Ambedkar in Delhi: भारत रत्न बाबा साहब अंबेडकर, जिनका जन्म मध्य प्रदेश के महू में हुआ था, लेकिन पिता महाराष्ट्र चले गए थे तो करीब 2 साल की उम्र में ही उन्हें पैतृक गांव जाना पड़ा था। शिक्षा के लिए उन्होंने बचपन से ही संघर्ष किया था, शिक्षा के लिए उन्होनें भारत के ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों की यात्रा की थी… लेकिन सारी दुनिया घूमने के बाद भी उनकी कर्मभूमि राजधानी दिल्ली बनी।
यहां तक कि उन्होंने अपनी अंतिम सांस भी दिल्ली के अलीपुर रोड के मकान में ली थी। अपने इस लेख में हम बाबा का जीवन में दिल्ली की यात्रा और यहां उनके निवास के दौरान क्या क्या हुआ, उसके बारे में जानेंगे, क्यों बाबा साहब ने राजनीति छोड़ने के बाद महाराष्ट्र में रहने के बजाय दिल्ली में रहने का फैसला किया था और अपने अंतिम समय तक वो दिल्ली में ही रहे थे। जानते है कैसी थी अंबेडकर की जिंदगी दिल्ली में।
बाबा साहब अंबेडकर की दिल्ली की पहली यात्रा
बाबा साहब आंबेडकर 15 अगस्त 1947 को आजाद भारत के पहले लॉ मिनिस्टर के रूप में चुने गए थे, और उन्हें पहली बार विधि मंत्री के तौर पर दिल्ली आकर संसद में बैठने का मौका मिला था। साथ ही सरकार द्वारा बनाई गई संविधान सभा के 299 सदस्यों में से एक सदस्य बाबा साहब अंबेडकर भी थे। संविधान सभा में शामिल ज्यादातर सदस्यों को ये पता था कि बाबा साहब से बेहतर कोई और संविधान तैयार करने के लिए लायक नहीं है। राजनीकि से लेकर अर्थव्यवस्था तक, बाबा साहब की सोच काफी दूरगामी थी, और इसलिए उन्हें संविधान सभा का अध्यक्ष चुना गया था। यहां की मसौदा तैयार करने वाली समीति के सदस्यों में से बाबा साहब अंबेडकर ही सबसे अहम थे।
हिंदू कोड बिल का मसौदा संसद में पास
उन्होंने अकेले ही पूरा मसौदा अपने हाथों से तैयार किया था। इसीलिए भारतीय संविधान को दुनिया का सबसे ब़ड़ा हस्त लिखित संविधान कहा जाता है। बाबा साहब ने संविधान को न केवल तैयार किया बल्कि उसे देश का सबसे बड़ा संविधान भी बनाया। बाबा साहब ने समाज में बराबरी लाने के लिए कई कदम उठाये, जिसमें 370 का विरोध करना हो, या फिर हिंदू कोड बिल का मसौदा संसद में पास करवाने की कोशिश हो। बाबा साहब महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक तौर पर मजबूत बनाने के लिए और गरीब मजदूरो की भलाई की दिशा में कई कड़े कानून ले कर आये थे।
कानून एवं न्याय मंत्री के तौर पर इस्तीफा
लेकिन उन्हें संसद में अक्सर उनकी जाति के लिए भेदभाव का सामना करना पड़ता था। कांग्रेस और उनके साथ जुड़ी पार्टियां अक्सर बाबा साहब की अवहेलना करती थी, लेकिन फिर भी बाबा साहब ने अपना काम ईमानदारी से किया था, लेकिन हिंदू कोड को लेकर हुआ विवाद, बाबा साहब के गुस्से का कारण बना, उन्होंने संसद से बतौर कानून एवं न्याय मंत्री के तौर पर इस्तीफा दे दिया था। 6 अक्टूबर 1951 को बाबा साहब ने हिंदू कोड बिल के विरोध को देखते हुए संसद से इस्तीफा देने का ऐलान कर दिया था।
बॉम्बे नॉर्थ फर्स्ट इंडियन जनरल इलेक्शन
जिससे वो संसद से बाहर निकल गए, लेकिन वो हमेशा से अपने लोगो के लिए कुछ करना चाहते थे , इसलिए उन्होंने महाराष्ट्र में 1952 के बॉम्बे नॉर्थ फर्स्ट इंडियन जनरल इलेक्शन में चुनाव लड़ने का फैसला किया, लेकिन कांग्रेस की नीतियो के कारण बाबा साहब को हार का सामना करना पड़ा था। 1954 में बाबा साहब ने फिर कोशिश की भंडारा से उपचुनाव में फिर से लोकसभा में जाने की लेकिन वहां भी कांग्रेस ने उन्हें मात दे दी थी। इस दौरान बाबा साहब दिल्ली के 22 पृथ्वीराज रोड और 1 हार्डिंग एवेन्यू जैसे आधिकारिक आवासों में रहे थे, जो कि उन्हें सरकार की तरफ से दिया गया था लेकिन 1951 में संसद से इस्तीफा देने के बाद वो 26 अलीपुर रोड में एक किराये के मकान में रहने के लिए अपनी पत्नी सावित्री बाई अंबेडकर के साथ शिफ्ट हो गए थे।
बुद्ध एंड हिज धम्म किताब
बाबा साहब 1951 से लेकर 1956 तक इसी घर में रहे थे, जहां वो अपनी पत्नी और अपने नौकर रत्तू के साथ रहते थे। यहीं रहते हुए बाबा साहब ने बौद्ध धर्म का गहन अध्ययन किया था, और बुद्ध एंड हिज धम्म किताब भी लिखी थी। बाबा साहब इस दौरान अलग अलग स्थानो की यात्रा पर भी गए थे। उन्होंने अपनी मृत्यु से कुछ वक्त पहले बौद्ध धर्म भी महाराष्ट्र के नागपुर में अपनाया था। लेकिन अपनी मृत्यु के वक्त वो दिल्ली के निवास स्थान में ही थे। जहां 6 दिसंबर 1956 को बाबा साहब का निधन हो गया था। हालांकि निधन के बाद उनके शरीर को मुम्बई ले जाया गया था, जहां 7 दिसंबर को उनके बेटे यशवंत राव ने बौद्ध रीति रिवाजो से मुखाग्नि देकर उनका महापरिनिर्वाण पूरा किया था।
आज अलीपुर में बाबा साहब के घर को एक संग्रहालय में तब्दील कर दिया है, जो कि बिल्कुल संविधान के पन्नो के समान बनाया गया है। जिसे डॉ अंबेडकर राष्ट्रीय स्मारक के रूप में जाना जाता है। यहां बाबा साहब से जुड़े दिल्ली यात्रा के साथ साथ उनके जीवन के कई अहम पहलुओं को संग्रहित किया गया है। दिल्ली को बाबा साहब की कर्मभूमि कहा जाये तो गलत नहीं होगा। जहां बाबा साहब के जीवन के करीब एक दशक बीते थे। बाबा साहब की दिल्ली यात्रा की कहानी आपको कैसी लगी हमे कमेंट करके जरूर बतायें।


