Buddhism: ईसाई और इस्लाम के बीच बुद्ध का मार्ग, आखिर क्यों दलितों को बौद्ध धर्म से ही जोड़कर देखा जाता है?

Buddhism, Ambedkar and Dalits
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भारत एक ऐसा देश है जहां हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था और जातिगत भेदभाव की जड़ों को लेकर ब्राह्मणवादी नितियों को जिम्मेदार माना जाता है..और ये आरोप तब और मजबूत हो जाते है जब दलितों जाति से आने वाले कई महान समाज सुधारक, जिनमें ज्योतिबा राव फूले और बाबा साहब डॉक्टर भीम राव अंबेडकर जैसे लोग भी इन आरोपो को सही करार देते है। दलितों और पिछड़ो के साथ बेदभाव सदियों के चली आ रही है, जिसके लिए हिंदू समाज के वर्ण व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराया गया।

पहले इस्लामिक शक्तियों, फिर इसाई मिशनरियों ने सबसे ज्यादा टारगेट इन्ही दलितो को धर्म परिवर्तन करने के लिए टारगेट किया…लेकिन बावजूद इसके आज के समय में ज्यादातर दलितों को बौद्ध धर्म से जोड़ कर देखा जाता है। जबकि हमारे देश में बौद्ध धर्म को मानने वालो की संख्या मात्र 0.4 प्रतिशत ही है। तो ऐसा क्या है कारण जिसके कारण बौद्ध धर्म और दलित आपस में जुड़े हुए है प्रतीक होते है। अपने इस वीडियो में हम इसी पर चर्चा करेंगे..साथ ही बाबा साहब के लिए उनके प्रेपर गौतम बुद्ध ने ऐसा क्या किया था जिसके कारण ही बाबा साहब बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए थे, इसके बारे में भी जानेंगे।

अंबेडकर का ‘महा-संकल्प’

दरअसल बौद्ध धर्म भारत में सातवी सदी में काफी मजबूत धर्म हुआ करता था, उसका प्रभाव पूरे भारत समेत एशिया में फैला था, लेकिन जैसे जैसे इस्लामिक ताकतो ने भारत पर कब्जा करना शुरू किया उसके बाद बौद्ध धर्म एकदम खत्म सा हो गया था। लेकिन उसके अस्तित्व को नुकसान पहुंचाने में ब्राह्मणों की चाल भी थी, इस बारे में हम पहले भीव कई बार चर्चा कर चुके है।

मगर रही सही कसर इस्लाम के भारत में बढ़ते प्रभाव के बाद पूरी हो गई धर्म भले ही प्रभाव में कम हो गया लेकिन उसके नियम, उनकी परंपरा और उसकी विचारधारा कभी नहीं बदली। जिसमें सभी को सम्मानित जीवन जीने की प्रेरणा दी जाती है, खासकर बाबा साहब ने जातित भेदभाव से तंग आकर धर्म परिवर्तन का फैसला लिया था तब उन्होंने इसाई, इस्लाम, पारसी, और सिख धर्म के बारे में गहन अध्ययन किया था।

दलित और बौद्ध धर्म का रिश्ता

जिसमें उन्हें पहली बार बौद्ध धर्म को काफी करीब से जानने का मौका मिला। उन्होंने कई देशों का यात्रा की, ताकि वो बौद्ध धर्म को और ज्यादा बेहतर तरीके से जान सकें, जिसके बाद उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाने का फैसला किया था, लेकिन तब उन्हें भी ये अंदाजा नहीं था, कि धर्म परिवर्वन का उनकी नीजि फैसला कई लाख दलितों की जिंदगी में बड़ा बदलाव लाने वाला था। जिस दिन बाबा साहब ने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली, उनके साथ साथ नागपुर के उस मैदान में करीब 5 लाख लोग और थे जो कि दलित पिछड़ी शूद्र जाति से थे, उन लोगो ने बाबा साहब के राहे कदम पर चलते हुए बौद्ध धर्म को ही अपना धर्म बना लिया था।

अपनी स्वेच्छा से धर्म का परिवर्तन करने के मामले में ये अब तक के इतिहास में पहली घटना थी जब इतनी तादाद में लोगो ने धर्म परिवर्तन कर लिया था। ये सभी बौद्ध अनुयायी बन गए थे, जो कि जातिगत भेदभाव, असमानता, छुआछूत की बेड़ियो से मुक्त हो गये थे…ये इतिहास के पन्नो में दर्ज हो गया।  आज के समय में भी दलित इस्लाम और इसाई धर्म अपना रहे है, लेकिन एक साथ लाखो लोगो का बौद्ध धर्म अपनाना सबसे यादगार और ऐतिहासिक पल था, शायद यहीं कारण है कि दलितों को बौदिध धर्म से जोड़ कर ही देखा जाता है।

बुद्ध का वो कदम, जिसके कारण बाबा साहब हुए प्रभावित

बाबा साहब ने बौदिध धर्म अपनाने का फैसला कोई रातो रात नहीं लिया था, बल्कि केवल बौद्ध धर्म अपनाने के लिए उन्होंने कई सालों तक गहन अध्ययन किया। उन्होंने बौदिध धर्म और गौतम बुद्ध पर किताब बुद्ध एंड हिज धम्म भी लिखी थी। वो श्रीलंका, कंबोडिया जैसे देशों की यात्रा पर भी गए थे। अपने अध्ययन में उन्हें बुद्ध को जानने का मौका मिला, बुद्ध के बताये ज्ञान की बातों में बहुत कुछ ऐसा था जिससे बाबा साहब प्रभावित थे लेकिन सबसे ज्यादा बुद्धिमत्ता, दया, और समानता की भावना से प्रभावित थे।

जातिगत भेदभाव से मुक्त समाज की अवधारणा

बुद्ध ने हमेशा व्यक्ति को अंध विश्वास के जाल से निकल कर तार्किक आधार पर विश्लेषण करने की सीख थी। ब्राह्मणों की विचारधारा को फॉलो करने के बजाये अपमने विवेक से काम लेकर स्वतंत्रता, बंधुत्व, और सामाजिक न्याय को महत्व दिया, जो कि जातिगत भेदभाव से मुक्त समाज की अवधारणा पर चलते थे। बुद्ध की मानना था कि कमजोर तबका, जिसमें महिलाएं और शूद्र शामिल थे, उन्हें समाज मं बराबरी का अधिकार मिलना चाहिए, क्योंकि ईश्वर की नजरों में वो केवल उनकी संतान है। हमें बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय के बारे में सोचना चाहिए। तर्क करके सही और गलत तय करना आवश्यक है। उन्होंने पशु बलि और हिंसा पर रोक लगा दी थी, जिससे हत्यायें कम हो गई।

बौद्ध धर्म असल में व्यक्ति को ईश्वर के समीप लाता है, इसमें व्यक्ति का मूल स्वाभाव निकल कर सामने आ जाता है। दलित पिछड़े शूद्र हमेशा समाज में बराबरी के लिए, सम्माम का जीवन जीने के लिए ही तो लड़ते आये है, ऐसे में बौद्ध धर्म उन्हें वो बराबरी देता है जिससे दलितो का आकर्षण बौद्ध धर्म के प्रती बढ़ा था… मौजूदा समय में दलितों और बौद्ध धर्म का कनेक्शन बाबा साहब अंबेडकर के ही कारण ज्यादा मजबूत हुआ था, और आने वाले अनेकों सालों तक उनसे ही जुड़ा रहेगा।

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