गौतम बुद्द की जन्म स्थली लुंबिनी के बारे में संसार को पहली बार 18वी सदी के अंत में पता चला था, जबकि करीब 500 सालों से भी ज्यादा समय तक गौतम बुद्ध की जन्मस्थली के बारे में किसी को पता ही नही था, जिसका कारण भारत में बढ़ते इस्लामिक ताकत और बौद्ध धर्म के घटते प्रभाव के कारण गौतम बुद्ध की जन्मस्थिली विलुप्त सी हो गई थी..
लेकिन जब 18वी सदी के अंत में जर्मन पुरातत्वविद् एलोइस एंटोन फ्यूहरर ने 1895 में रूपनदेगी के तराई क्षेत्र में अशोक के शिलालेख खोजे थे, जिसके अनुसार ये स्थान गौतम बुद्ध का जन्मस्थल था। तो वहीं देवदह उनका ननिहाल था.. 29 साल में घर छोड़ने वाले बुदध को एक बार अपने नाना और अपने पिता के बीत हुए विवाद को सुलझाने के लिए आना पड़ा था। क्या था वो विवाद, और कैसे बुद्ध ने ये विवाद सुलझाया था।
बुद्ध की ननिहाल
बुद्ध का ननिहाल देवदह था, जहां कोलिय वंश का शासन था जबकि उनके पिता कपिलवस्तु में शासन करते थे जो कि शाक्य वंश के थे। बुद्ध के जन्म और उनकी विवाह तक दोनो वंशो के बीच काफी मैत्रीपूर्ण संबंध था। लेकिन दोनो राज्यों के बीच बहने वाली रोहिणी नदी के पानी को लेकर दोनो राज्यों के बीच बड़ी दुश्मनी हो गई थी। नदी के पानी के लिए दोनो वंशो के बीच युद्ध की स्थिति हो गई थी..ऐसे में अहिंसा और सत्य पर चलने वाले शाक्य मुनि बुद्ध ने यहां हस्तक्षेप किया..क्योंकि अगर युद्ध होता यो मासूम और निर्दोषो के प्राण जाते, और बुद्ध ऐसा कभी नहीं चाहते थे।
बुद्द ने कैसे रोका दोनो राज्यों का विवाद
बुद्ध को जब ये पता चला कि दोनो वंशो के बीच लड़ाई होने वाली है, तो वो तुरंत उस स्थान पर पहुंचे जहां दोनो से एक साथ मुलाकात हो सकती थी। उन्होंने एक शिविर में दोनो वंश के राजाओं को बुलाया और सीधे एक सवाल पूछा.. क्या ज्यादा कीमती है पानी या फिर मानव रक्त..जो कि पानी के लिए दोनो राज्यों के बीच बहेगा। मानव जीवन ज्यादा कीमती है या फिर पानी ज्यादा कीमती है।
इस सवाल का जवाब तो दोनो राज्यों के राजा जानते थे लेकिन जवाब देने की हिम्मत कोई नही कर पाया.. क्योंकि पानी को तो बांटा जा सकता है लेकिन एक बार रक्तपात हुआ और जीवन खत्म हो गया तो वो कभी न तो किसी से बांटा जा सकता है और न ही वो तभी लौटने वाला है।
जिसके कारण दोनो राजाओं को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने बुद्ध के अहिंसा और सत्य के रास्ते पर चलते हुए ये फैसला लिया कि वो युद्द करने और रक्तपात करने के बजाय ऐसा रास्ता चुनेंगे जिसमें दोनो की सुरक्षा हो, नदी का पानी बराबर मिले..और किसी को भी अभाव न सहना पड़े। बुद्ध का प्रभाव ही ऐसा था, वो रंक को भी ज्ञान रूपी धन देकर राजा बनाने की शक्ति रखते थे।
कहां हुआ था विवाद
जिस स्थान पर विवाद हुआ वो स्थान आज यूपी के महाराजगंज जनपद में आता है, जो कि पहले गोरखपुर का ही हिस्सा थी, लेकिन बुद्ध के नाना महाराज अंजन के नाम पर कोलिय वंश के सम्मान में महाराजगंज जनपद को अलग कर नया नाम मिला था। महाराजगंज जिले में ही देवदह और रामग्राम स्थित है। देवदह गौतम बुद्ध का ननिहाल था तो वहीं रामग्राम में बुद्ध की अस्थियों का आठवा हिस्सा रखी हुआ था।
कहा जाता है कि जब अशोक ने यहां रखे अवशेषों को लेने के लिए सिपाही भेजे तो यहां रहने वाले जहरीले सांपो ने उन्हें आगे ही नहीं बढ़ने दिया था। बुद्ध के हस्तक्षेप के कारण रक्तपात होने से बच गया.. और शांति से इतना बड़ा विवाद खत्म हो गया। बुद्ध ने वहां शांति का संदेश भी दिया था, ताकि लोग हिंसा, लालच और और व्याभिचार का मार्ग छोड़ कर अहिंसा के मार्ग पर चले, सत्य का अनुसरण करें, और मोक्ष के लिए ध्यान करने पर अपना मन केंद्रित करें।
इस तरह बुद्ध ने बिना रक्त पात किए शांति का संदेश देते हुए दोनो वंशों में संबंध सुधार दिये थे। जिसके लिए शाक्य वंश और कोलिया के बीच फिर से मैत्रिपूर्ण संबंध बन गया था अपने ननहिहाल और पिता के बीच संधि कराने का उपाय कैसा लगा.. उनके ज्ञान को लेकर आपका क्या सोचने है।



