जब बाबा साहब ने धर्म बदलने का विचार किया तब उन्होंने सालो तक दुनिया के अलग अलग धर्मों का गहन अध्ययन किया था.. वो चाहते थे कि वो एक ऐसा धर्म अपनाये, जो वाकी में वास्तविक न्याय पर बेस्ड हो, जो जातिवाद भेदवाद, और धार्मिक प्रपंच से दूर हो… हालांकि वो अमेरिका और लंदन में भी रहे थे और वहां उन्होंने ईसाइयो के बीच जातिगत भेदभाव से दूर आजादी के महत्व को समझा था लेकन बावजूद इसके उन्होंने ईसाई धर्म नहीं अपनाया…इतना ही नही साल 1956 में, अपनी मृत्यु से महज दो महीने पहले, बाबा साहब ने बौद्ध धर्म अपना लिया। आंबेडकर से दलित समाज का जुड़ाव इतना गहरा था कि उनके बौद्ध धर्म अपनाते ही करीब पांच लाख अनुयायियों ने भी वही राह चुनी।
बहुत कम लोग जानते हैं कि बौद्ध धर्म अपनाने से पहले आंबेडकर ने ईसाई धर्म और बाइबिल को भी गंभीरता से पढ़ा, चर्च के नेताओं से संवाद किया और यहां तक कि कुछ मौकों पर ईसाई बनने पर भी विचार किया। लेकिन फिर भी, उन्होंने ईसाई धर्म को ठुकरा दिया और बौद्ध धर्म अपना लिया। लेकिन यह फैसला अचानक नहीं लिया गया था। इसके पीछे सालो का वैचारिक संघर्ष, धार्मिक अध्ययन और समाज की हकीकत को समझने की लंबी प्रक्रिया भी शामिल थी। जानते है कि मसीह से लगाव के बाद भी भी उन्होंने बुद्ध को क्यों चुना।
बुद्ध और मसीह, दोनों से प्रभावित थे आंबेडकर
साल 1938 की बात है, बाबा साहब एक ईसाई सभा को संबोधित कर रहे थे..जिसमें स्वीकार किया था कि उनके जीवन में “दो महान व्यक्तित्वों ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला है भगवान बुद्ध और यीशु मसीह।” उन्होंने कहा कि वो एक धर्म चाहते है जिसमें समानता, भाईचारा और स्वतंत्रता की शिक्षा दी जाती हो।। बाबा साहब की ये बात इशारा थी कि कि वे धर्म को केवल आस्था से नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव के हथियार की तरह देखते थे।
बाबा साहब के एक करीबी मित्र, जो की मेथोडिस्ट चर्च के बिशप बने थे, उनके मुताबिक आंबेडकर ने दो बार उनसे बपतिस्मा लेने की इच्छा जताई थी। बाबा साहब जब दिल्ली में रहते थे, तब वे हमेशा एक एंग्लिकन चर्च में जाते थे और वहां के पादरी से उनकी गहरी दोस्ती थी, जो बाबा साहब की ईसाई धर्म के प्रति गहरी रूचि को दर्शाता था, और वो ईसाई धर्म की तरह गहन अध्ययन भी कर रहे थे।
चर्च से मोहभंग और बौद्ध धर्म की ओर झुकाव
जाति और छुआछूत के खिलाफ संघर्ष के दौरान एक बार बाबा साहब ने दलितों को ईसाई धर्म अपनाने की सलाह देने पर विचार किया था। हिंदू समाज से मुकाबला करने के लिए दलितों को बाहर से ताकत जुटानी होगी और वह किसी अन्य धार्मिक समुदाय में शामिल होकर ही संभव हो सकता था। लेकिन बाबा साहब ने जल्द महसूस किया कि भारत में ईसाई समाज भी जाति से पूरी तरह मुक्त नहीं है। दलित अगर ईसाई बन भी जाते, तो उनकी सामाजिक हैसियत में बहुत बड़ा फर्क नहीं पड़ता। उन्हें अब भी अछूत की नजर से देखा जाता। एक तरफ बाबा साहब यीशु मसीह के विचारों से प्रभावित तो थे लेकिन उन्हें ये भी समझ आ चुका था कि भारतीय चर्च दलितों की पीड़ा और जाति आधारित भेदभाव को लेकर आंखें मूंदे हुए है। जिस कारण वे ईसाई धर्म को दलित मुक्ति का रास्ता मानने से पीछे हट गए थे।
आंबेडकर बाइबिल के गंभीर विद्यार्थी थे, इसके बावजूद 1938 के एक भाषण में ईसाई मिशनरियों की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि मिशनरी दलितो को ईसाई बना देना ही उनका कर्तव्य मानते है, जबकि वे उसके राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों की चिंता नहीं करते। ईसाई बनने के बाद भी दलित वही भेदभाव झेलता है, जो पहले झेलता था। फर्क सिर्फ इतना होता है कि अब वह चर्च के भीतर भी अकेला पड़ जाता है। हालांकि ईसाई मिशनरी दलितो के ईसाई बनाने की कोशिश में तो लगे है लेकिन फिर भी दलित का बड़ा समुदाय बौद्द धर्म अपना रहा है। आंबेडकर की 132वीं जयंती पर, करीब 50 हजार दलितों और आदिवासी समुदाय के लोगों ने एक सामूहिक बौद्ध धर्म परिवर्तन समारोह में हिस्सा लिया था, जो केवल बाबा साहब के मजबूत प्रभाव के कारण ही हुआ।
ईसाई राजनीति से हमेशा रहे दूर
भारतीय ईसाई समुदाय ने खुद को राजनीति से अलग कर दलितों के साथ अन्नाय को होते देखना स्वीकार कर लिया। दलित, जो ज्यादातर अनपढ़ थे, बावजूद इसके राजनीति में सक्रिय होने चाहिए थे, और कुख दलितो ने ऐसा किया भी लेकिन ईसाई समुदाय ऐसा नहीं कर पाया। उनके अनुसार, इसका बड़ा कारण यह था कि शिक्षित और ऊंची जाति के ईसाई आगे आकर दलित ईसाइयों के लिए आंदोलन खड़ा नहीं कर पाए।
बौद्ध धर्म क्यों बना दलितों की पसंद?
