Ambedkar in America: भारत को आजादी कब मिली.. इसका जवाब तो आप सभी के पास होगा.. लेकिन अगर आपसे ये पूछा जाये कि बाबा साहब अंबेडकर को वाकई में आजादी का अहसास कब हुआ था तब आपका जवाब क्या होगा…क्या आजाद भारत में भी बाबा साहब ने आजादी महसूस की थी, शायद नहीं..क्योंकि संविधान सभा में शामिल होने से लेकर एक कानून एवं विधि मंत्री होते भी उन्हें अपनी इच्छा को रखने की आजादी संसद में नही थी, जो बड़ा कारण भी था उनके इस्तीफें का.. यानि कि केवल भारत आजाद हुआ था, जातिगत आजादी नहीं मिली थी।
बाबा साहब की अमेरिका की यात्रा
ऐसे में एक समय ऐसा भी बाबा साहब की जिंदगी में आया जब उन्होंने सही मायने में बराबरी का मतलब, औऱ सम्मान देखा, उसे करीब से महसूस किया..उस आजादी को जिया था। ये समय था 1913 से लेकर 191 तक का जब बाबा साहब पीएचडी की पढ़ाई करने के लिए अमेरिका की यात्रा पर गए थे। वो 5 साल उनके जीवन में उनकी सोच को निखारने में अहम साबित हुए। अपने इस लेख में हम बाबा साहब की अमेरिका की यात्रा और वहां उनके जीवन के बारे में जानेंगे.. जिसे हम अंबेडकर इन अमेरिका कह सकते है।
साल 1912 का समय था, बाबा साहब को बड़ौदा के गायकवाड़ राजघराने में नौकरी मिली थी, बाबा साहब ने ग्रेजुएशन कर लिया था, लेकिन वो आगे पढ़ना चाहते थे। 1935-36 में बाबा साहब की लिखी गई एक छोटी सी आत्मकथा वेटिंग फॉर अ वीजा लिखी थी, जिसमें अमेरिका जाने से पहले एक उच्च शिक्षित व्यक्ति होते हुए, एक राजघराने में कार्यरत रहते हुए भी उन्हें जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ता था, यानि कि शिक्षा भेदभाव को खत्म तभी कर सकती है जब व्यावहारिक रूप से भी सामाजिक भेदभाव की शिक्षा दी जाये।
गायकवाड़ का सैन्य सचिव – Gaekwad’s Military Secretary
बाबा साहब बड़ौदा रियासत की अनुकंपा के कारण शिक्षा हासिल कर पायें थे इसिलिए वो गायकवाड़ का सैन्य सचिव नियुक्त किये गए थे। लेकिन ये नौकरी छोड़नी पड़ी, बाबा साहब ने कुछ दिन निजी ट्यूटर, और अकाउंटेंट के रूप में काम किया था। हालांकि और ज्यादा पढ़ने की इच्छा को समझते हुए बड़ौदा के गायकवाड़ सयाजी राव तृतिय ने उन्हें पढ़ने के लिए स्कॉलरशिप देने का वादा किया, औऱ फिर उन्हें 3 सालों तक हर महीने 11.50 पाउंड दिया जाने लगा। लेकिन अमेरिका जाने के लिए भी बाबा साहब को लंबी यात्रा करनी पड़ी।
कैसे पहुंचे बाबा साहब अमेरिका
बाबा साहब की अमेरिका का यात्रा इतना आसान नहीं थे, पानी के जहाज से यात्रा करनी होती थी, जो काफी लंबी होती थी, जिसके लिए 15 जून 1913 में उन्होंने अमेरिका की यात्रा शुरू की थी, जिसमें वो स्टीमर पानी के एसएस साडनिया जहाज से मुम्बई से निकले थे। करीब 12 दिन तक ये यात्रा करके पहले इटली पहुंचे थे, जहां से फिर से जेनोआ से उन्होंने 7 जुलाई 1913 को एसएस अंकोना जहाज में सवार होकर अटलांटिस महासागर को पार करने की यात्रा करके 21 जुलाई 1913 को न्यूयॉर्क के फिलाडेलिफिया पहुंचे थे। ये इतिहास में पहली बार हो रहा था जब एक दलित अमेरिका जैसे प्रतिशिष्ठित देश में पढ़ने गया था।
