जब बात बौद्ध धर्म के विस्तार की होती है तो सबसे पहले इसका श्रेय महान चक्रवर्ती शासक सम्राट अशोक को जाता है। अशोक के जीवन में बौद्ध धर्म का प्रभाव बचपन से था लेकिन जब उनके कलिंग का युद्ध देखा तो वहां का रक्तपात उसे विचलित कर गया और उसने मन की शांति के लिए बौद्द धर्म अपनाया और अपने परिवार को बौद्ध बनाया, इतना ही नहीं बौद्ध धर्म की तरफ ले जाने वाले उनके गुरु उपगुप्त के कहने पर ही अशोक ने न केवल 84000 बौद्ध स्तूप बनवाये थे, बल्कि भारत के अलावा भी एशिया के कई कोनो में बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार किया था।
करीब 600 से 700 सालों तक भारत में बौद्ध धर्म बेहद मजबूत स्थिति में था, लेकिन फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि बौद्ध धर्म कमजोर होता गया, लोगो ने इस पर भरोसा करना छोड़ दिया.. तो इसका कारण है ब्राह्मणों की वो चाल.. जिसके कारण ब्राह्मणों ने अपना गणित लगा कर बौद्ध धर्म को फिर से कमजोर किया और लोगो को बौद्ध धर्म छोड़ कर फिर से हिंदू धर्म अपनाने को मजबूर किया गया। जानेंगे कि आखिर कौन सी चाल चली गई थी बौद्ध धर्म को कमजोर करने के लिए।
किताब में है जिक्र “धर्मान्तरण: आंबेडकर की धम्म यात्रा”
दरअसल जब आप देश में छुआछूत, भेदभाव और शुद्रों के साथ अत्याचार, अछूत कर कर उन्हें अलग थलग करने की चाल को लेकर जो भी साजिशें रची गई उसके बारे में बाबा साहब ने अपनी कई किताबों में जिक्र किया है, लेकिन जब हम बात करते है कि जिस बौद्द धर्म से प्रभावित होकर बाबा साहब बौद्ध धर्म अपनाया, कभी वो चरम पर था, फिर क्यों बौद्ध धर्म की स्थिति ऐसी हो गई..तो इसका विश्लेशण चर्चित लेखक और दिल्ली विश्विद्यालय में इतिहास के एसोसिएट प्रोफेसर रतन लाल जी ने अपनी किताब “धर्मान्तरण: आंबेडकर की धम्म यात्रा”, में बखूबी किया है। इस किताब में बाबा साहब के धर्म परिवर्तन और बौद्ध धर्म ही अपनाने को लेकर विस्तार से विश्लेषण किया गया है।
इतनी ही नहीं इसमे ये भी बताया गया कि जब बौद्ध धर्म के बढ़ते वर्चस्व के कारण ब्राह्मणवाद खतरें में पड़ने लगा तब ब्राह्मणों ने ऐसा क्या किया जिससे ब्राह्मणवाद फिर से पुरानी स्थिति में ही नहीं आया बल्कि अछूतों और निचिली जाति भी इसी कारण बनी..जिन्हें बहिष्कृत करार दिया गया।
शाकाहारी होने का हवाला
दरअसल बाबा साहब खुद ये मानते थे कि जातिगत भेदभाव वैदिक काल या उत्तर काल में काफी समय तक नही रही होगी.. लेकिन जब बौद्ध धर्म का विस्तार हुआ तब बौद्ध धर्म में आने की पहली शर्त यहीं थी कि हिंसा को त्यागना होगा। पशु बलियों को बंद करना होगा। आज जि गौ की रक्षा के लिए ब्राह्मण ढोल पीटते फिर रहे है, खुद के शाकाहारी होने का हवाला देते है लेकिन सच तो ये है कि ब्राह्मण असल में शुरु से शाकाहारी नहीं थे,
वो शुरुआत में मांसाहार करते थे, जिसे वो प्रसाद कहा करते थे, इसमें वो गौ मांस भी खाया करते थे, मुद्दा केवल बलि का था कि बलि किसकी दी जाती है, जो बलि दी जायेगी, उसका प्रसाद ब्राह्मण भी ग्रहण करते थे। लेकिन जब खानाबदोश लोगो ने बौद्ध धर्म को जानना और समझना शुरु किया तो वो लोग जो एक जगह बस गए थे, खुद को सभ्य समाज का हिस्सा कहते थे, उनके लिए समस्यायें पैदा हुई।
क्या चाल चली गई
