Top 5 Dalit news: जब तक देश में जातिवाद की राजनीति रहेगी, तब तक सबसे ज्यादा पीड़ित दलित और पिछड़े वर्ग ही रहेंगे, एक सरकार उनके लिए योजनायें लायेंगी, तो दूसरी सरकार उसमें कमिया बता कर उन्हें रद्द कर देगी.. ये सिलसिला चलता रही रहता है.. लेकिन इतना नुकसान तो केवल वंचित और गरीब तबका ही झेलता है। तो चलिए आपको इस लेख में पिछले 24 घंटे में दलितो के साथ होने वाली घटनाओं के बारे में बताते हैं, जो इस वक्त सोशल मीडिया पर काफी सुर्खियों में है।
राजस्थान के पूर्व सीएम ने किया बड़ा खुलासा
1, दलितों से जुड़ा पहला मामला राजस्थान से है, जहां दलितों और पिछड़ो को पुरानी सरकार में दी गई जमीनों को छीनने की बड़ी साजिश करने का ऐलान किया है राजस्थान के पूर्व सीएम ने… जी हां, राजस्थान ने पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने खुद ट्वीट कर मौजूदा भाजपा सरकार पर संगीन आरोप लगाते हुए कहा कि बीजेपी सरकार पुरानी कांग्रेस सरकार में पिछड़े वर्गों (OBC) और दलित समुदायों को छात्रावास बनाने के लिए दी जमीनों को रद्द करना केवल बीजेपी की दुर्भाग्यपूर्ण और संकुचित मानसिकता का परिचायक है।
कांग्रेस सरकार ने ये आवंटन इसलिए किया था कि गांव से आने वाले दलित और पिछड़े वर्ग के बच्चे भी छात्रावास में रह कर शिक्षा हासिल कर सकें, लेकिन बीजेपी की मानसिकता दलितों के खिलाफ है, सरकारें तो बदलती रहती हैं परन्तु सत्ता का अहंकार इतना नहीं होना चाहिए कि आप राजनीतिक द्वेष के चलते युवाओं के भविष्य और सामाजिक उत्थान के कार्यों पर ही प्रहार करने लगें।
उन्होंने वर्तमान सीएम से भी आग्रह किया कि आवंटित जमीन को फिर से बहाल कर सकें, ताकि वंचित पिछड़ों और दलितों को शिक्षा का अधिकार मिले, उन्हें आर्थिक तौर पर सफल होने का मौका मिला। वैसे ये की नई बात नहीं है, पुरानी सरकार के जाने से उनके दिये गए लाभ भी छीन लिए जाते है लेकिन सच्चाई तो ये है कि इससे सबसे ज्यादा नुकसान गरीब वंचित औप पिछड़े वर्ग को ही झेलना पड़ता है।
हर क्षेत्र के नीजिकरण के खिलाफ चंद्र शेखर आजाद
2, दलितों से जुड़ा अगला मामला भीम आर्मी चीफ चंद्र शेखर आजाद को लेकर है, उन्होंने अब ऐलान कर दिया है कि सरकार अगर बहुजन समाज के खिलाफ साजिश करते हुए हर क्षेत्र का नीजिकरण करके एससी एसटी ओबीसी आरक्षण को खत्म करने की चाल चल रही है तो वो भी सरकार के इस मंसूबे पर पानी फेर कर रहेंगे। उन्होंने ऐलान किया है कि वो अपनी लड़ाई जारी रखेंगे और पूरे देश के एससी-एसटी-ओबीसी वर्ग को निजी व सरकारी संगठित-असंगठित क्षेत्र में 98% आरक्षण उनकी जनसंख्या के आधार पर दिलाकर रहेंगे, साथ ही 2 प्रतिशत आरक्षण सरकारी पदों पर भी होगा।
आजाद ने कहा कि उसके लिए उन्हें कुछ भी करना पड़े, लेकिन वो अपने लोगों के साथ किसी भी कीमत पर अन्नाय नहीं होने देंगे। भले ही उसके लिए उन्हें घर घर जाकर लोगो को मनाना पड़े, तमाम यात्रायें और सभायें करनी पड़ी। वो सरकार की चाल को सफल होने नहीं देंगें, और न ही गरीबों और वंचितों के अधिकारों का हनन होने देंगे। बता दें कि हर सेंक्टर में होने वाले नीजिकरण के कारण दलितों और पिछड़ों के लिए आरक्षण की अवधारणा ही खत्म हो रही है, जिससे उनके लिए आरक्षित सीटें पूरी तरह से खत्म हो रही है.. और आजाद ने इसके खिलाफ आवाज उठा कर नीजि क्षेत्रों में भी आरक्षण की मांग रखी है।
कोलकाता के हुगली में दलित परिवार के साथ बर्बरता
3, दलितों से जुड़ा अगला मामला पश्चिम बंगाल के कोलकाता से है, जहां जातिगत भेदभाव करने और दलितों को उनकी औकात दिखाने की मानसिकता के कारण एक दलित के घर में घुसकर नाबालिक के साथ मारपीट करने और महिलाओं के साथ बलात्कार करने की धमकी देने का मामला सामने आया है। ये घटना हुगली जिले के बालागढ़ थाना क्षेत्र के दक्षिण चाला नंदीखेड़ा का है, पीड़ित बीरेंद्र दास ने एक लिखित शिकायत दी कि 31 दिसंबर की शाम को जब वो बाजार गया हुआ था, तब पड़ोस के ही सवर्ण जाति के कुछ लोग जबरन उसके घर में घुस गए, और उसके 15 साल के बेटे अयन को घसीटते हुए घर से बाहर लाकर बुरी तरह से पीटा, जिससे उसके पेट और प्राइवेट पार्ट पर काफी गंभीर चोटे आई है।
