Babasaheb Ambedkar in Maharashtra: बाबा साहब डॉ भीम राव अम्बेडकर को आज समाज कई नामों से बुलाता है। दलितों के मसीहा, संविधान निर्माता, देश के पहले कानून मंत्री, बौद्ध धर्म को नया आयाम देने वाले जैसे कई नाम उनके साथ जुड़े हुए हैं, मगर यह नाम उन्हें सालों के संघर्ष के बाद मिले हैं। वह संघर्ष जो महाराष्ट्र के छोटे से उनके पैतृक गांव से शुरू हुआ था।
मध्य प्रदेश के मऊ में जन्मे बाबा साहब 2 साल की उम्र में ही महाराष्ट्र चले गए थे लेकिन तब उन्हें यह अंदाजा नहीं था की अपने ही गांव में उन्हें भारी जातिवाद और भेदभाव का सामना करना पड़ेगा। महाराष्ट्र में उनके जीवन के काफी दिन गुजरे हैं, उनके बचपन से लेकर जवानी तक का सफर और प्राइमरी स्कूल से लेकर ग्रेजुएशन तक का सफर महाराष्ट्र में ही पूरा हुआ। अपने इस वीडियो में हम बाबा साहब के जिंदगी में महाराष्ट्र राज्य का क्या योगदान रहा, और कैसे महाराष्ट्र की गालियां गवाह है बाबा साहब के बचपन से लेकर जवान होने तक उनके किए गए संहार का। उनके उसके बारे में चर्चा करेंगे।
बाबा साहब की महाराष्ट्र यात्रा
बाबा साहब के पिता रामजी मालोजी सकपाल ब्रिटिश आर्मी में ऑफिसर थे और सूबेदार रैंक के अधिकारी थे, और जब वो महू में पोस्ट थे तब बाबा साहब का जन्म हुआ था, जो कि उनकी चौहदवी संतान थे। बाबा साहब का पैतृक गांव महाराष्ट्र के रत्नागिरी ज़िले के अंबाडावे मंदांगद तालुका में पड़ता था, और वो महाठी पृष्ठभूमि से थे। पिता भले ही सूबेदार थे लेकिन उनकी शूद्र जाति का प्रभाव उनके ओहदे पर भारी रहा। जब बाबा साहब दो साल के हुए तो उनके पिता पूरे परिवार समेत 1894 में वापिस सतारा लौट आये।
जब तक स्कूल नहीं गए थे, तब तक जातिगत भेदभाव का आभास नहीं हुआ..परिवार ने बड़े प्यार से पाला, लेकिन असली संघर्ष तो तब शुरु हुआ जब वो स्कूल में दाखिला लेने गए..जातिगत भेदभाव मानवता के बढ़ कर है ये उन्हें पहली बार पता चला। बाकि बच्चो से अलग बिठाया जाता, पूरे पूरे दिन प्यासे रह जाते थे, बचपन के संघर्ष ने आग में सोना तपाने जैसा काम किया। संघर्ष को जीवन मान कर आगे बढ़ते रहे। स्कूलिंग की, और फिर गांव से निकल कर पहली बार मुम्बई आकर पढ़ने का मौका मिला। वहां हाइस्कूल में वो पहले अछूत थे जिन्होंने दाखिला लिया था, वो मेधावी छात्र थे, तो जातिगत भेदभाव के बाद भी स्कूल में उन्हें पसंद करने वालों की कमी नहीं थी।
बड़ौदा स्टेट गवर्नमेंट में नौकरी तो मिली
1907 में मैट्रिक करने के बाद उन्हें एलफिंस्टन कॉलेज में एडमिशन लिया था, हाई स्कूल पास करने के बाद उन्हें बॉम्बे यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स और पॉलिटिकल साइंस ग्रेजुएशन करने का मौका मिला था। पढ़ाई करने के बाद उन्हें बड़ौदा स्टेट गवर्नमेंट में नौकरी तो मिली लेकिन वहां भी जातिवादी मानसिकता ने उन्हें काफी आहात किया, वहीं पिता की आकस्मिक मौत ने उन्हें काफी धक्का पहुंचाया था। लेकिन किसी तरह से वो आगे की पढ़ाई के अमेरिका चले गए, लेकिन अमेरिका के आजाद परिवेश में रहने वाले बाबा साहब जब वापिस भारत लौटे तो उन्हें फिर से सब कुछ झेलना पड़ा।
सबसे प्रचलित महार आंदोलन
महाराष्ट्र असल में बाबा साहब के लिए एक ऐसी भूमि कही जा सकती है जो शायद उनकी कर्म भूमि कहलाई जा सकती थी, लेकिन उससे ज्यादा महाराष्ट्र में उनके झटके मिले। एक तरफ उन्होंने महाराष्ट्र में दलितो के लड़ाई का बिगुल बजाया था, तो वहीं दूसरी तरफ सवर्णों की दमनकारी नीतियों को भी सहना पड़ा। बाबा साहब अलग अलग जगहो पर सफर करते थे, लेकिन ज्यादातर समय वो महाराष्ट्र मुम्बई में बिताते थे। यहीं उनकी सभी संताने हुई, और उन्होंने एक एक करके अपने अपनो को खोया भी। उनके सबसे प्रचलित आंदोलन महार आंदोलन भी महाराष्ट्र में ही हुआ..जिसने उन्हें सहीं मायने में दलितो के मसीहा के रूप में स्थापित कर दिया था।
महाराष्ट्र में बाबा साहब का एक्सपीरियंस
ये वहीं भूमि है, जहां बाबा साहब के एक इशारे पर लाखों दलित उनके साथ बौद्ध धर्म अपनाने को राजी हो गए और धर्म परिवर्तन करके बौद्ध बन गए। हालांकि राजनीति में महाराष्ट्र में बाबा साहब का एक्सपीरियंस बेहद खराब रहा। ऐसा लगता है कि महाराष्ट्र की जनता ने बाबा साहब की राजनीति को स्वीकार ही नही किया था। वो एक बार नहीं दो बार ही मुम्बई से चुनाव में खड़े हुए थे, लेकिन दोनो ही बार उन्हें बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा था। नतीजा उन्होंने राजनीति को छोड़ कर अपने दिल्ली आवास में शांति से रहने का फैसला किया था। यानि की हम कुल मिलाकर ये कह सकते है कि महाराष्ट्र ने बाबा साहब को बहुत कुछ दिया है।
अंबेडकर संग्रहालय और बौद्ध स्थल
लेकिन उससे कई ज्यादा छीना भी है। बाबा साहब ने अपने जीवन के अंतिम समय में अपनी दूसरी पत्नी सविता अंबेडकर के साथ महाराष्ट्र या पैतृक गांव में रहने के बजाय दिल्ली में रहना चुना था। क्योंकि वो ही उन्हें सुकून देता था, जबकि उनके इकलौते बेटे यशवंत राव महाराष्ट्र में रहते थे। हालांकि मृत्यु के पश्चात बाबा साहब का अंतिम संस्कार मुम्बई के चैत्य भूमि पर उनके बेटे ने ही किया था। जो आज के समय में एक प्रमुख अंबेडकर संग्रहालय और बौद्ध स्थल है। ये कहानी बताती है कि बाबा साहब को शायद सुकून महाराष्ट्र में नहीं बल्कि दिल्ली की भूमि पर मिलता था.. आपकी क्या राय है इस पर हमें कमेंट करके जरूर बतायें।



