Buddhism reached China: जहाँ रहती है दुनिया की आधी बौद्ध आबादी, पर क्या आप जानते हैं इसका अतीत?

Buddhism in China
Source: Google

Buddhism reached China: आज पूरे एशिया में चीन एक ऐसा देश है जहां बौद्ध धर्म काफी तेजी से बढ़ा। पूरी दुनिया में जितने लोग बौद्ध धर्म को मानने वाले है उसमे से आधी आबादी केवल चीन में निवास करती है। 2023 में प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट के अनुसार करीब 42 मिलियन लोग चीन में बौद्ध धर्म को मानते है, जो कि यहां की आबादी का 4 प्रतिशत है।

चीन में महायान बौद्ध परंपरा को माना जाता है जो आज भी तेजी से फल फूल रहा है, चीन को शायद आज बौद्ध धर्म को मानने वाले देशों में से एक ही माना जाता है लेकिन क्या आपने ये सोचा है कि बौद्ध धर्म से पहले यहां कौन सा धर्म रहा होगा। चीन के लोग किस धर्म में विश्वास रखते थे। तो चलिए आपको इस लेख में बताते है कि बौद्ध धर्म से पहले चीन में किस धर्म का राज चलता था, और कैसे बौद्ध धर्म आज चीन का सबसे प्रमुख धर्म बन गया है।

कन्फ्यूशियसवाद और दाओ-इजम क्या है

बौद्ध धर्म की स्थापना की बात की जायें तो ये एक गैर आस्तिक धर्म है जिसका मतलब है कि बौद्ध धर्म को ईश्वर के निर्माता के रूप में विश्वास नहीं है। इसकी स्थापना गौतम बुद्ध ने की थी जो कि 6वीं सदी ईसा पूर्व से 5वीं सदी ईसा पूर्व में भारत में जन्में थे और अपने तप के बल पर उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया था, जिसे उन्होंने भारत के अलग अलग कोनो में पहुंचाया था, और भारत से ये अलग अलग देशों में पहुंचा था लेकिन चीन में जब आप बौद्ध धर्म के विस्तार की बात करते है तो इसके लिए पहली शताब्दी में चीन का इतिहास जानना होगा।

दरअसल पहली सदी में चीन में जब तक बौद्ध धर्म के विचार नहीं पहुंचे थे तब तक यहां विचारधारा काफी सक्रिय थी, पहली कन्फ्यूशियसवाद और दूसरी विचारधारा थी दाओ-इजम। ये दोनो विचारधारा चीन के हवाओं में बेहद मजबूती से समाई हुई थी, ऐसे में बौद्ध धर्म को विस्तार कैसे मिला ये जानने के लिए पहले इन दोनो विचारधारा के बारे में जानना जरूरी है।

क्या है कन्फ्यूशियसवाद और दाओ-इजम

कन्फ्यूशियसवाद असल में चीन के प्रसिद्ध विचारक और शिक्षाविद कन्फ्यूशियस की देन है, जिन्होंने राज करने वाले शासक के लिए और आम लोगो के लिए कुछ ऐसे नियम बनाये, जो जीवन को सही दिशा में जे जाते। उनके मुताबिक शिक्षा का उद्देश्य केवल चरित्र निर्माण करना है, जो शिक्षित व्यक्ति है उसके अंदर दयालुता, सदाचार, देशभक्ति, न्याय, और ईमारदारी जैसे गुण स्वयं ही आ जाते है।

इतना ही नहीं उन्होंने शासकों को भी ये गुण की शिक्षा हासिल करने के लिए प्रेरित किया जिससे राजनीति को भी नैतिक आधार पर किया जायें। ताकि शासक न्यायप्रिय और चरित्रवान बन सकें। उनके नियम लोगो को उत्तम बनने के लिए प्रेरित करते थे, ये विचार न्याय और शासन व्यवस्था के लिए बेहतर रहे थे, और पहली शताबदी में हान डायेनेस्टी के शासन में इस विचारधारा ने काफी मजबूती पकड़ी, जो न्यायप्रिय विचारों को बढ़ावा देता था।

