चंपा टीले ने खोले इतिहास के राज, शुंग-कुषाण काल के बौद्ध स्तूप का मिला अहम सुराग

Bihar Champa Teela
Source: Google

पिछले कई दशकों से बौद्ध धर्म से जुड़े अवशेषों और बौद्ध धर्म के विस्तार के लिए जो भी घटक उपयोगी रहे, उनपर विशेषकर पुरातत्व विभाग खोज कर रहे है… और इसी कड़ी में बौद्ध धर्म की सबसे महत्वपूर्ण धरती बिहार से एक और बड़ी खोज हुई है। जी हां, भागलपुर के तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय से जुड़े चंपा टीले पर होने वाली खोज में प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग को बेहद अहम जानकारी हासिल हुई है। इस जानकारी के दम पर बौद्ध धर्म के विस्तार को और करीब से जानने की मौका मिलेगा.. आइये जानते है कि आखिर ऐसा क्या हासिल हुआ इस खोज में..

दो कालों से बौद्ध धर्म का रिश्ता

दरअसल सर्वेक्षण टीम काफी लंबे समय से चंपा टीले की जांच कर रही है.. और इस अध्ययन के दौरान पुरातत्व विभाग को शुंग और कुषाण काल से जुड़े कई अहम पुरावशेष मिले हैं। चंपा टीले के हिस्से पर सर्वेक्षण किया गया है उसे आज कर्णगढ़ के नाम से जाना जाता है। ऐतिहासिक दृष्टि से यही स्थान प्राचीन अंग महाजनपद की राजधानी चंपा हुआ करती थी। मौजूदा वक्त में इसी टीले पर आरक्षी प्रशिक्षण महाविद्यालय बनाया गया है। सर्वेक्षण दल ने 1960-70 के दशक में पटना विश्वविद्यालय द्वारा प्रो. बीपी सिन्हा के निर्देशन में जो उत्खनन कराया गया था,उसके ट्रेंच यानी खातों का अध्ययन कर इस खोज को किया है।

पहली-दूसरी शताब्दी में बौद्ध प्रभाव के संकेत

सर्वेक्षण के दौरान टीम को ऐसे साक्ष्य मिले हैं, जो बताते हैं कि पहली और दूसरी शताब्दी के बीच इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म का प्रभाव काफी मजबूत था। विभागाध्यक्ष प्रो. अमर कांत सिंह के अनुसार, यहां छठी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर शुंग-कुषाण काल और उसके बाद के दौर तक के अवशेष इस खोज में मिले हैं, जो उस समय में इस क्षेत्र की लगातार बसावट और प्रशासनिक महत्व को दर्शाते हैं। इतिहासकारों के अनुसार, चंपा नदी के तट पर बसी यह नगरी प्राचीन काल से ही सुख-समृद्धि और सांस्कृतिक विविधता का केंद्र रही है। यहां शैव, शाक्त, वैष्णव, बौद्ध और जैन सभी परंपराएं साथ-साथ फली-फूलीं। मनसा विषहरी की लोकगाथा से लेकर जैन सूत्रों तक, इस भूमि पर हर धर्म की छाप दिखाई देती है। वहीं चंपा का गौतम बुद्ध से भी गहरा नाता रहा है। बौद्ध ग्रंथों में चंपा का विशेष उल्लेख मिलता है।

गौतम बुद्ध अपने अंग प्रवास के दौरान गग्गरा पुष्करिणी के पास ठहरते थे। बुद्धचर्या, दीघनिकाय और अंगुत्तर निकाय जैसे ग्रंथों में चंपा को एक समृद्ध और उन्नत नगर बताया गया है। बुद्ध के जीवनकाल में उन्होंने केवल छह प्रमुख नगरों का भ्रमण किया था, जिनमें चंपा भी शामिल था। वहीं जैन धर्म को मानने वालो के लिए भी चंपा बेहद प्रमुख नगरी थी।12वें जैन तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य की जन्मस्थली होने के साथ-साथ यह उनकी पंचकल्याणक भूमि भी मानी जाती है। भगवान महावीर ने यहां तीन वर्षामास बिताए थे और उनकी प्रमुख शिष्या चंदनबाला भी चंपा नगरी की थीं।

प्राचीन व्यापार और समृद्धि का केंद्र

वहां चंपा सिर्फ धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि व्यापारिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण रही है। चंपा नदी के जरिए यहां से बड़े पैमाने पर आंतरिक और विदेशी व्यापार किया जाता था। बौद्ध जातक कथाओं और अन्य ग्रंथों में चंपा नदी के जरिय गंगा मार्ग से बंगाल की खाड़ी और आगे दक्षिण-पूर्व एशिया तक व्यापार के उल्लेख मिलते हैं। चंपा एक व्यवस्थित और योजनाबद्ध नगर था। उर्वर भूमि, सुगंधित चावल, स्वर्ण आभूषण निर्माण और अंतरराष्ट्रीय व्यापार ने इसे प्राचीन भारत के प्रमुख नगरों में शामिल किया। पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी अपनी किताब ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में चंपा के व्यापारिक महत्व का जिक्र किया था।

मनौती स्तूप बना सबसे खास खोज

इसी सर्वेक्षण के दौरान विभाग को टेराकोटा यानी मिट्टी से निर्मित मनौती स्तूप भी मिला। यह स्तूप शुंग-कुषाण काल का प्रतीत होता है और बौद्ध परंपरा से जुड़ा हुआ ही माना जा रहा है। इसके अलावा एनबीपीडब्ल्यू (नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर), रेड वेयर, मृदभांड, हैंडलयुक्त कढ़ाई, टोंटीदार पात्र, प्यालानुमा पात्र, गोफन गुल्ला, धातुमल, ढक्कन, हांडी की गर्दन के हिस्से, टेराकोटा मूर्तियां और मनके (बीड्स) भी बड़ी संख्या में खोज में मिले हैं।

चंपा टीले के संरक्षण की जरूरत

चंपा टीला अंग महाजनपद के गौरव का जीवंत प्रमाण है। पहले चरण के उत्खनन में यहां छठी शताब्दी ईसा पूर्व की काली मिट्टी की प्राचीर मिली थी, जबकि दूसरे चरण में शुंग-कुषाण कालीन मोटी ईंटों की दीवारें सामने आई। इससे साफ होता है कि यह स्थान लंबे समय तक प्रशासनिक केंद्र रहा। ऐसे में पुरातात्विक दृष्टि से इसका संरक्षण बेहद जरूरी है।

सर्वेक्षण दल और मार्गदर्शन

इस पूरे सर्वेक्षण का निर्देशन विभागाध्यक्ष प्रो. अमर कांत सिंह के साथ-साथ डॉ. उमेश तिवारी, डॉ. दिनेश कुमार गुप्ता और डॉ. आशा कुमारी ने किया जिसने साथ शोध करने वाले कई छात्र फैसल, आइसा, सुमन, रितेश, आनंद, विनित और घनश्याम जैसे कई विद्यार्थी इस दल का हिस्सा रहे। आज चंपा टीले पर मिले नए पुरावशेष इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह क्षेत्र न सिर्फ इतिहास में, बल्कि भविष्य में भी शोध का बड़ा केंद्र बन सकता है। चंपा में होने वाले शोधों से कई औऱ रहस्यों से पर्दा उठ सकता है। लेकिन इन खोजो ने ये साफ कर दिया कि बिहार वाकई में कभी एक ताकतवर समृद्ध राज्य हुआ करता था।

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