आज पूरे एशिया में सबसे ज्यादा तेजी से प्रभावित कोई धर्म है तो वो है बौद्ध धर्म… श्रीलंका, कंबोडिया, चीन, जापान जैसे देशों में तो बौद्ध धर्म उनका प्रमुख धर्म हो गया है, बौद्ध धर्म जो कि गौतम बुद्ध से जुड़ा है, जिनकी कर्मभूमि के रूप में भारत का नाम प्रचलित है.. तो वहीं कपिलवस्तु के पास स्थित लुंबिनी के बारे में सबको पता है कि लुंबिनी में ही सिद्धार्थ गौतम का जन्म हुआ था..
लेकिन पहली सदी से लेकर 21 वी सदी तक में कई बार ऐसा हुआ जब बौद्ध धर्म का प्रभाव कम हो गया, ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर कैसे पता चला कि लुंबिनी ही वो स्थान है जहां गौतम बुद्ध जन्में थे.. और कपिलवस्तु उनकी राजधानी है। तो चलिए इस लेख में जानते है कि लुंबिनी की खोज की कहानी जानेंगे, जो कई बात विलुप्त हो गई थी, लेकिन आखिरकार इसे खोज ही लिया गया और आज ये विश्व धरोहर में शामिल है।
जर्मन पुरातत्वविद एलॉय सेंटन फ्यूरेन कौन है ?
इतिहास में कई ऐसे चीनी यात्री हुए जिन्होंने बौद्ध धर्म के बारे में जानने के लिए भारत की यात्रा की थी। लेकिन इनकी जानकारी के बारे में खंगालने की काम भी 19वी शताब्दी में शुरु हुआ। इतिहासकारों के अनुसार अशोक के बारे में भी 19वी सदी में पता चला था, और लंबिनी की पहचान के पीछे भी अशोक का ही सबसे बड़ा योगदान रहा था। दरअसल 18वी सदी के अंत में एक जर्मन पुरातत्वविद एलॉय सेंटन फ्यूरेन, जिन्होंने चीनी यात्री फाहायान, जो कि एक चीनी यात्री था, उसके अभिलेखों में भारत में मौजूद एक जगह कपिलवस्तु का जिक्र था।
बौद्ध अवशेषों के साथ छेड़छाड़ नहीं
कपिलवस्तु का नाम पहले भी कई बार सामने आ चुका था, लेकिन कपिल वस्तु असल में थी कहां, ये किसी को नहीं पता.. क्योंकि तब इस इलाके को रूपनदेही के नाम से जाना जाता था, लेकिन तब लगा था कि फ्यूरेन बौद्ध इतिहास की खोज कर रहे है, लेकिन एक ब्रिटिश ऑफिसर आर्थर स्मिथ ने जब जांच की तो पता चला कि फ्यूरेन ने बौद्ध अवशेषों के साथ छेड़छाड़ नहीं की बल्कि वो नकली बौद्ध अवशेष बनाने का और ब्लेक मार्केट में बेटने का काम करते थे, नतीजा उन्हें पकड़ कर वापिस उनके देश भेज दिया गया,,, लेकिन उनके इस गुनाह की माफी तब हो गई जब उन्होंने ही इस खुदाई में ऐतिहासित लुबिंनी को खोज निकाला था.. अब सवाल ये कि लुंबिनी यहीं है कैसे पता चला.. तो आपको बताते है।
चीनी यात्री फाहायान
दरअसल चीनी यात्री फाहायान ने 399 ईसवी से लेकर 414 ईसवी में भारत में बौद्ध धर्म को जानने के लिए भारत की यात्रा की थी, और इस यात्रा के दौरान वो लुंबिनी नाम की जगह पर भी गये थे जो कि नेपाल के पास थी…. फाहायान ने अपने अभिलेखों में लुंबिनी के बारे में लिखा था… कपिवस्तु से कुछ मील दूर पर सिद्धार्थ का ननिहाल देवदह था, जो कि कोलिय वंश की राजधानी थी, सिद्धार्थ के जन्म से पहले उनकी मां महामाया देवी अपने मायके जा रही थी।
कपिलवस्तु से पूर्व दिशा की तरफ लुंबिनी नाम की जगह में एक उद्यान था, वहीं एक तालाब था, तालाब में गर्भवती रानी ने स्नान किया था, और वो तालाब से बाहर आ कर 20 कदम चली ही थी कि उन्हें प्रसव पीड़ा होने लगी और उन्होंने पेड़ की एक शाखा पकड़ ली, और वहीं उन्होंने कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ गौतम को जन्म दिया था।
