Nalanda dark secrets: जब आप नालंदा यूनिवर्सिटी का नाम सुनते है तो आपके जेहन में मौजूदा समय में एक खंडहर नुमा संरचना आती होगी.. जो हजारों सालों से क्षतिग्रस्त पड़ी हुई है, या फिर एक ऐसी संरचना जो बेहद विशाल होती होगी… जहां हजारों छात्र शिक्षा ग्रहण करते होंगे, या शिक्षक उन्हें शिक्षा दे रहे होंगे, नालंदा में मौजूद 9 मंजिला लाइब्रेरी जहां हर तरह का ज्ञान भंडार होगा… यानि की कुल मिलाकर नालंदा ज्ञान का वो प्रकाश फैलाना वाला था।
विक्रमशिला विश्वविद्यालय में थेरवाद और तंत्रयान परंपरा
जिसके लिए दुनिया भर से छात्र आते होंगे। लेकिन एक सवाल अभी भी है कि जिस तरह से विक्रमशिला विश्वविद्यालय में थेरवाद और तंत्रयान परंपरा को फॉलो किया जाता था, वहां तंत्रविद्या की शिक्षा दी जाती थी तो क्या नालंदा में भी काला जादू या तंत्र विद्या सिखाई जाती होगी। अपने इस विडियो में हम जानने की कोशिश करेंगे कि क्या नालंदा में तंत्र विद्या सिखाई जाती थी और तंत्र विद्या को सिखाने के पीछे की सच्चाई क्या थी।
नालंदा विश्वविद्यालय में मूल रूप से बौद्ध शिक्षाओं के साथ साथ वेदो, पुरानों, संस्कृत, विज्ञान, चिकित्सा, अर्थशास्त्र, ज्योतिष, गणित जैसी विषयों की शिक्षा दी जाती थी। चुंकि सभी छात्रों औऱ शिक्षकों को बौद्ध परंपरा के नियमो का पालन करना पड़ता था, इसीलिए बौद्ध शिक्षाओं का महत्व ज्यादा था। बौद्ध शिक्षाओं के महत्व में नालंदा में अमूमन महायान परंपरा को सर्वोपरि माना गया, और महायान की शिक्षाओं को ही छात्रों को पढ़ाया जाता था।
क्या नालंदा में तंत्र विद्या जादू सिखाया जाता?
लेकिन बौद्ध धर्म का मूल सिद्धांत सत्य को प्राप्त करना है, इसके लिए अलग अलग समुदाय ने निर्वाण प्राप्त करने के लिए अलग अलग पद्दित बताई है। जहां महायान में ये माना जाता है कि व्य़क्ति अकेले निर्वाण प्राप्त नहीं कर सकता है तो वहीं थेरवाद में माना गया कि निर्वाण प्राप्त करने के लिए अकेले ही तप और साधना की जा सकती है, वही तंत्रयान एक ऐसी परंपरा है जिसमें जल्दी निर्वाण के लिए तंत्र विद्या का इस्तेमाल किया जाता है। अब सवाल ये है कि क्या नालंदा में भी तंत्र विद्या या काला जादू सिखाया जाता था।
विश्वविद्यालय में तंत्रयान की शिक्षा
तो इसका जवाब है हां, नालंदा विश्वविद्यालय में भी तंत्रयान की शिक्षाओं को छात्रो को सिखाया जाता था, लेकिन आप उन्हें काला जादू नहीं कह सकते है, क्योंकि काला जादू का इस्तेमाल हमेशा दूसरो को परेशान करने और उन्हें नुकसान पहुंचाने के लिए किया जाता है, लेकिन नालंदा में दी जा रही तंत्र विद्या का ज्ञान केवल व्यक्ति को ज्ञान और मोक्ष के रास्ते पर जल्दी ले जाने के लिए दिया जाता था यानि कि तंत्र के जरिये जल्दी निर्वाण प्राप्त करना।
आठवीं – नौंवी सदी में नालंदा में भी तंत्रयान
हालांकि वज्रयान परंपरा को आठवी सदी के बाद नालंदा में मान्यता दी गई जब आठवी सदी में विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी। क्योंकि विक्रमशिला तांत्रिक बौद्ध धर्म जिसे वज्रयान कहा जाता है, जिसे तंत्रयान भी कहा गया। आठवीं – नौंवी सदी में नालंदा में भी तंत्रयान को महत्व दिया जाना लगा और वो तेजी से प्रचलित हुआ था।
नालंदा के शिक्षक रहे पद्मसंभव ने नालंदा में तंत्र विद्या देनी शुरु की थी, पद्मसंभव वहीं थे जिन्होंने तिब्बत तक की यात्रा की थी और वो वहां पर वज्रयान संप्रदाय के संस्थापक भी बने थे, उनके अलावा आचार्य कमलशील और आचार्य दीपंकर श्रीज्ञान अतिश के भी नामों का उल्लेख मिलता है, जो नालंदा में छात्रों को तंत्रविद्या का ज्ञान देते थे।
बख्तियार खिलजी ने तबाह किया विक्रमशिला
जब नालंदा का पतन हुआ था उसी समय विक्रमशिला को भी बख्तियार खिलजी ने तबाह कर दिया था, तब तक दोनो ही यूनिवर्सिटी तंत्रयान बौद्ध परंपरा का एक महात्वपूर्ण केंद्र बन चुके थे। हालांकि नालंदा का ज्ञान का अब एक प्रतिशत भी दुनिया के पास नहीं है, लेकिन बौद्ध परंपरा के भारत के अलग अलग हिस्सो में जाने के कारण बौद्ध शिक्षाओं का विस्तार हुआ था, लेकिन समय के साथ इस्लामिक ताकतो के बढ़ने के कारण आखिरकार न केवल नालंदा की शिक्षा बल्कि बौद्ध धर्म का भी भारत में पतन हो गया तो वहीं नालंदा की शिक्षाओं को आज भी भारत के पड़ोसी देशों में पढ़ाया जाता है।
शिक्षाओं की पूरी तरह से अवहेलना
उसकी चर्चा की जाती है, लेकिन दुख की बात है कि भारत में ही उन शिक्षाओं की पूरी तरह से अवहेलना की गई। जो वाकई में बौदध धर्म की भारत भूमि पर मौजूदा स्थिति को दर्शाता है। हालांकि नालंदा का ज्ञान कभी लौट कर नहीं आयेगा, लेकिन अगर बाहरी देशों से ही कोशिश की जाती तो कुछ हिस्सा जरूर प्राप्त किया जा सकता है। खासकर चीनी यात्री जो नालंदा में सालों गुजार कर गए है.. उनके पास नालंदा का ज्ञान जरूर था, और वो देश आज भी उसका इस्तेमाल करते है।



