The Secret of Badrinath: भारत में ऐसे तमाम मंदिर हैं जो भगवान बुद्ध से जुड़े हुए थे. लेकिन समय के साथ मनुवादियों का प्रभाव बढ़ा और बौद्ध धर्म से जुड़े तमाम मंदिरों को हिंदू मंदिरों में बदल दिया गया. बौद्ध विहारों को भी हिंदू धर्म स्थानों में परिवर्तित कर दिया गया. यहां तक कि भगवान बुद्ध की मूर्तियों को ही कई हिंदू मंदिरों में स्थापित किया गया और कपड़े एवं आभूषण से ढ़क कर उन्हें अपना बना लिया गया. बद्रीनाथ की भी वही कहानी है और बद्रीनाथ मंदिर के गर्भगृह में जो मूर्ति है, वह भगवान विष्णु की नहीं बल्कि भगवान बुद्ध की मूर्ति है. खुद राहुल सांकृत्यायन ने भी अपनी किताब में इस बात का जिक्र किया था. तो चलिए इस लेख में जानते हैं कि कैसे भगवान बुद्ध की मूर्ति को ही ब्राह्मणवादियों ने बद्रीनाथ में स्थापित किया है.
बौद्ध अनुयायियों का स्थल बद्रीनाथ
दरअसल, कई इतिहासकारों और बौद्ध ग्रंथों में यह बताया गया है कि 8वीं शताब्दी से पहले बद्रीनाथ का इलाका बौद्ध धर्म के प्रभाव में था. उस दौर में यहां कई बौद्ध विहार यानी मठ हुआ करते थे. कुछ विद्वानों का कहना है कि जिस जगह पर आज बद्रीनाथ मंदिर खड़ा है, उसी स्थान पर कभी बौद्ध अनुयायियों का स्थल हुआ करता था. बौद्ध धर्म ग्रंथों के अलावा इसकी चर्चा अब पब्लिक डोमेन में भी होने लगी है. हाल ही में साउथ के वेटरन एक्टर प्रकाश राज ने दावा किया कि देश के कई प्रसिद्ध मंदिर, असल में बौद्ध मठों को तोड़कर बनाए गए हैं. जिनमें बद्रीनाथ औऱ केदारनाथ भी शामिल हैं.
बद्रीनाथ की मूर्ति काले पत्थर से बनी
प्रकाश राज के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर लोग 2 खेमे में बंट गए. लोगों की ओर से तरह तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिली. कुछ लोगों ने बौद्ध विद्वान राहुल सांकृत्यायन और उनकी पुस्तक हिमालच परिचय का जिक्र भी किया. राहुल सांकृत्यायन ने अपनी पुस्तक हिमालय परिचय में बद्रीनाथ का उल्लेख करते हुए चौंकाने वाली बात लिखी है. वो अपनी किताब में लिखते हैं कि बद्रीनाथ की मूर्ति काले पत्थर से बनी है और मूर्ति भूमि स्पर्श मुद्रा में है.
ध्यान देने वाली बात है कि भूमि स्पर्श मुद्रा वही मुद्रा है जो भगवान बुद्ध की पहचान मानी जाती है. उन्होंने लिखा कि यह मूर्ति करीब 3 फीट 9 इंच ऊंची है और ध्यानावस्थित प्रतीत होती है. इस आधार पर उन्होंने अनुमान लगाया कि यह मूर्ति संभवतः बौद्ध काल की हो सकती है. यह बात जरूर सोचने पर मजबूर करती है कि अगर मूर्ति सच में बोधि मुद्रा में है तो क्या यह भगवान बुद्ध की मूर्ति नहीं हो सकती?
भगवान बुद्ध की प्रतिमा
बद्रीनाथ को लेकर एक कहानी यह भी है कि यह मंदिर एक जमाने में बौद्ध मठ हुआ करता था. 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य ने यहां आकर इसे हिंदू तीर्थ में परिवर्तित किया. कहा जाता है कि केदारनाथ क्षेत्र में जब शंकराचार्य का प्रभाव बढ़ा तो वहां के वज्रयानी बौद्ध अनुयायी तिब्बत चले गए. उनके जाने के बाद वहां स्थापित भगवान बुद्ध की प्रतिमा अलकनंदा नदी के पास तप्तकुंड में फेंक दी गई.
बाद में रामानुचार्य को वही प्रतिमा कुंड में नहाते हुए मिली. उन्होंने इसे भगवान विष्णु का अवतार मानकर यही स्थापित कर दिया और यह मूर्ति आज बद्रीनाथ मंदिर के गर्भगृह में विराजमान है. हालांकि, इस कहानी का कोई पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिलता लेकिन लोककथाओं और परंपराओं में यह आज भी जिंदा है.
बद्रीनाथ का पुराना स्वरुप तिब्बत के थोलिंग मठ
कुछ इतिहासकार यह बताते हैं कि बद्रीनाथ का पुराना स्वरुप तिब्बत के थोलिंग मठ से जुड़ा हुआ था. थोलिंग मठ तिब्बत के सबसे पुराने बौद्ध मठों में से एक है. 1962 से पहले जब हर साल बद्रीनाथ के कपाट खुलते थे तो मंदिर के पहली पूजा का प्रसाद थोलिंग मठ भेजा जाता था. वहीं से चवर, बद्रीनाथ लाया जाता था, जिसे पूजा में प्रयोग किया जाता था. भारत-चीन युद्ध के बाद 1962 में यह परंपरा बंद कर दी गई.