किताब के अनुसार बाबा साहब ने अपने विश्लेषण में बताया था कि ये वो समय रहा होगा, जब कुछ लोगो ने खानाबदोशो की जिंदगी छोड़ कर एक जगह रहने का फैसला किया तो वहीं कुछ लोगो ने इसी को चुना… नतीजा धीरे धीरे एक जगह रहने वालों ने कुछ को सभ्य और सांस्कति कहना शुरु कर दिया। वो खेती बाड़ी करते, समाजिक नियमों में रहते, घरों में रहते थे। वहीं खानाबदोशो को वो नीच समझने लगे। उनके हमलो और गांव में प्रवेश से रोकने के लिए गांव के उंचे लोगो ने उन लोगो को गांव के बाहर सुरक्षा के लिए तैनात कर दिया जो इन्ही खानाबदोशो से लड़ झगड़ कर अलग हो गए थे।
राजाओं ने बौद्ध धर्म अपना लिया
वो गांव की रक्षा करते थे, गांव वालो ने उन्हें जमीने दी, घर दिये थे…और तब तक भी जातिगत भेदभाव की कोई बात नहीं थी, लेकिन जब बौद्ध धर्म बढ़ा तो भारत समेत विदेशों के भी बड़े बड़े व्यापारियों, राजाओं ने बौद्ध धर्म अपना लिया… और वो इसका विस्तार कर रहे थे, लेकिन ब्राह्मणों ने फिर से चाल चली..जिसमें उनकी चाल बिल्कुल उस जानवर की तरह ही थी जो अपना शिकार पाने के लिए दो कदम पहले पीछे हो जाते है। ब्राह्मणों ने सभी सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं जिनपर उनका आधिपत्य था, उसे छोड़ने का नाटक किया।
देवताओं को खुश करने के नाम पशुओं की बलि
बाबा साहब ने बताया कि ब्राह्मणों ने देवताओं को खुश करने के नाम पर किसानों और बाकि के लोगो को पशुओं की बलि, सामान, उनकी धन संपद्दा को काफी हड़पा, जिससे वो धीरे धीरे गरीब और कमजोर होते जा रहे थे, वो ब्राह्मणों से त्रस्त थे, नतीजा उन्होंने बौद्ध धर्म की तीन उपदेशों चातुर्वर्ण्य प्रणाली समाप्त करने की उनकी मांग, उनका अहिंसा सिद्धांत और विशाल धार्मिक समारोह तथा बलियों के लिए उनकी निंदा के प्रति ध्यान आकर्षित हुआ वो बौद्ध धर्म में जाने लगे। बुद्ध की नीति नैतिक और आर्थिक तौर पर उन्हें मजबूत बनाने वाला था, लोगो ने ब्राह्मणों की बात मानने से इंकार कर दिया।
ब्राह्मणो ने खुद को शुद्ध शाकाहार घोषित कर दिया
ब्राह्मण समझ गए कि खुद के अस्तित्व को बचाये रखने के लिए उन्हें कुछ प्रपंच करना होगा..बस फिर क्या था उन लोगो ने मांसाहार छोड़ दिया, गाय को पूजनीय बना दिया, शराब को छोड़ दिया, खुद को शुद्ध शाकाहार घोषित कर दिया और क्षत्रियों को अपने बराबरी का स्थान दे दिया.. ताकि वो वैश्यों और शूद्रो को धर्म परिवर्तन से रोक सकें। पशु बलि पर रोक और शाकाहार को बढ़ावा देने का प्रपंच काम कर गया और जो बौद्ध धर्म की तरफ जाने लगे थे वो वापिस हिंदू धर्म में लौटने लगे। बुद्ध ने पशु बलि बंद की थी तो ब्राह्मणो ने गाय को पूजनीय बना दिया..वहीं जो गरीब थे और बौद्ध धर्म अपना चुके थे।
उनके लिए मृत पशुओ के मांस खाने पर रोक नहीं लगाई गई, ब्राहमणों ने भी ऐसा ही किया, उन्होंने उन लोगो के गाय के मांस खाने की बात को उनके विरुद्ध इस्तेमाल किया और सामाजिक बाहिष्कृत घोषित कर दिया। बौद्ध धर्म छोड़ने के बाद भी जो गरीबो थे उन्होंने खुद को जिंदा रखने के लिए मृत गायों का मांस खाया, लेकिन ये हिंदू मन को स्वीकार नही हुआ..खास कर जब गाय को पूजनीय घोषित कर दिया गया हो…उन लोगो ने मांस खाने वालों का बहिष्कार स्वीकार कर लिया..और इस तरह से वो सभ्य समाज से अलग हो गये। और ब्राह्मणों की चाल से लोग कब बौद्ध धर्म से हिंदू धर्म में आ गये और जातिगत भेदभाव को स्वीकार कर लिया उन्हें खुद ही पता नहीं चला और इस तरह सब कुछ छोड़ने का नाटक करके उन लोगो ने ब्राह्मणवाद को बचाया और छुआछूत की शुरुआत भी की।



