भीमा कोरेगांव की लड़ाई: शौर्य और रणनीति का एक ऐतिहासिक अध्याय
By: Shikha
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1 जनवरी 1818 ये दिन बाकि दिनों की तरह आम नहीं था, क्योकि दिन की शुरुआत ही लड़ाई के साथ हुई जिसे हम भीमा कोरेगांव की लड़ाई कहते हैं.
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इस लड़ाई में सिर्फ 500 दलित सैनिकों ने 25,000 मराठाओं को हरा दिया था, इस लड़ाई की जड़ें ब्राह्मणवादी पेशवा शासन के अत्याचारों में हैं.
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दरअसल 18वीं सदी के अंत और 19वीं सदी की शुरुआत में पुणे में महार लोग जानवरों से भी बदतर जिंदगी जीने को मजबूर थे.
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उन्हें सड़कों पर चलने की अनुमति नहीं थी, उन्हें गांवों के बाहर रहना पड़ता था, पहचान के लिए काला धागा पहनना पड़ता था.
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रोजगार के नाम पर अपमानजनक काम मिलते थे.गले में मिट्टी का बर्तन लटकाना पड़ता था.
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ताकि थूक जमीन पर न गिरे जिससे कोई हिंदू अपवित्र न हो जाए, मंदिरों में प्रवेश वर्जित था..ये नियम महारों को सामाजिक रूप से अलग-थलग रखने के लिए थे.
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पेशवा बाजीराव का शासन ब्राह्मणवादी था, जहां दलितों को सदियों तक अपमानित किया जाता रहा.
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लेकिन 1 जनवरी 1818 को 500 महार सैनिकों ने मराठा पेशवा के 25 से 30,000 सैनिकों की बड़ी फौज को लगभग 12 घंटे तक रोका.
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जिसके बाद जून 1818 में बाजीराव ने आत्मसमर्पण कर दिया, पेशवा सेना के सैनिक लड़ाई को अपनी ड्यूटी और मजदूरी के रूप मे
ं लड़ रहे थे.
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लेकिन महार योद्धाओं के लिए यह व्यक्तिगत प्रतिशोध था..बहुजन आंदोलन में ये दिन खास है क्योंकि यह दिखाता है.
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कि दलित इतिहास, ब्रिटिश साम्राज्यवाद के बावजूद, जाति दमन के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक है.
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