बौद्ध धर्म का चीन में पाव पसारना आसान नहीं

ऐसे में बौद्ध धर्म का चीन में पाव पसारना आसान नहीं था, लेकिन फिर भी पहली ही शताब्दी में बौद्ध धर्म चीन पहुंचा, जिसके कारण थे हान राजवंश के शासक- जी हां, किवंदतियों के अनुसार हान राजवंश में पहली शताब्दी में मिंग डी का शासन था, एक रात उन्होंने सपना देखा कि कोई तपस्वी, जिसका पूरा शरीर सोने का है, जो सूरज की तेज रोशनी की तरह चमक रहे थे, उनके सिर पर सूरज और चांद मुकुट की तरह पीछे चमक रहे है, सिर के पीछे एक तेज रोशनी चमक रही है।

मिंग नींद से जाग गये, और अपने सपने में चमकने वाले साधु के बारे में सोचने लगे। मिंग एक न्यायप्रिय शासक थे और वो आध्यत्मिक प्रवृति के थे, उन्होंने अपने सपने का आध्यात्मिक मतलब जानने के लिए अपने सपने के बारे में अपने दरबार के विद्वान लोगो से पूछा। काफी विचारने के बाद ये निष्कर्ष निकला की हो न हो वो भारत के बौद्ध धर्म के संस्थापक बुद्ध ही है।

राजधानी में बुद्ध की प्रतीमा को स्थापित किया 

बुद्ध और बौद्ध धर्म के बारे में विस्तार से जानने के लिए मिंग डी ने अपने एक जानकार को भारत में बौद्ध धर्म पर रिसर्च करने के लिए भेजा था। भारत आने वाले शख्स ने भारत में कई जगहों पर बौद्ध धर्म को समझा और उनके बारे में कुछ चाइनीज भाषा में और कुछ भारतीय लीपि में लिखी हुई धर्म ग्रंथो को चाइना ले कर गया। मिंग डी ने बुद्ध की प्रतीमा को देखा और उसे यकीन हो गया कि उसने जो सपने में छवि देखी थी वो बुद्ध की ही थी, और उसने अपनी राजधानी में बुद्ध की प्रतीमा और बौद्ध धर्म से जुड़े अवशेषों को एक साथ स्थापित करके वाइट हॉर्स टेंपल में रखने का आदेश दिया था। ये नाम इसे इसीलिए मिला क्योंकि बुद्ध से जुडे सभी अवशेष सफेद घोड़े से लाये गए थे।

बौद्ध धर्म या बौद्ध से जुड़े अवशेष

ये पहली बार हुआ था जब बौद्ध धर्म या बौद्ध से जुड़े अवशेष चीन पहुंते थे। लेकिन फिर भी अभी चीन में बौद्ध धर्म का विस्तार नहीं हुआ था, क्यंकि बौद्ध धर्म की विचारधारा से ज्यादा कन्फ्यूशियसवाद की विचारधारा लोगो में मजबूत थी, इसलिए आने वाले 400 सालों में भी बौद्ध विचारधारा बहुत धीरे गति से चीन में सफर कर रही थी। बुद्ध के विचारों को सही रूप से चीन में पहुंचाने के लिए ऐसे स्त्रोतो की जरूरत थी जो उनके विचारो का सही अनुवाद करें लेकिन तब तक जिन्होंने अनुवाद किया था वो पूरी तरह सटीक नहीं थे, जिससे वहां के लोगो को बौदध धर्म की विचारधारा समझ ही नहीं आती थी, और चीन का धर्म ना होने के कारण लोगो ने इसे ज्यादा गहराई से समझने की कोशिश भी नहीं की।

बौद्ध धर्म को फलने फूलने में काफी समय लगा

हान डायेनेस्टी के बाद दाव वाद के कारण बौद्ध धर्म को फलने फूलने में काफी समय लगा। लेकिन दूसरी शताब्दी में छिड़े सिविल वॉर के कारणं चाइना में टूट पड़ी और वो 16 अलग अलग हिस्सों में बंटा, वॉर के कारण कुछ हिस्से मजबूत होते गए तो कुछ कमजोर,,और इस कमजोरी का फायदा उठा कर मिडिल ईस्ट और स्टेपीज के मैदानी इलाकों में रहने वाले बौद्ध खानाबदोश चीन के उत्तरी हिस्से में आकर रहने लगे।

ये लोग चीन के पारंपरिक विचारधारा के विपरीत बौद्ध विचारधारा को पसंद करते थे, और उसे ही फॉलो करते थे। धीरे धीरे उत्तरी चीन में बौद्ध धर्म तो बढ़ रहा था लेकिन समस्या ये थी कि बौद्ध धर्म की असली विचारधारा उन तक सही से नहीं पहुंच रही थी, ऐसे में कुमारजीवी नाम के एक बौद्ध भिक्षु ने कई बौद्ध धर्म ग्रंथो का चीनी भाषा में अनुवाद किया, जिसमें बौद्ध धर्म के विचारों को सटीक और बारिकियों से समझाया गया।

