Ambedkar & Pandit Jawaharlal Nehru: आपने हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था के बारे में कई बार सुना होगा… बाबा साहब अंबेडकर हिंदू धर्म में मौजूद वर्ण व्यवस्था को ही जातपात का कारण मानते थे, और जातिगत भेदभाव का सबसे बड़ा कारण ही वर्ण व्यवस्था रही है.. और यहीं कारण था कि ब्राह्मणवादी समाज ने तय कर दिया था कि शूद्रो और पिछड़ों को न तो शिक्षा दी जायेगी, और न ही कभी धर्म शास्त्रों का ज्ञान दिया जायेगा, वो सदैव केवल सेवा करेंगे, और उनका जन्म सेवा के लिए ही होता है।
अंबेडकर और प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू
लेकिन दलित समाज के लिए लड़ने वाले ज्योतिबा राव फूले और सावित्री बाई फूले ने ब्राह्मणी सोच के मुंह पर करारा तमाचा जड़ा और खुद के साथ साथ बहुजन, पिछड़े और दलितो को भी शिक्षित करने का काम किया। उन्होंने बताया कि शिक्षा किसी की बपौती संपत्ति नहीं है कि केवल ब्राह्मणों को ही मिले… हालांकि सालो तक शिक्षा और सामाजिक बराबरी की लड़ाई जारी रही और आज भी जारी है।
लेकिन बड़े बड़े विद्वानों को टक्कर देने वाले तो अकेले बाबा साहब अंबेडकर ही है.. बाबा साहब के ज्ञान को देखते हुए बीजेपी के वरिष्ठ नेता और सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने बाबा साहब और पहले पीएम पंडित जवाहर लाल नेहरूको कंप्येर करते हुए नेहरू को नही बल्कि अंबेडकर को ब्राह्मण कहा था…लेकिन सवाल ये है कि आखिर नेहरू और अंबेडकर के बीच कंपेयर क्यों किया गया है।
शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन
जब हम देश के दो बड़े विद्वानों बाबा साहब अंबेडकर और देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के बारे में बात करते है तो अक्सर ये देखा जाता है कि नेहरू की दोहरी नीति के कारण बाबा साहब को राजनीति छोड़नी पड़ी, यहां तक कि कानून मंत्री के पद से भी उन्होंने गुस्से में इस्तीफा दे दिया था। कहा तो ये भी जाता है कि नेहरू कभी नहीं चाहते थे कि बाबा साहब संविधान सभा का हिस्सा बने,,लेकिन महात्मा गांधी के जिद के कारण उन्हें संविधान सभा का हिस्सा बनाया गया था।
वहीं नेहरू को लेकर ये भी कहा जाता है कि जब बाबा साहब ने 27 सितंबर 1951 को कांग्रेस से आपसी मतभेद के कारण इस्तीफा दे दिया था तब उन्होंने 1951-52 में होने वाले पहले लोकसभा चुनाव में शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन के तहत चुनाव लड़ने का फैसला किया था।
नेहरू के कारण बाबा साहब को हार मिली
लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने बड़ी चाल चली और उन्हीं के पीए नारायण एस काजरोलकर को मैदान में उतार दिया था, जो कि खुद पिछड़ी जाति से थे, हैरानी की बात है कि नारायण काजरोलकर दूध का कारोबारी थे और राजनीति से बिल्कुल दूर रहते थे, लेकिन अंबेडकर को कमजोर करने के लिए कांग्रेस और पंडित नेहरू ने एड़ी चोटी का जोर लगाया, वहीं पहले प्रधानमंत्री होने के नाते देश में उनकी लहर भी काफी मजबूत थी, नतीजा नेहरू के खुद चुनावी मैदान में आने के कारण नारायाण काजरोलकर पर भी जनता का भरोसा जगा, और बाबा साहब को करारी हार का सामना करना पड़ा। नेहरू के कारण बाबा साहब को हार मिली थी, जो वाकई में बाबा साहब का बड़ा अपमान था। जबकि सच्चाई तो ये ही है कि बाबा साहब के आगे नेहरू कहीं भी नहीं ठहरते थे।
क्यों कहा सुब्रमण्यम स्वामी ने बाबा साहब को असली ब्राह्मण
दरअसल सुब्रमणयम स्वामी ने एक बार एक इंटरव्यू में कहा था कि उनकी नजरों में असली ब्राहमण तो बाबा साहब, नेहरू नही..स्वामी के ऐसा कहने के पीछे ब्राह्मणवादी सोच ही रही है..क्योंकि हम सभी जानते है कि एक शूद्र जाति से होने के कारण बाबा साहब को हर कदम पर, चाहे शिक्षा हो या नौकरी हर जगह जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी, जिस शिक्षा पर ब्राह्मण अपना अधिकार समझते थे।
उसे बाबा साहब ने तमाम संघर्षों से हासिल किया। उन्होंने हर कठिनाइयों का सामना करने के बाद भी खुद को शिक्षित किया, वो अमेरिका और ब्रिटेन गए थे उच्च शिक्षा के लिए। बाबा साहब ने अपने पूरे जीवन में करीब 32 डिग्रियां हासिल की थी, तो वहीं जब आप पंडित नेहरू की बात करते है तो वो एक ब्राह्मण परिवार में जन्में थे, न तो उन्हें कभी जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा था और न ही वो कभी अभावो में जिये थे।
लंदन इनर टेम्पल से कानून की पढ़ाई
नेहरू 1907 में ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज गए और 1910 में नेचुरल साइंस में ऑनर्स डिग्री के साथ ग्रेजुएट हुए। 1910 में ग्रेजुएशन के बाद लंदन इनर टेम्पल से कानून की पढ़ाई की, और भारत लौट कर वकालत शुरु कर दी। उनके पिता मोतीलाल नेहरूप खुद ब्रिटिश भारत के सबसे अमीर बैरिस्टरों में से एक थे, जिनकी मासिक आय 10,000 रुपये से ज़्यादा थी, तो अभाव क्या होता है, कमी क्या होती है, उन्हें तो कभी पता ही नही चला था। देश को आजाद कराने के लिए लड़ने वाली लड़ाई का हिस्सा बन गए, महात्मा गांधी के साथ होने के कारण ज्यादा प्रचलित हो गये, तो सबके फेवरेट नेता बन गए।
जबकि बाबा साहब ताउम्र पिछड़ो और दलितों के उत्थान के लिए लड़ते रहे थे, उन्होंने कोई स्वतंत्रता के आंदोलन में बढ़ चढ़ भागीदारी नहीं दी थी… जिसका फायदा ही पंडित नेहरू को हुआ.. जबकि अगर हम शिक्षा के आधार पर ब्राह्मण चुने तो उस मामले में तो बाबा साहब नेहरू से की आगे थे, उनकी शिक्षा और ज्ञान के टक्कर में तो नेहरू दूर दूर तक नहीं थे, फिर वाकई में असली ब्राह्मण कौन हुआ, नेहरू या अंबेडकर… आप सुब्रमणयम स्वामी की बातों से कितने सहमत है।