बाबा साहब लिविंगस्टन हॉल
बाबा साहब का अमेरिका जाना उनके जीवन में एक क्रांतिकारी कदम था। यहां बाबा साहब को कोलंबिया विश्वविद्यालय में पढ़ने का मौका मिला। कहा जाता है कि बाबा साहब के पास उस वक्त मात्र 50 डॉलर ही थे। खाने पीने से लेकर रहने तक का खर्चा तब कुछ स्कोलरशिप पर ही निर्भर था, इसलिए बाबा साहब लिविंगस्टन हॉल में मौजूद कमरों में एक और छात्र नवल भथेना के साथ रहने लगे, जो एक पारसी थे।
इनके अलावा अंबेडकर के लिए अमेरिका में शिक्षा में उनकी मदद करने में कुछ क्लासमेट और उनके महान प्रोफेसर, जॉन डेवी, जेम्स शॉटवेल, एडविन सेलिगमैन और जेम्स हार्वे रॉबिन्सन ने काफी मदद की थी। अंबेडकर 18-18 घंटे पढ़ते थे। वो पुरानी किताबों को संग्रहित करते थे, इस कारण पैसे की तंगी होती थी, और उन्ही पैसो में से उन्हें परिवार के लिए भी भेजना पड़ता था, इसलिए वो रोजाना बेहद सस्ती चीजें खाते और कॉफी मफिन पर ही गुजारा कर लेते थे। अंबेडकर पढ़ाई को लेकर इतने जूनूनी थे कि स्कॉलरशिप के पैसे बचा कर उन्होंने करीब 2000 किताबे खरीदी थी।
बाबा साहब के जीवन के सबसे खूबसूरत और आजादी भरे दिन
यानि की अंबेडकर का जीवन भले ही अमेरिका में अभावो भरा था, लेकिन उन्होंने पहली बार जातिगत भेदभाव से आजादी महसूस की थी। उन्होंने अमेरिकी में बिताये दिनों को सबसे सुनहरे दिन कहे थे। यहां न तो उन्हें छुआछूत का सामना करना पड़ा था और न ही उनकी जाति को लेकर उन्हें अलग थलग करता था। सब बराबर थे, और सब केवल मानवता को सम्मान देते थे।
इस कारण अंबेडकर ने एमए करने के बाद पीएचडी करने का फैसला किया था, हालांकि बड़ौदा गायकवाड़ ने चौथे साल में उनकी स्कॉलरशिप बंद कर दी जिससे उन्हें मजबूरी में फिर से 1917 में वापिस भारत लौटना पड़ा। और जो आजादी उन्होंने अमेरिका में महसूस की थी, वो भारत में कही नहीं थी।
पीपुल्स एजुकेशन सोसाईटी
अंबेडकर के योगदान को अमेरिका ने सदैव सम्मान दिया है और उनकी आत्मकथा वेटिंग फॉर ए वीजा जो कि 1990 में पीपुल्स एजुकेशन सोसाईटी द्वारा प्रकाशित की गई थी, बाबा साहब के सम्मान में कोलंबिया विश्वविद्यालय ने इसे सबजेक्ट का हिस्सा बनाया, जिसे वहां पढ़ने वालो को पढ़ाया जाता है। अमेरिका में बिताये दिन बाबा साहब के जीवन के सबसे खूबसूरत और आजादी भरे दिन रहे थे, जिन्हें वो हमेशा प्रोत्साहित किया करत थे। जहां उन्होंने सही मायने में आजादी को अनुभव किया था। आजादी उन कुरितियों और भेदभाव से, जिसे वो बचपन से भारत में सहते आ रहे थे। इसलिए अमेरिका की यात्रा बाबा साहब के लिए बेहद खास यात्राओं में से एक है।



