Babasaheb Ambedkar to Buddhism: साल 1935 में महाराष्ट्र के नासिक में होने वाली येवला की विशाल जनसभा में जब बाबा साहब ने कहा था कि वो भले ही हिंदू पैदा हुए है लेकिन हिंदू मरेंगे नहीं, तब उन्हें ये तो पता था कि वो धर्म जरूर बदलेंगे, लेकिन वो कौन सा धर्म अपनायेंगे, ये उन्हें भी नहीं पता था। बाबा साहब के इस फैसले पर काफी विवाद भी हुआ लेकिन बाबा साहब तय कर चुके थे।
बाबा साहेब ने किया कई धर्मो का अध्ययन
इसलिए उन्होंने कई धर्मों के बारे में गहीनता से अध्ययन शुरु किया, कारण एक ही था भेदभाव और असमानता से निजात, बाबा साहब ने इस्लाम, ईसाई, सिख, पारसी और जैन धर्म के बारे में अध्ययन कर लिया था, लेकिन अब शुरु हुई उनकी बौद्ध धर्म को लेकर यात्रा..इस एक अध्ययन के लिए बाबा साहब कई देशों में गए जहां बौद्ध धर्म को सर्वोपरि माना गया। इस दौरान ही बाबा साहब न अपनी किताब बुद्धा एंड हिज धम्म लिखनी शुरु की थी।
जैसे जैसे बाबा साहब ने बौद्ध धर्म को समझना शुरु किया, उनका फैसला मजबूत होता गया कि वो बौद्ध धर्म अपनायेंगे, लेकिन उन्होंने ये भी तय कर लिया था कि पहले वो अपनी किताब पूरी करेंगे, और जैसे ही किताब पूरी होगी, वो बौद्ध धर्म अपना लेंगे। अपने इस वीडियो में हम बाबा साहब की बौद्ध धर्म को लेकर की गई यात्रा के बारे में जानेंगे.. कैसी थी बाबा साहब की यात्रा।
बाबा साहब ने बौद्ध धर्म पर रिसर्च
भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है, और यहां सभी धर्मों को अपनी इच्छा अनुसार मानने की आजादी थी, लेकिन बाबा साहब ने गौर किया कि बौद्ध धर्म जो कि भारत के पड़ोसी देशों में काफी फल फूल रहा है लेकिन भारत की धरती से ही निकले बौद्ध धर्म को भारत में इतना नेगलेट क्यों किया गया, और बाबा साहब ने शुरु की बौद्ध धर्म पर रिसर्च।
ये वक्त था साल 1950 का, देश आजाद हो चुका था, और बाबा साहब देश को एक मजबूत संविधान दे चुके थे, अब बारी थी उनकी उस यात्रा की, जिसका इंतजार वो सालों से कर रहे थे, पहले ही सभी धर्मों की अच्छाईयों के साथ साथ कमियों को भी देख चुके थे। बाबा साहब ने 1950 में बौद्ध धर्म को करीब से जानने के लिए श्रीलंका में आयोजित हुए वर्ल्ड फेलोशिप ऑफ़ बुद्धिस्ट्स की एक मीटिंग में बाबा साहब भी हिस्सा लेने पहुंचे।
बौद्ध भिक्षुओं ने बाबा साहब का मार्गदर्शन किया
यहां उन कई ऐसे भिक्षुओं से मुलाकात हुई, जिन्होंने बाबा साहब का मार्गदर्शन किया। बाबा साहब वापिस लौटे जहां पूणे के एख बौद्ध विहार में वो गए थे, वहां बौद्ध धर्म के बारे में जानने के बाद उन्होंने ऐलान किया था कि वो बौद्ध धर्म को लेकर किताब लिखेंगे। इतना ही नहीं जुलाई 1951 में बाबा साहब ने “भारतीय बौद्ध जनसंघ यानि कि इंडियन बुद्धिस्ट पीपल्स ऑर्गनाइज़ेशन का गठन किया था, जिसका नाम मई 1955 में बदल कर भारतीय बौद्ध महासभा” या “बौद्ध सोसाइटी ऑफ़ इंडिया” रख दिया गया था।
किताब लिखने के दौरान बाबा साहब को दो बार बर्मा, वर्तमान में म्यांमार जाने का मौका मिला। यहां भी उन्हें 1954 में रंगून में वर्ल्ड फेलोशिप ऑफ़ बुद्धिस्ट्स की तीसरी कॉन्फ्रेंस में शामिल होने का मौका मिला। इतना ही नहीं बाबा साहब नेपाल में बुद्ध के जन्मस्थान को देखने गए, साथ ही वो ऐसी दलित बस्ति में भी गए, जहां पूरे दलित समाज ने बौद्ध धर्म अपना लिया और वो जातिगत भेदभाव से मुक्त हो गए थे।
बुद्ध की शिक्षाएं आधुनिक और वैज्ञानिक युग
जिसने बाबा साहब को और ज्यादा प्रेरित किया बौद्ध धर्म को अपनाने के लिए। धीरे धीरे जैसे अंबेडकर ने बुद्ध को जाना, उनकी दृष्टि में बुद्ध भगवान नहीं बल्कि एक समाज सुधारक थे, जिन्होंने मानवता को आगे रखा, किसी भी तरह की कुरितियों से। बुद्ध की शिक्षाएं आधुनिक और वैज्ञानिक युग के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी गई। अंबेडकर ने माना कि बुद्ध के विचार उत्पीड़ित लोगो को उनकी पीड़ा से मुक्ति देने का मार्ग है और साथ ही समतावादी समाज के लिए एक प्रकाशमय मार्ग निर्धारित करते है।
बाबा साहेब ने अपनाया बौद्ध धर्म
हालांकि 1956 में ये किताब पूरी हो गई और बाबा साहब ने तय कर लिया कि वो बौद्ध धर्म ही अपनायेंगे, जिसके लिए वो 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में विशाल जनसभा में जमा हुआ और उनके साथ चलने वाले करीब 5 लाख दलितों और पिछड़ो ने भी बौद्ध धर्म अपना लिया था। ये पूरे इतिहास में सबसे अधिक मात्रा में एक साथ धर्म परिवर्तन करने का पहला मौका था, जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया।
इस दिन दशहरा था, लेकिन आज इस दिन को धम्म चक्र प्रवर्तन दिवस के रूप में मनाया जाता है। बाबा साहब के इस एक कदम ने भारत में फिर से बौद्ध धर्म को जागृत कर दिया था। बाबा साहब ने सभी धर्मो के लिए भारत में रिसर्च की थी लेकिन बौद्ध धर्म में बारे में जानेन के लिए उन्हें दूसरे देश जाना पड़ा, जिसका कारण कहीं न कहीं बौद्ध धर्म की अवहेलना ही होगी। हालांकि बाबा साहब ज्यादा समय कर बौद्ध बन कर वहीं सकें औऱ 6 दिसंबर 1956 को उनकी निधन हो गया था। लेकिन बाबा साहब ने अपना वादा जरूर निभाया, उन्होंने कहा था कि वो हिंदू नहीं मरेंगे और वो हिंदू बन कर नहीं बल्कि बौद्ध बन कर ही मरें।



