबंधन के तहत हुआ, जब बॉम्बे में कांग्रेस के विरोध के कारण चुनाव हारने के बाद बाबा साहब ने मुस्लिम लीग और दलित नेता जोगेंद्र नाथ मंडल से सहयोग मांगा.. उस वक्त कांग्रेस संविधान सभा का गठन कर रही थी, और तय किया गया कि संविधान सभा के सदस्य विधानसभा सदस्यों में से चुने जायेंगे, इसके लिए बाबा साहब का विधानसभा चुनाव जीतना जरूरी थी, ऐसे में मंडल और मुस्लिम लीग ने खुलना सीट पर होने वाले उपचुनावों में बाबा साहब को प्रत्याशी बनाया गया और जोगेंद्र नाथ मंडल ने अपना नाम वापिस लिया।
बॉम्बे के उपचुनावों में मौका दिया
बाबा साहब को बंगाल की तरफ से संविधान सभा का सदस्य बना कर भेजा गया। हालांकि आजादी के बाद बंगाल का खुलना विधानसभा क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान के हिस्से चला गया और बाबा साहब की सदस्यता पूरी तरह से रद्द हो गई। लेकिन गांधी जी चाहते थे कि बाबा साहब संविधान सभा के सदस्य बने और उन्हें फिर से बॉम्बे के उपचुनावों में मौका दिया गया और मुम्बई प्रांत से एमआर जयकर को इस्तीफा दिलवा कर मौका बाबा साहब को दिया गया। जिसमें उन्होंने जीत हासिल की और वो संविधान सभा पहुंचे थे। ये बंगाल की ही देन थी कि बाबा साहब संविधान सभा पहुंचे थे, और सदस्यता रद्द होने के बाद भी अपनी लड़ाई जारी रखी थी, जिसने उन्हें सभा का अध्यक्ष के पद तक पहुंचाया था, और दुनिया को भारत के महान संविधान से रूबरू कराया।
बंगाल में बाबा साहब की अनदेखी
जिस पश्चिम बंगाल से बाबासाहेब अंबेडकर को संविधान सभा जाने का रास्ता मिला था जहां उन्हें सबसे ज्यादा सम्मान दिया गया था आज इस पश्चिम बंगाल में बाबा साहब की स्थिति बेहद खराब है एक तरफ पूरे देश में बाबा साहब अंबेडकर के प्रतिमाओं और उनके नाम की चर्चा 24 घंटे होती रहती है तो वही पश्चिम बंगाल में उनका नाम लेना तो दो उनके नाम से एक बड़ा स्मारक भी मौजूद नहीं है। बाबा साहब के सम्मान में केवल भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में उनके अनगिनत स्टैचू मौजूद है, स्मारक स्थल बनाए गए हैं लेकिन पश्चिम बंगाल में बाबा साहब के इतनी बड़ी उपलब्धियां के बावजूद भी उन्हें वह सम्मान कभी नहीं दिया गया जिसके वह हकदार थे।
कोलकाता में एक छोटा सा मूर्ति स्थल मौजूद
जानकारों की माने तो पूरे बंगाल में केवल कोलकाता में एक छोटा सा मूर्ति स्थल मौजूद है वह भी मेन सड़क से दूर बनाया गया है जहां अक्सर आने-जाने वालों की नजरे भी नहीं जाती। हैरानी की बात है कि वैसे तो बंगाल सरकार दलित पिछड़ा को लेकर बीजेपी के खिलाफ बहुत शोर मचाती है उनके अधिकारों की बात करती है लेकिन फिर भी जब दलितों के असली योद्धा को सम्मान देने की बात उठती है तो बंगाल सबसे पीछे क्यों हो जाता है। हालांकि बंगाल में अगर दलित जनसंख्या की बात की जाये तो 2011 की जनगणना के अनुसार करीब 57 लाख लोग दलित समुदाय से थे।
लेकिन फिर भी वहां बाबा साहब से जुड़ा कोई स्मारक न होना, बेहद आश्चर्य करता है। कई बार बाबा साहब से जुड़े स्मारकों को बनाने की मांग तो उठाई गई है लेकिन यहां की राजनीति के कारण ऐसा हो नहीं सका है। आज भी बाबा साहब के लिए सही सम्मान पश्चिम बंगाल में नहीं दिया गया है, जिससे कहीं न कहीं यहां के दलितों को काफी ठेस भी पहुंचती है लेकिन वो कुछ भी कर पाने में असमर्थ है।



