तिब्बत में चीन की आस्था पर राजनीति: बौद्ध धर्म को नियंत्रण में रखने की कोशिश, मगर विश्वास अब भी आज़ाद

China politics in Buddhism
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Buddhism in China : चीन में बौद्ध धर्म (Buddhism) की आबादी 4 करोड़ के आसपास है, जो चीन की जनसंख्या में करीब 4 फीसदी हिस्सा रखता है. चीन के किंघई, सिचुआन और तिब्बत में बौद्धों की आबादी सबसे ज्यादा है…यह वही एरिया है, जिस पर चीन ने अपना प्रभुत्व तो जमा लिया लेकिन यहां के बौद्ध लोग चीन को अभी भी पूरी तरह से स्वीकार कर नहीं पाए हैं. नास्तिक चीन की कम्युनिस्ट सरकार (Communist government) अब इन बौद्धों को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश में लगी हुई है.

तिब्बत (Tibet) के धार्मिक संस्थानों से लेकर दलाई लामा को नकारने तक…चीन, बौद्ध धर्म पर कब्जा जमाने की कोशिश कर रहा है…दुनिया चीन की इस दुष्टता को देख रही है लेकिन कोई भी चीन के खिलाफ खड़ा होने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है… तो चलिए आपको इस लेख में बताते हैं.. कैसे दुष्ट चीन बौद्ध धर्म को अपने नियंत्रण में करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहा है…

चीन बौद्ध धर्म पर कब्जा जमाने की कोशिश

रिपोर्ट्स की मानें तो 1990 के दशक के आखिर में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी यानी CCP ने तिब्बती बौद्ध धर्म की निगरानी को संस्थागत रूप से लागू करना शुरु किया. मौजूदा समय में तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में करीब 1700 रजिस्टर्ड मठ है और लगभग 46,000 भिक्षु व भिक्षुणियां हैं और इनकी सारी गतिविधियों पर चीन की सरकार की नजर रहती है. यहां हर मठ की देखरेख के लिए एक सरकारी प्रबंधन समिति होती है और यहां किसी भी वरिष्ठ भिक्षु या मठ प्रमुख की नियुक्ति पार्टी की मंज़ूरी के बिना नहीं की जा सकती.

दलाई लामा की आलोचना

2008 के बाद से ल्हासा और आसपास के मठों में चीन की कम्युनिस्ट सरकार द्वारा देशभक्ति शिक्षा सत्र लगातार बढ़ाए जा रहे हैं. इनमें भिक्षुओं को दलाई लामा की आलोचना करने और चीन के प्रति वफादारी की शपथ लेने के लिए मजबूर किया जाता है. बौद्ध धर्म में चीन के हस्तक्षेप का सबसे स्पष्ट उदाहरण दलाई लामा के पुनर्जन्म पर अधिकार जताना है.

बीजिंग की कम्युनिस्ट सरकार

दरअसल, यह प्रक्रिया सदियों से तिब्बती धार्मिक परंपरा का हिस्सा रही है. वहीं अब बीजिंग की कम्युनिस्ट सरकार इसे सरकारी स्वीकृति से जोड़ना चाहता है. रिपोर्ट बताती हैं कि “बीजिंग का यह कदम इस सोच को दर्शाता है कि अगर वह उत्तराधिकार को नियंत्रित करेगा, तो तिब्बती पहचान के प्रतीक दलाई लामा को बेअसर किया जा सकता है.” चीनी सरकार 1951 में तिब्बत पर किए अपने कब्जे को शांतिपूर्ण मुक्ति बताती है…वहां की सरकारी मीडिया, स्कूल की किताबें और संग्रहालयों में भी यही दोहराया जाता है कि चीन ने तिब्बत को सामंती धर्मतंत्र से मुक्त कराया.

बौद्ध धर्म का विरोधी चीन

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो बौद्ध धर्म का विरोधी चीन, मठों के जीर्णोद्धार और विकास में किए जा रहे खर्च को भी अपनी उदारता के रूप में प्रस्तुत करता है. यहां तक कि चीनी सरकार के कई सरकारी अभियानों में बौद्ध भिक्षुओं को नाचते हुए दिखाया जाता है…जहां वह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते नजर आते हैं. चीन ये सब दिखाकर दुनिया को यह बताने की कोशिश करता है कि तिब्बती अब खुशहाल हैं और चीन के आभारी हैं.

अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलनों को वित्तीय

ध्यान देने वाली बात है कि बीजिंग अब सिर्फ तिब्बत तक सीमित नहीं रहना चाहता…वह तिब्बत में अपने द्वारा बनाए गए बौद्ध धर्म के इस रूप को श्रीलंका, थाईलैंड और नेपाल जैसे देशों तक फैलाने की कोशिश कर रहा है. दुष्ट चीन इन देशों में अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलनों को वित्तीय मदद देता है और उन विश्वविद्यालयों को सहयोग करता है, जो उसके विचारों के अनुरूप शोध कार्य करते हैं. चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का उद्देश्य है चीन को बौद्ध विचारधारा का नया वैश्विक केंद्र दिखाना और दलाई लामा जैसे नेताओं के अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को कमजोर करना…और वह लगातार सेंधमारी का काम कर रहा है.

आपको बता दें कि तिब्बत का संघर्ष अब धार्मिक नहीं बल्कि राजनीतिक वैधता का सवाल बन गया है. चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का असली उद्देश्य बौद्ध धर्म की मूल भावना को नष्ट कर उसे चीनी विशेषताओं के साथ ढालना है ताकि किसी भी धार्मिक संस्था की निष्ठा उनकी पार्टी से ऊपर न जा सके. बौद्ध धर्म को दबाने और दलाई लामा के अस्तित्व को नकारने में चीन जी जान से जुटा हुआ है और इसके लिए काफी बड़े स्तर पर तैयारी भी कर रहा है. नास्तिक चीन हर तरह से बौद्ध धर्म को अपने कंट्रोल में लेना चाहता है…दुनिया इसे देख रही है…इस चीज को समझ भी रही है लेकिन बौद्धों के अस्तित्व को बचाने वाला कोई नजर नहीं आ रहा है…

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