कन्फ्यूशियसवाद की विचारधारा

इसी बीच 400 तक लगभग छठी शताब्दी तक सिविल वॉर ने चीन को बुरी तरह से बिखेर दिया था, लोग बंट गए थे, जिससे कन्फ्यूशियसवाद की विचारधारा से लोगो का दिल उठ गया था। सिविल वॉर के कारण हिंसा और खूनखराबा देखने वाले लोगो ने जब बौद्ध धर्म की अहिंसा की विचारधारा को देखा तो वो उसकी तरफ आकर्षित होने लगे। उन्होंने बौद्ध धर्म में एकता और शांति नजर आई, जिसमें कुमारजीवी के अनुवाद किये गए बौदिध ग्रंथ भी काफी काम आये। खासकर उत्तरी चीन में बौद्ध धर्म अपने जड़े जमाने लगा, हालांकि दक्षिणी चीन में अभी भी दाववाद चल रहा था, जो कि यिंग और यांग की फिलोसिफी पर चल रहे थे, जिनका मानना था कि अच्छाई और बुरी एक साथ चलती है।

साउथ चाइना में संत लाउजी की फिलोसिफी

उन्हें अलग नहीं किया जा सकता है। ऐसे में साउथ चाइना में संत लाउजी की फिलोसिफी को लाकर साउथ चाइना में भी बौद्ध धर्म को मजबूत करने की चाल चली गई। लोगो ने ये विचार फैलाया कि संत लाउजी ही भारत गए थे और बुद्ध उनका ही पुनर्जन्म है, जिन्हें आप चीन के प्रसिद्ध लाफिंग बुद्धा के रूप में देख सकते है। जो कि असल में संत लाउजी ही है। इस वक्त इस नई विचारधाना के आधार पर ही जेन बौद्ध की फिलोसिफी का जन्म हुआ था। लेकिन जब सातवी सदी में चीन में सिविल वॉर खत्म हुआ और तांग राजवंश ने शासन शुरु किया तो उन्होंने बौद्ध धर्म को बड़ी पहचान दे दी।

बौद्ध भिक्षु ह्वेनसांग ने भारत की यात्रा की

खासकर जब तांग राजवंश के एक बौद्ध भिक्षु ह्वेनसांग ने भारत की यात्रा की और वो बौद्ध राजा हर्षवर्धन के दरबार में 16 सालों तक रहे और उन्होंने बौद्ध धर्म से जुड़े ऐसे कई धर्म ग्रंथों का अध्ययन किया, और चीनी भाषा में लिखा जो कि बुद्ध की विचारधारा की सटीकता को दर्शाता था। वो वापिस चीन लौटे और तब बुद्ध की विचारधारा सही रूप में चीन के लोगो के बीच पहुंची। इसी दौरान सीतवी सदी के अंत में तांग साम्रज्य की रानी वू जतिन ने बौद्ध धर्म को बढ़ावा देने के लिए कई बड़े बौद्ध मंदिर बनवाने का आदेश दिया जिसे आज भी आप लेसान बुद्ध मूर्तियों में देख सकते है। एक तरफ 12वी सदी तक चीन में बौद्ध धर्म मजबूत हो गया और तो वहीं भारत में कमजोर हो गया था।

हालांकि 1949 में माओ सेतुंग के आने से रिपब्लिक ऑफ चाइना का अंत हो गया और माओ की सरकार बनी। माओ की नीतियों के कारण धार्मिक लोगो को काफी प्रताड़ित किया गया, बौद्ध लोगो को मारना, उनके मंदिरों, विहारो और मठो को तोड़ना, उन्हें नुकसान पहुचांया गया और ये अवधारना फैलाई गई कि बौद्ध धर्म एक अंधविश्वास है। डर से बौद्ध लोगो ने या तो देश छोड़ दिया या फिर धर्म छोड़ दिया.. हालांकि तब भी आज चीन में बौद्ध धर्म काफी मजबूत है। बौद्ध धर्म भारत में भले ही दुबारा फिर से मजबूत नहीं हुई लेकिन चीन में ये धीरे धीरे मजबूत हुई और आगे बढ़ी, आज चीन में बौद्ध धर्म काफी मजबूत है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *