अभी कुछ समय पहले बाबा साहब के स्मारक के नाम पर भ्रष्टाचार करने का एक मामला काफी उछला था, लेकिन ऐसा लगता है कि बाबा साहब का नाम लेकर विवाद करना अब लोगो की आदतो में शामिल हो गया है। जी हां, हम ऐसा क्यों कह रहे है.. इसका जवाब इस लेख में आपको मिलेगा.. आखिर क्यों जिन बाबा साहब ने सम्मान के लिए पूरे जीवन संघर्ष किया, आज उनसे जुड़े स्मारक को भी सम्मान के लिए सघर्ष करना पड़ रहा है। क्या है पूरा मामला, जानेंगे ..दरअसल बाबा साहब की जन्मभूमि महू में डॉ. भीमराव अंबेडकर के निवास संथान को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया था, और उसके जीर्णोधार के लिए सरकार प्रयासरत है, लेकिन इसी बीच ये बड़े विवाद को लेकर चर्चा में है।
बाबासाहेब अंबेडकर मेमोरियल सोसायटी
दरअस डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर मेमोरियल सोसायटी पर कथित तौर पर serious financial irregularities, और सत्ता हथियाने के संगीन आरोप लगे है। जिससे इसकी ऐतिहासिक और अंतरराष्ट्रीय महत्व की गरिमा पर सवाल खड़े हो हैं। हुआ कुछ यूं है कि सोसाईटी में शामिल किये गए कुल 23 सदस्यों में से अध्यक्ष पद के लिए अल्पमत रहे राजेश वानखेड़े, उनके मामा अरुण कुमार इंगले और कार्यकारी अध्यक्ष पद के दावेदार साहित्यकार अनिल गजभिए ने आपराधिक षड्यंत्र रचकर सोसायटी पर कब्जा करने की कोशिश की। जिसके लिए इन तीनों ने नकली बहुमत दिखाने के लिए अपने भाई, भतीजों, रिश्तेदारों और पद व प्रतिष्ठा के लालची लोगों को फर्जी तरीके से सदस्य बना दिया था।
ताला तोड़ कर चोरी का आरोप
शिकायतकर्ता सदस्यों ने एक और खुलासा करते हुए कहा कि तीनों आरोपियो सदस्यों ने रात के अंधेरे में राष्ट्रीय स्मारक के ताले तोड़े, वैध सदस्यों को जान से मारने की धमकियां दी और सोसायटी की संपत्ति पर अवैध कब्जा किया गया। बेगुनाह सदस्यों के खिलाफ शिकायतों के पीछे जिन लोगों की भूमिका बताई जा रही है, उनमें नगर निगम का एक मस्टरकर्मी सुभाष रायपुरे प्रमुख है। दूसरा नाम रवि वानखेड़े का सामने आता है, जो नगर निगम के बिल्डिंग परमिशन विभाग में मस्टरकर्मी है और राजेश वानखेड़े का सगा भाई बताया जा रहा है। मामले में तीसरा अहम नाम विनोद मेघवाल का है, जिसे आईटी एक्सपर्ट बताया जा रहा है।
वह मध्यप्रदेश शासन के उपक्रम इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन में सर्वेयर के पद पर कार्यरत है। आरोप है कि वह समिति के दस्तावेजों और कंप्यूटर से जुड़ी जालसाजी में माहिर है और फर्जी कागजात तैयार करने में उसकी अहम भूमिका रही है। वहीं इस मामले में इंदौर के सहायक पंजीयक पर भी गंभीर आरोप लगाये गए कि उन्होंने राजनीतिक दबाव में आकर जानबूझकर अनदेखी करते हुए नियमों के मुताबिक कार्रवाई नहीं की था। जिसके कारण पीड़ित और वैध सदस्यों को जेल तक जाना पड़ा। गौरतलब है कि इसी सहायक पंजीयक बी.डी. कुबेर को लोकायुक्त पुलिस ग्वालियर ने 20 हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगेहाथ पकड़ा था। बावजूद इसके सोसायटी विवाद में समय रहते उचित कार्रवाई नहीं की गई, जिससे मामला और उलझता चला गया।
पहले भी भ्रष्टाचार का लगा आरोप
दरअअसल इस मेमोरियल के बनने को लेकर पहले भी भ्रष्टाचार किये जाने का खुलासा हुआ था, जिसमें सचिव राजेश वानखेड़े का ही नाम सामने आया था, जिन्होंने पैसा तो ऑस्ट्रेलियन मार्बल लगाने का ही लिया था, लेकिन लगवाया कोई लोकल मार्बल। ये मुद्दा भी काफी उछला, ऐसे में एक और मुद्दा सामने आना इशारा तो यहीं कर रहा है कि जो भी आरोप लगाये गए है उनमें कुछ तो सच्चाई है।
मजबूरी में हाईकोर्ट की शरण
जब दो-तिहाई बहुमत रखने वाले वैध सदस्यों की शिकायतों पर कोई सुनवाई नहीं हुई, तो आखिरकार उन्हें हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। याचिका में न सिर्फ असंवैधानिक तरीके से समिति गठन का मुद्दा उठाया गया, बल्कि गंभीर वित्तीय अनियमितताओं, फर्जी सदस्यता और दस्तावेजों में हेराफेरी की जांच की मांग भी की गई। हाईकोर्ट ने पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए 3 नवंबर 2025 को आदेश जारी करते हुए उद्योग विभाग के प्रमुख सचिव, भोपाल और पंजीयक फर्म्स एवं सोसायटीज, भोपाल को निर्देश दिए कि वे सोसायटी के विधान के नियम 21 और मध्यप्रदेश सोसायटी अधिनियम की धारा 32 के तहत जल्द और निर्णायक कार्रवाई करें।
यह सब उस स्मारक के साथ हुआ, जिसे देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में बाबासाहेब के अनुयायी सम्मान की नजर से देखते हैं। हाईकोर्ट के आदेश के बाद पंजीयक कार्यालय भोपाल में 12 दिसंबर को पहली आधिकारिक सुनवाई तय की गई थी। लेकिन ये सुनवाई आगे के लिए टाल दी गई।
अंबेडकर जयंती और राजनीतिक-आर्थिक फायदा?
शिकायतकर्ताओं का यह भी कहना है कि आगामी 14 अप्रैल को होने वाली अंबेडकर जयंती के आयोजन से राजनीतिक और आर्थिक फायदा उठाने के मकसद से भी यह पूरा खेल खेला गया। जो सदस्य अन्याय के खिलाफ आवाज उठा रहे थे, उन्हें दबाने और बदनाम करने की कोशिशें लगातार की जा रही हैं। ताकि स्मारक पर एकतऱफा एकाधिकार किया जा सकें, जिसकी आड़ में बड़े भ्रष्टाचार को अंजाम दिया जा सकें। इस मुद्दे पर अध्यक्ष पद के लिए होने वाले विवाद को लेकर कोर्ट ने फिलहाल दोनो पक्षों की बातों पर अमल करना शुरु कर दिया और जांच के आदेश दिये है। जांच के बाद ही मामले की आगे की सुनवाई की जायेगी।