बुद्ध ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा उस सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष में बिताया, जिसे उस समय चातुर्वर्ण कहा जाता था और जो आगे चलकर जाति व्यवस्था में बदल गई। बुद्ध ने जन्म के आधार पर ऊंच-नीच तय करने की सोच को सिरे से खारिज किया था। उनके उपदेशों का मूल संदेश यही था कि हर इंसान बराबर है और उसकी कीमत उसके कर्म और आचरण से तय होती है, न कि जाति से, और बुद्ध के इन्ही विचारो ने आंबेडकर को सबसे ज्यादा आकर्षित किया। बौद्ध धर्म में नैतिकता केंद्र में है, न कि ईश्वर की अवधारणा। जहां दूसरे धर्मों में भगवान सर्वोपरि है, वहीं बुद्ध ने इंसान को खुद सोचने, सवाल करने और अनुभव के आधार पर निर्णय लेने की आज़ादी दी है।
आंबेडकर ने बुद्ध की तुलना यीशु, मोहम्मद और कृष्ण से भी की थी। उन्होंने लिखा कि यीशु ने खुद को ईश्वर का पुत्र बताया, मोहम्मद ने अंतिम पैगंबर होने की बात कही और कृष्ण ने स्वयं को परमेश्वर घोषित किया। लेकिन बुद्ध एक साधारण इंसान थे, जिन्होंने साधारण इंसान की तरह जीकर समाज को नई दिशा दी।
‘बुद्ध और भविष्य का धर्म’ में छिपा आंबेडकर का विज़न
1950 में बाबा साहब ने एक निबंध “बुद्ध और भविष्य का धर्म” लिखा था.. जिसमें उन्होंने कहा था कि समाज को चलाने के लिए नैतिकता जरूरी है, धर्म को विज्ञान से टकराना नहीं चाहिए और उसे स्वतंत्रता, समानता व भाईचारे जैसे मूल्यों को मान्यता देनी चाहिए। उनके मुताबिक, कोई भी धर्म गरीबी को पवित्र या महान नहीं बना सकता। उनकी जानकारी में केवल बौद्ध धर्म ही इन सभी कसौटियों पर खरा उतरता है। बुद्ध का धर्म सामाजिक, बौद्धिक, आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता की बात करता है। बौद्ध धर्म में पुरुष और महिला के बीच भी समानता पर जोर दिया, जो उस दौर के लिहाज से बेहद आधुनिक सोच थी।
बौद्ध धर्म और सांस्कृतिक जड़ें
दलितों के लिए बौद्ध धर्म अपनाने का एक बड़ा कारण यह भी था कि यह भारत में ही जन्मा धर्म है। हिंदू धर्म छोड़ने के बावजूद वे अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ों से पूरी तरह कटे नहीं। इसके उलट, ईसाई धर्म को अक्सर विदेशी माना जाता रहा है, भले ही वह पहली सदी में भारत आ चुका हो।
हालांकि बौद्ध धर्म की राजनीतिक मौजूदगी ऐतिहासिक रूप से मजबूत नहीं रही, लेकिन आंबेडकर के नेतृत्व में उभरे नव-बौद्ध आंदोलन ने दलित अधिकारों की लड़ाई को नई ऊर्जा दी और उन्हें एक नई पहचान दी। जो दलित ईसाई धर्म अपनाने लगे उन्हें जातिगत आरक्षण जैसे संवैधानिक अधिकार नहीं मिल पाए और चर्च के भीतर जाति की दीवारें पूरी तरह टूटी भी नहीं। यानि की न सरकारी लाभ मिला और न ही धर्म बदल कर कुछ स्थिति सुधरी। यानि की बाबा साहब ने जो कहा था कि ईसाई बन कर भी भेदभाव से दूर नहीं होंगे…वो कहीं न कहीं सार्थक ही हो रही है।



