Buddhist monk death ritual: अगर सही मायने में भक्ति की राह पर चलकर व्यक्ति को मोक्ष के रास्ते पर जाना हो, या फिर कर्मों के चक्र के बाहर निकलना हो, या पुनर्जन्म के दुखों से बाहर निकल कर शांति की राह पर जाना तो केवल बौद्ध धर्म ही एक ऐसा धर्म है, जो आपको इन चक्रों से निकाल कर साधना के रास्ते पर ले जाता है… ये बौद्ध धर्म में होने वाले तप और साधना की ही शक्ति है कि एक तरफ जहां अन्य धर्मों में मरने के बाद शवों को तुरंत अंतिम संस्कार कर दिया जाता है।
तो वहीं बौद्ध भिक्षुओं के परनिर्वाण के बाद किसी के समुदाय में 7 दिनों, तो किसी के 21 औऱ किसी में 49 दिनों तक अतिंम संस्कार नहीं किया जाता है, लेकिन मरने वाले भिक्षु की साधना की ताकत ही होती है कि उनके मृत देह से किसी तरह की कोई दुर्गंध नहीं आती.. अपने इस वीडियो में हम जानेंगे कि बौद्ध भिक्षुओं के परिनिर्वाण के बाद 7 दिनों तक क्यों उनका अंतिम संस्कार नहीं किया जाता है। क्या है बौद्ध धर्म में 7 DAYS RITUALS…
मृत्यु के पश्चात क्या होता है
दरअसल बौद्ध धर्म एक ऐसा धर्म है जो ये मानता है कि मोक्ष से पहले व्यक्ति को कई जन्मों के बंधन से होकर गुजरना पड़ता है। ऐसे में किसी सिद्ध भिक्षु का जब परिनिर्वाण होता है तब उनके देह को ध्यान मुद्रा में ही रखा जाता है जिसे बौद्ध लोग थुकदम की मुद्रा कहते है। मृत्यु के पश्चात बौद्ध भिक्षु के परिवार वाले स्मारक समारोह करते है जिसमें मरने वाले भिक्षु के मोक्ष की यात्रा के लिए प्रार्थना करते हैं, वो दान करते है, बौद्ध धर्म में माना जाता है कि मृत्यु के सातवें दिन आत्म को उसके कर्मों के आधार पर न्याय का सामना करना पड़ता है।
परिवार और उनके साथियों की प्रार्थना इस यात्रा को आसान बनाने का काम करती है जिससे मृत्य को प्राप्त हुए भिक्षु के पुनर्जन्म को सकारात्मक बनाया जा सकें। बौद्ध धर्म में 49 दिनों तक जिसमें 7वें, 14वें, 21वें और 49वें दिन विशेष प्रार्थनाएँ की जाती हैं। प्रार्थना समारोह होता है और अंतिम दिन पूरा परिवार भिक्षु के इस जन्म से मुक्ति की खुशी मनाता है।
क्यों नहीं आती मृत देह से दुर्गंध
बौद्ध धर्म में भिक्षुओं की राह परिनिर्वाण तक आसान नहीं होती। सालों की कठोर साधना, समर्पण, एकाग्रता ही एक बौद्ध भिक्षु को परिनिर्वाण के बाद मौक्ष के रास्ते पर ले जा सकती है। जो सिद्ध भिक्षु होते है, उसमें से कई ऐसे होते है जिन्हें अपने तपोबल से पहले ही ये पता चल जाता है कि वो किस दिन परिनिर्वाण की यात्रा पर निकलेंगे। इसलिए वो पहले ही इसकी सूचना दे देते है। बौद्ध धर्म में मृत्यु के पश्चात 49 दिनों का शोक होता है…ऐसे में ये अवधारना है कि सातवें दिन से लेकर 49वें दिन तक के बीच में क्षिक्षु का या तो पुनर्जन्म हो चुका है या फिर वो मोक्ष की तरफ चले गए है।
हालांकि ऐसे शायद कुछ ही भिक्षु होते है जिनका शरीर 49 दिनों तक रहता है, हैरानी की बात है कि इनका तपोबल ऐसा होता है कि उनके मृत देह से कभी भी दुर्गंध नहीं आती है। वहीं जब उनके शरीर को अंतिम दिन देखा जाता है तो शरीर के बजाय केवल सिर के बाल और नाखून ही मौजूद होते है..इसका अलावा कई भिक्षुओ का शरीर बिल्कुल एक बच्चे की तरह हो जाता है। इन भिक्षुओ के अवशेषों को संग्रहित किया जाता है और उनके लिए स्तूप का निर्माण कराया जाता है। जिसमें उनके अवशेषों को रख कर उनकी साधना की जाती है।
अलग अलग समुदाय में अलग अलग तरीका
बौद्ध धर्म भी की समुदायों में बंटा हुआ है, ऐसे में थेरवाद समुदाय के रिचुअल महायान समुदाय से अलग होते है, हालांकि दोनो के रिचुउल मोक्ष के लिए ही किये जीते है लेकिन उनके तरीके अलग है। जैसे कि थेरवाद समुदाय में भिक्षु के परिवार वाले बाकि के भिक्षुओ को दान देते है जिसमें खासकर कपड़े दान किये जाते है जिसे पाली में पंसुकूल कहा जाता है, यानि की त्यागा हुआ चोगा, ताकि उनके आशिर्वाद से मृतक भिक्षु के पुण्यों में इजाफा हो सकें, वहीं महायान में मृतक भिक्षु को एक बेहतर स्थान दिलाने या फिर उनके पुनर्जन्म के लिए अमिताभ सूत्र का जाप किया जाता है।
वहीं तिब्बती बौद्ध धर्म में बार्डो थोडोल जो कि तिब्बती मृतकों की किताब है, उसके अनुसार मानते है कि मृतक की आत्मा को 49 दिनों के चक्र से गुजरने में सहायक होता है, और इसीलिए हर सातवें दिन प्रार्थना किया जाता है। वहीं तिब्बत में ही शरीर को गिद्धों या अन्य जानवरों को खिलाने की प्रथा शुरु हुई, जिसे झटोर कहा जाता है, जिसका मतलब होता है पक्षियों को दान”। इसी प्रथा को स्काई बरियल भी कहा जाता है। ये दर्शाता है कि जिस शरीर से इतना मोह था, जानवरों को भेंट करके वो इस शरीर से मोह को पूरी तरह से त्याग चुके है, ये उनके वैराग्य का प्रतीक है। 7 दिनों का रिचुअल असल में बौद्ध भिक्षु को परिनिर्वाण की आसान यात्रा के लिए होता है, जिसे हर समुदाय करते है। बस सबके तरीके थोड़े अलग अलग है।



