National flag: क्या आप ये जानते है कि भारत के राष्ट्रीय ध्वज को पहली बार किसने तैयार किया था- तो इसका जवाब है स्वतंत्रता सेनानी पिंगली वेंकैया ने, जिन्होंने साल 1921 में तीन रंगो का झंड़ा तैयार किया और उसके सफेद पट्टी में चरखा अंकित करके राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को दिया था, इस झंडे को उस वक्त सभी ने भारत के झंडे के रूप में अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ इस्तेमाल किया था।
जो कि आजादी के बाद तक भी यहीं था लेकिन मौजूदा वक्त में आपको हमारे तिरंगे में चरखा नहीं बल्कि अशोक चक्र नजर आता है, जो कि नेवी ब्लू कलर का है, जिसमें 24 तिलियां है। अब सवाल ये है कि चरखें के बजाये अशोक चक्र क्यों लिया गया और किसने अशोक चक्र को तिरंगे का अहम अंग बनाया ..तो इसका जवाब है भारत रत्न बाबा साहब अंबेडकर ने.. जी हां, ये बाबा साहब का ही योगदान है कि आज तिरंगे में चरखा नहीं बल्कि अशोक चक्र नजर आता है। अपने इस वीडियो में हम जानेंगे कि कैसे बाबा साहब ने तिरंगे में अशोक चक्र लगवाया और इसका क्या अर्थ है।
अशोक चक्र की कहानी
अशोक चक्र असल में उत्तर प्रदेश के सारनाथ में स्थित सिंह चतुर्भुज स्तंभ पर अंकित शिलालेख में मौजूद है। जो कि महान चक्रवर्ती सम्राट अशोक से प्रेरित है, ये चक्र अशोक स्तंभ का ही हिस्सा है, इसलिए इसे अशोक चक्र कहा गया। इस चक्र में 24 तिलियां है, जो कि दिन के 24 घंटों और मानवों के 24 गुणों को दर्शाती है। अशोक चक्र को ‘धर्म चक्र’ या ‘विधि का चक्र’ भी कहते हैं, जो कि गति, धर्म और निरंतर प्रगति का प्रतीक है।
क्यों शामिल हुआ भारतीय झंडे में
अशोक चक्र को चरखे के स्थान पर तिरंगे के सफेद पट्टी में शामिल करने का सुझाव असल में बाबा साहब अंबेडकर ने ही दिया था। बाबा साहब का मानना था कि अशोक चक्र निरंतर गतिशीलता दर्शाने के साथ साथ ये चक्र बौद्ध धर्म को मानने वालों के लिए धम्म चक्र भी है, जो मूल रूप से बौद्ध धर्म संस्कृति का हिस्सा है, ये चक्र स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के सिद्धांतों का भी प्रतीक है। जो कि असल में ब्राह्मणवादी संस्कृति से कई रूपों में बेहतर और श्रेष्ठतम है। वहीं चरखा एक ही जगह पर रखा जाता है जिससे भारत की गतिशीलता पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
अशोक चक्र को तिरंगे झंडे का हिस्सा बनाने की इजाजत
जब संविधान सभा के कई सदस्यों ने बाबा साहब के इन विचारो को सुना तो उन्हें बाबा साहब की बात सही लगी। भारत एक विकासशील देश है और इसका प्रतीक भी ऐसा होना चाहिए तो निरंतर चलते रहने, आगे बढ़ते रहने और गतिशील रहने को दर्शाता हो, जिससे लोगो को प्रेरणा मिले आगे बढ़ने की.. तमाम बहस के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को भी ये सुझाव अच्छा लगा और उन्होंने अशोक चक्र को तिरंगे झंडे का हिस्सा बनाने की इजाजत दे दी थी। इसके बाद 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने तिरंगे में अशोक चक्र को शामिल करके राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया।
भारत की धर्म निरपेक्षता सरूप तिरंगा
जब हम तिरंगे का स्वरूप देखते है तो पायेंगे कि तिरंगा असल में भारत की धर्म निरपेक्षता के साथ साथ इसके निरंतर विकास का प्रतीक है। इसमें मौजूद केसरिया पट्टी शक्ति और साहस देने वाला है, तो वहीं सफेद रंग की पट्टी शांति और सत्य को दर्शाता है, हरे रंग की पट्टी की बात करें तो ये उर्वरता और विकास, वृद्धि का प्रतीक है, हरियाली और कृषि प्रधान भारत का प्रतीक है। वहीं अशोक चक्र न केवल बौद्ध धर्म के लिए अहम है, बल्कि वो हर एक भारतीय को ये बताने के लिए लगाया गया है कि चक्र की तरह निरंतर चलते रहना, सदैव गतिशील रहना ही जीवन है अगर आप रूक गए तो समझिये की आपने मृत्यु को प्राप्त कर लिया है।
दूरगामी सोच ने सभी को प्रभावित किया
बाबा साहब ने बौद्ध धर्म काफी वक्त के बाद अपनाया था, लेकिन अशोक चक्र को लेकर उनकी दूरगामी सोच ने सभी को प्रभावित किया था। जो सदैव आगे बढ़ने, और तरक्की करने के रास्ते पर चलने का संदेश देते है। बौद्ध धर्म स जुड़े कई पहलुओं को उन्होंने धर्म परिवर्तन से पहले ही अपने जीवन में उतारा था। जिसमें व्यक्ति के नैतिक विकास के लिए जरूरी 24 गुण भी थे। हालांकि बौद्ध धर्म उन्होंने 1956 में अपनाया था। बाबा साहब का योगदान केवल संविधान तैयार करने में ही नहीं बल्कि देश को एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय ध्वज देने में भी अहम रहा है। देश के विकास में बाबा साहब का योगदान अविस्मरणीय है।