इतना ही नहीं उन लोगो ने उसकी मोची जाति को लेकर जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि वो उसकी ही चमड़ी से जूता बनायेंगे। बच्चे के साथ मारपीट करने के बाद उन लोगो ने पीड़ित की पत्नी डाली दास और उनकी दिव्यांग बेटी मंगली दास के साथ दुष्कर्म करने की भी धमकी दी। हैरानी की बात है कि पुलिस ने भी इन मामले में लचर रवैया अपनाया और करीब 6 दिनों के बाद 6 जनवरी 2026 को शाम 5:35 बजे FIR दर्ज किया। इस मामले में पुलिस के रवैयें को लेकर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) ने 7 जनवरी 2026 को हुगली के DM और SP को नोटिस भेज कर पुलिस की की गई कार्यवाई 7 दिनों के अंदर जवाब मांगा है, अगर पुलिस ने इस मामले में लापरवाही की है तो वो इसका खामियाजा भुगतने के लिए भी तैयार रहें। फिलहाल अभी तक इस मुद्दे पर कोई जवाब नहीं आया है।
यूपी के बस्ती में दलित महिला के साथ मारपीट
4- दलितों से जुड़ा अगला मामला उत्तर प्रदेश के बस्ती से है, जहां बीते साल एक महिला के साथ हुई मारपीट और जातिगत अपमान को लेकर महिला को केवल रिपोर्ट दर्ज कराने में 10 महीनों का समय लग गया। ये घटना 20 अप्रैल 2025 की है, पीड़िता मीरा देवी ने अपनी शिकायत में बताया कि वो महुआ के पेड़ के नीचे गोबर के कंडे बना रही थी, तभी गांव के ही छोटकू और बड़के पाठक वहां पास में महुआ बीनने लगे। महिला ने उनसे आग्रह किया कि वो थोड़ी दूरी पर बिने ताकि उसके कंडे खराब न हो, लेकिन वो दोनो उससे नाराज हो गए और उसे जातिसूचक गालियां देते हुए पीटने लगे, इतना ही शोर सुनकर ओमप्रकाश पाठक, उनकी बेटी रंजना पाठक और पत्नी गुडिया पाठक भी आ गए और सभी ने पीड़िता को बुरी तरह से लात, घूंसे, ईंट और डंडों से मारना-पीटना शुरू कर दिया था, साथ ही जातिसूचक गालियां भी दी।
पीड़िता ने जब इसकी शिकायत दर्ज करानी चाही तो पुलिस ने शिकायत तक दर्ज करने से इंकार कर दिया। राज्य में दलितो के लिए कानून व्यवस्था इतनी लचर हो चुकी है कि एक दलित महिला को अपने साथ हुए अन्याय के लिए रिपोर्ट लिखवाने के लिए 10 महीने तक थाने के चक्कर लगाने पड़े लेकिन अंत में थक हार कर उसने सीधे न्यायलय में लिखित शिकायर दर्ज कराई। जिसके बाद कोर्ट ने तुरंत पुलिस को पांचो आरोपियों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट सहित विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया। पुलिस ने इस मामले को दर्ज कर अब जांच शुरु कर दी है, हालांकि अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। अब देखना ये होगा कि रिपोर्ट लिखने में जब 10 महीने लगे तो न्याय में कितना समय लगेगा।
बिहार शरीफ में दलितों की बस्ती की हालत दयनीय
5, दलितों से जुड़ा अगला मामला बिहार के बिहार शरीफ से है, बिहार जहां दलितों की संख्या अच्छी खासी है, वहां दलितों की बस्ती की ऐसी हालात है जैसे वो भारत में नहीं किसी दूसरे ग्रह पर रह रहे हो। जी हां, बिहार में डबल इंजन की सरकार सुशासन का दावा कर रही है लेकिन बिहारशरीफ में अनुसूचित जनजाति आयोग ने सरकार के दावों की सच्चाई उजागर करते हुए दलित बस्तियों की हालत की सच्चाई उजागर की है। बिहार शरीब की दलित बस्तियों में 75 सालों में एक बार भी सड़क निर्माण नहीं हुआ है, और न ही कोई बेसिक सुविधाये है, भ्रष्टाचार इतना बढ़ा हुआ है कि दलित बस्ति के लिए जारी फंड को इधर ऊधर के कामों में लगा दिया जाता है, उनके लिए शिक्षा से लेकर छात्रावास तक की सुविधायें नहीं है।
आयोग के खुलासे के बाद वहीं सांसद और पदाधिकारियों ने उल्टा आयोग पर उनके काम में दखल डालने का आरोप लगा कर मामले को रफा दफा करने की कोशिश भी की, लेकिन आयोग अपनी बातों पर अड़ा रहा। आयोग ने सीधे तौर पर जवाब तलब किया है कि जो योजनायें केंद्र सरकार और राज्य सरकार अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए चलाई जा रही है वो क्यों उन तक पहुंच नहीं पा रही है। आयोग के इस कदम से पूरे महकमें में खलबली मची हुई है, ऐसे में देखना ये होगा कि क्या 75 सालों से मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे लोगों पर सरकार की दया होगी।



