पत्थर की मूर्तियों में नहीं, इंसानों में देवत्व खोजो जब रमाबाई की आँखों में आँसू देख बोले थे बाबा साहेब

Baba Saheb Ambedkar and Ramabai, Ambedkar wife
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बाबा साहब आंबेडकर की शादी मात्र 15 साल की उम्र में 9 साल की रमा बाई से हुई थी। बाबा साहब आज अगर भारत रत्न कहलाते है तो उसमें उनकी पत्नी जीवन संगिनी रमा बाई का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता है। स्कॉलरशिप कैंसल होने के बाद जब बाबा साहब मजबूरी ने वापिस लौट आये तो उनकी पत्नी ने अपने गहने तक गिरवी रख दिए थे ताकि बाबा साहब का पढ़ने का सपना पूरा हो सकें। हालांकि बाबा साहब अपना परिवार चलाने के लिए जी तोड़ मेहनत करते थे, लेकिन वो कभी पूरा ही नहीं हो पाता था।

4 संतानों को खो देने का दुःख

अभाव और लाचारी के कारण बाबा साहब और रमा बाई जी ने अपनी आँखों के सामने अपनी 4 संतानों को खो दिया था, बाबा साहब केवल रमा बाई को करुण विलाप करते देखते रह जाते थे, लेकिन बावजूद इसके रमा बाई ने बाबा साहब को कभी किसी बात के लिए दोषी नहीं माना।

उनका अपने ईश्वर के बहुत कभी कम नहीं हुआ, शायद उनकी जगह कोई और होता तो चार संतानों को खोने के बाद ईश्वर से उसके विश्वास उठ जाता लेकिन रमा बाई ने इसके अपन आराध्य विट्ठल देव जी का फैसला माना और उसे स्वीकार भी किया, लेकिन जब शूद्र जाति से होने के कारण रमा बाई को अपने आराध्य के दर्शन नहीं करने दिये हुए तो पहली बार वो बाबा साहब के सामने इसके लिए रो पड़ीं और रमा बाई को रोता देख कर बाबा साहब ने जो कहा उसे सुनकर रमा बाई समझ गई कि आखिर क्यों बाबा साहब हिंदू धर्म से विरक्त होने लगे थे।

क्या हुआ रमा बाई के साथ

दरअसल रमा बाई के बारे में कहा जाता है कि वो बेहद धार्मिक किस्म की महिला थी जिनका बचपन से ही पंढरपुर के विट्ठल पर अटूट विश्वास था, वो हमेशा उनकी पूजा किया करती थी, लेकिन दुख की बात ये थी कि शूद्र होने के कारण सार्वजनिक तौर पर न तो वो उनकी पूजा कर पाती और न ही गांव के मंदिर जा पाती थी, बावजूद इसके वो मानती थी कि उनके पति की सफलता, उनकी सुरक्षा विट्टल की कृपा के कारण ही सकार हुई है, और उन्होंने बाबा साहब की सफलता के लिए विट्ठल से प्रार्थना की थी।

जाति सबसे बड़ी दीवार बन गई

लेकिन जब वो सफल होकर लौटे तो अपनी मन्नत पूरी करने के लिए रमा बाई पंढरपुर के विट्ठल के मंदिर में उनके दर्शन करने गई थी, लेकिन वहां भी उनकी जाति सबसे बड़ी दीवार बन गई थी उनके और उनके आराध्य के बीच… रमाबाई ने देखा कि केवल एक शूद्र ने एक उंचे कुल के व्यक्ति को गलती से छू क्या लिया था, उसे सभी ने बुरी तरह से पीटा..उसके साथ ऐसा व्यावहार हुआ जैसे उससे बहुत जघन्य अपराध हो गया हो… एक सुशिक्षित व्यक्ति की पत्नी होने के बाद भी उनकी जाति के कारण उन्हें मंदिर में प्रवेश नही करने दिया गया था.. रमाबाई भारी और दुखी मन से आंखो में आंसू लिये वापिस लौट आई, और बाबा साहब के गले लग कर बहुत रोई। बाबा साहब ने सारी बातें सुनी और रमाबाई को विलाप न करने की सलाह दी।

बाबा साहब का प्यार भरा जवाब

बाबा साहब ने बचपन से देखा था कि रमाबाई की विट्ठल मे कितनी श्रद्धा थी, और वो बड़े मन से मंदिर गई थी, लेकिन उन्हें इस बात का भी अंदाजा था कि वहां क्या हो सकता है, जब रमाबाई ने आकर सारी बाते बताई तो बाबा साहब ने रमा बाई को गले लगा कर कहा कि वो विलाप क्यों कर रही है.. क्या केवल उनके आरादध्य के दर्शन नहीं हुए इसलिए लेकिन जरा सोचो जो भगवान अपने भक्तों को खुद से दर्शन देने लायक भी नहीं है।उनके दर्शक के लिए भी दूसरो की इजाजत लेनी पड़ती है, जो अपने भक्तों की रक्षा तक नहीं कर पा रहे है, उनके साथ न्याय तक नहीं कर पा रहे है, ऐसे भगवान की भला क्या ही पूजा की जाये।

भक्तों को भगवान से दूर होना पड़ता

हम क्यों ऐसे किसी भी तीर्थ पर जायें, जहां भक्तों को भगवान से दूर होना पड़ता है, जहां उनके भक्त अपमानित हो, और भगवान देखता रहे। बाबा साहब ने रमा बाई को संभालते हुए कहा कि वो किसी तीर्थ पर जाने के बजाय अपना तीर्थ खुद बनायेंगे। जहां वो विठोवा होंगे और रमाबाई उनकी रूक्मिनी होगी। जिसे सुनकर रमाबाई के आंखो में आसूं आ गए थे। रमाबाई हमेशा एक मजबूत स्तंभ की तरह बाबा साहब के साथ खड़ी रही, उन्होंने बाबा साहब का संघर्ष देखा, उनकी सफलता देखी थी।

हालांकि टीबी की बीमारी के कारण मात्र 39 साल की उम्र में रमाबाई का 27 मई 1935 को उनका निधन हो गया था, और बाबा साहब अकेले रह गए थे. लेकिन अगर हम आज ये कहे कि बाबा साहब के हिंदू धर्म के प्रति बदलते विचारों को रमा बाई ने बेहद करीब से देखा था। वो उन्हें समझ सकती थी कि आखिर क्यों बाबा साहब हिंदू धर्म से विरक्त हो गये थे और शायद हमेशा की तरह वो भी बाबा साहब के धर्म परिवर्तन का समर्थन जरूर करती.. दोनो का रिश्ता हमेशा आपसी समझ और समर्पण के साथ चला था और शायद इसी लिए आज भी रमाबाई का स्थान बाबा साहब की जिंदगी में सबसे उंचा समझा जाता है। आपका क्या सोचना है बाबा साहब की सोच को लेकर..हमें कमेंट करके जरूर बतायें।

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