गौतम बुद्ध का जन्म स्थान
ये वहीं स्थान था जो कि बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध का जन्म स्थान कहलाता है। इस बात प्रमाणित करने के लिए उस स्तंभ का भी जिक्र किया गया जब महान सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाने के बाद उसका प्रचार प्रसार शुरु किया और उन्होंने अपने गुरु उपगुप्त के कहने पर 84 हजार स्तूप बनावाये थे, इतना ही नहीं बौद्ध धर्म अपनाने के करीब 12 साल बाद अशोक खुद अपने गुरु के साथ लुंबिनी की यात्रा पर गए थे, जहां उन्हें पता चला था कि बुद्ध के जन्म से जुड़े कुछ अवशेष वहां मिले।
ब्राह्मी भाषा में शिलालेख लिखवाया
उस वक्त वो अशोक के शासन में था। अशोक ने वहा रहने वालों को 10 हजार सोने की सिक्के दिये थे, और उपगुप्त ने उस पेड़ की भी पहचान की जिसकी डाली को पकड़ कर महामाया देवी ने गौतम बौद्ध को जन्म दिया था। वहां स्तूप के पास एक अशोक स्तंभ भी बनाया था और उस स्तंभ पर पाली और ब्राह्मी भाषा में शिलालेख लिखवाया। जिसके मुताबिक लुंबिनी की यात्रा के बाद अशोक के पूरे क्षेत्र को कर मुक्त कर दिया था।
नेपाल के मल्ला राजवंश के राजा रिपु मल्ला
सम्राट अशोक पर लिखे ग्रंथ अशोक वंदन में भी लुंबिनी के बारे में बताया गया है। हालांकि मौर्य काल में लुंबिनी उत्तरपथ नाम के मार्ग पर पड़ता था, जो कि खैबर दर्रे को पर करके आने वाले यात्रियों के लिए पहला विश्राम स्थान होता था। इसी रास्ते से रेशम मार्ग भी जाया जाता था। हालांकि ह्वेनसांग के अभिलेखों के अनुसार अशोक स्तंभ बिजली गिरने के कारण क्षतिग्रस्त हो गया था तो वहीं उसके पास एक स्तूप और दो पानी के श्रोत के होने की बात कही है। ये किस्सा सातवीं सदी का था जिसके बाद 700 सालों तक लुंबिनी का कही जिक्र नहीं है, लेकिन 14 शताब्दी में नेपाल के मल्ला राजवंश के राजा रिपु मल्ला के यहां आने का जिक्र मिलता है।
एलॉय सेंटन फ्यूरेन..जांच शुरु की
लेकिन वक्त के साथ ये स्थान फिर से विलुप्त हो गया, इस स्थान का फिर से जिक्र आया 1890 में जब नेपाल की सेना के सेनापति खड़ग शमशेर जंग बहादुर राणा को पता चला कि नेपाल में एक स्थान पर एक ऐतिहासिर स्तंभ मिला है.. राणा ने तुरंत उस स्थान में खुदाई करवाने का फैसला किया और तब सामने आये थे जर्मन पुरातत्वविद एलॉय सेंटन फ्यूरेन..जांच शुरु की गई, तो स्तंभ पर लिखे अभिलेखों के पता चला कि वो सम्राट अशोक का ही स्तंभ था, और वो स्थान भगवान बुद्ध की जन्म स्थली है।
लुंबिनी का जिक्र तो पहले कई बार हुआ था, लेकिन वो कहां था, इसकी खोज असल में 1898 में की गई। ये खोज बौद्ध धर्म के अनियायियों के लिए बहुत बड़ी खोज थी, तो वहीं भारतीय इतिहास को जानने के लिए बड़ी उपलब्धि थी। 1997 में यूनेस्को ने लुंबिनी को वर्ल्ड हैरिटेज स्पॉट घोषित कर दिया था। आज लुंबिनी बौद्ध धर्म के अनियायियो के लिए सबसे अहम स्थानो में से एक है। गौतम बुद्ध की जन्म स्थली की खोज की कहानी आपको कैसी लगी हमें कमेंट करके जरूर बतायें।



